यहाँ बदलते हैं रिश्ते

जब काम था वह रोज
हमारे गरीबखाने पर आये
अब उन्हें हमें याद करने की
फुरसत भी नहीं मिलती
गुजरे पलों की उन्हें कौन याद दिलाये
हम डरते हैं कि
कहीं याद दिलाने पर
उन्हें अपने कमजोर पल न सताने लगें
वह यह सोचकर मिलने से
बहुत घबडाते हैं कि
हम उन्हें अपनी पुरानी असलियत का
कहीं आइना न दिखाने लगें
दूरियां है कि बढती जाएँ
टूटे-बिखरे रिश्तों को फिर जोड़ना
इतना आसान नहीं जितना लगता है
बात पहले यहीं अटकती हैं कि
आगे पहले कब और क्यों आये
अच्छा है मतलब से बने
रिश्तों को भूल ही जाएँ
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इस रंग बदलती दुनिया मैं
बदल जाते हैं रिश्ते भी
अपनों से चलते हैं
संबंध बरसों तक
पराये से लगते हैं वह भी कभी
प्रेम से जो साथ चले
वह अपना है
जहाँ कम होते लगें
छोड़ तो उन्हें तभी

2 Comments

  1. Posted November 19, 2007 at 4:12 PM | Permalink

    बहुत सुन्दर!!

    बात पहले यहीं अटकती हैं कि
    आगे पहले कब और क्यों आये
    अच्छा है मतलब से बने
    रिश्तों को भूल ही जाएँ

  2. Posted November 20, 2007 at 4:03 PM | Permalink

    रिश्तों में रिसाव के लिए कोई स्थान नही होना चाहिए , आपने नि:संदेह बहुत माकूल बातें कही है, कि- इस रंग बदलती दुनिया मैंबदल जाते हैं रिश्ते भी……!


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