नीचे से ऊपर जाते हुए पटाखे
धमाके से कानों को कंपाते
साथ में नीचे आते प्रदूषण लाते
नीचे चलती गाडियाँ
तेज लाईट से आंखों को अंधा करती
और हार्न से निकला भयानक शोर
रास्ते के दोनों और बिखरी रौशनी
में भी उसके जलते अँधेरे का अहसास कराते
खुशी में चिराग जलाने के तो
खूब सुने हैं अफसाने
अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारता हो
एकजुट होकर समाज
नही मिलतीं ऐसी दास्ताने
अंधी दौड़ में शामिल हैं सब लोग
जिनमें अक्ल है ताकत नहीं है
जिनके पास ताकत है तो
नीयत में है अपने लाभ पाने का स्वार्थ
इसलिए चेतना का अलख नहीं जगाते
कहैं दीपक बापू
किस-किसको रोईये
आराम बड़ी चीज है
मुहँ ढककर सोईये
यह नीति अच्छी होती
अगर आवाजों से नींद नहीं टूटी होती
चैन होता हमें भी अगर
मिठाई के नाम पर विष को
परोसते नहीं देख पाते
करते समाज सेवा का व्यापार तो
हम ही चेतना का अलख जगाते
बना लेते कोई बड़ा आश्रम
इन आवाजों से दूर रह पाते
चूंकि दर्द है कई लोग का
उनका हमदर्द बन जाते
यह त्यौहार खाने-पीने के ही लिए नहीं
चिंतन और मनन के लिए भी आते
कुछ सोचो कहाँ जा रहे हो
अपने हाथ से अपने लिए विष जुटा रहे हो
बस यही सन्देश इस पावन पर्व पर सुनाते
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