संत कबीर वाणी:मूर्ख से मित्रता कभी न करिये
गिरिये परबत शिखर ते, परिये धरनि मंझार
मूरख मित्र न कीजिए, बूडो काली धार
कविवर कबीर दास कहते हैं भले ही पर्वत के शिखर से गिरना पड़े, अथवा धरती के भीतर गढ़ जाना पड़े, किन्तु मूर्ख व्यक्ति से मित्रता नहीं करना चाहिऐ. अन्यथा अंधकूप में डूब में मरना पड़ता है.
भावार्थ-अपने जीवन में कितनी भी विषम परिस्थिति आ जाये पर मूरख से मित्रता न करो वरना सर्वनाश हो जायेगा. अगर उससे मित्रता की तो वह और हालत बिगाड़ देगा और बचने का कोई उपाय नहीं नजर आयेगा.
निज स्वारथ के कारनै, सेव करै संसार
बिन सवारथ के भक्ति कारे, सो भावै करतार
संत शिरोमणि कबीर दास कहते हैं कि अपने स्वार्थ के लिए तो पूरी दुनिया सेवा या भलाई करती है, परन्तु जो बिना स्वार्थ के जो भगवान् की भक्ति और लोगों की सेवा करता है वही भगवान को प्रिय होता है.
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