रहीम के दोहे:बन्दर कभी हाथी नहीं हो सकता


बडे दीन को दुख सुनो, लेट दया उर जानि
हरी हाथी सों कब हुतो, कहू रहीम पहिचानि
कवि रहीम कहते हैं. महान पुरुषों के हृदय में दुखी व्यक्ति की कातर वाणी सुनकर दया का संचार हो जाता है, परन्तु बन्दर कब हाथी हो सकता है? इस बात को समझ लें.
भावार्थ-उनका आशय यह है किस संसार में अपने हितैषी की पहचान में सतर्कता बरतनी चाहिए. जो मदद करने वाले होते हैं वह आदमी का दर्द सुनते ही मदद करते हैं. कुछ लोग ऐसे होते हैं जो बातें बहुत बड़ी-बड़ी करते हैं और उछल कूद इस तरह करते हैं जैसे की बहुत कार्य कुशल हों पर वास्तव में किसी काम के नहीं होते-केवल बातों के ही होते हैं.

बिगरी बात बनाईं नहीं, लाख करू किन कोय
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय

कवि रहीम कहते हैं की दूध के फटने से मक्खन नहीं निकल सकता. इस प्रकार जो बात एक बात बिगड़ जाती है, वह फिर से बन नहीं पाती, चाहे आदमी कितना भी यत्न कर ले.

भावार्थ-हर व्यक्ति को अपने व्यवहार में सतर्कता बरतनी चाहिए-क्योंकि एक बार बात बिगड़ जाती है तो फिर उसे बनाना मुश्किल है. सभी से प्रेम और मधुर वाणी का व्यवहार करना चाहिए, अगर किसी के मन में एक बार विद्वेष आ गया तो फिर उसे दूर करना मुश्किल होगा.

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