संत कबीर वाणी:ज्ञानी कोरी मान्यताओं में नहीं फंसते
चाल बकुल की चलत हैं, बहुरि कहावैं हंस
ते मुक्ता कैसे चुंगे, पडे काल के फंस
संत शिरोमणि कबीरदास जीं कहते हैं कि जो लोग चाल तो बगुले की चलते हैं और अपने आपको हंस कहलाते हैं, भला ज्ञान के मोती कैसे चुन सकते हैं? वह तो काल के फंदे में ही फंसे रह जायेंगे। जो छल-कपट में लगे रहते हैं और जिनका खान-पान और रहन-सहन सात्विक नहीं है वह भला साधू रूपी हंस कैसे हो सकते हैं।
जो हंसा मोती चुगेँ , कंकर क्यों पतिताय
कंकर माथा ना नवै, मोटी मिले तो खाय
जो ज्ञानी और विवेकवान-हंस रूपी-लोग संसार की आसक्ति को त्यागकर आत्मज्ञान रूपी मोती को चुगता है, तो वह सांसरिक विषय और कामनाओं के कंकर पत्थर पर क्यों यकीन करेगा? अर्थात वह मिथ्या वाद-विवादों एवं कल्पित मान्यताओं के चक्कर में नहीं पडेगा। वह कंकर रूपी अज्ञानता के आगे कदापि अपना माथा नहीं झुकायेगा, केवल यथार्थ ज्ञान को ही ग्रहण करेगा।
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