जंग में पिसता है आम आदमी

एक कहे  आजादी की  जंग
दूसरा दे उसे आतंक का रंग
आम आदमी ही होता है तंग
नहीं होता वह पूर्व और पश्चिम के संग
जानता है  अपने की हो या पराये की
उसके सीने की और ही होता है
संगीन का  निशाना
आजादी और आतंक तो बस होता है  बहाना
अपनी  राजनीतिक आजादी की चाह तो
गांधी जी की राह क्यों नहीं चलते
जानते नहीं क्या हथियारों के उपयोग से
उनके विरोधी के ही पेट पलते
अब तो सूचना का जाल चारों और
बिछ गया
पल-पल की खबर मिलते है  
आम आदमी को इसलिए ही
बेतुकी लगती है 
चाहे वह आजादी की या
आतंक के ख़िलाफ़ हो जंग
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