शब्द और अंतर्मन
जब हृदय के भाव शब्द बन जाते
तब ऐक तस्वीर की तरह भाते
अपनी भावनाओं को जो समझते
वही उसे शब्दों के सुन्दरता से सजाते
शब्द और भाव का सामंजस्य
इतना आसान नहीं है जितना लगता
जब भाव होते हैं तब शब्दों के
मस्तिष्क में स्थित भण्डार पर
नजर नहीं जाती
पर जब शब्द लिखने या कहने का मन हो
तब भावों को अपने से परे पाते
हर कहा और बोला गया शब्द
हमारे भावों का प्रतिबिंब कहलाता
पर जिनको हम समझें
कोई और अर्थ वैसा न समझे
हमारे व्यक्तित्व का स्वरूप
लोगों की दृष्टि में बदल जाता
तोल कर न बोले और कहे शब्द
हमें ही जिन्दगी में उलझाते
जैसे भाव हैं हमारे
वैसे व्यक्त शब्द न हो पायें
तो भी लगता है कि हमने
जो कुछ लिखा और कहा
उससे बात नहीं बनी
अपने ही हृदय की तस्वीर
अस्पष्ट नजर आती
अव्यक्त भाव धीरे-धीरे
दुर्गन्ध देने लगते
और हम भीड़ में भी
स्वयं को अकेला पाते
खेल सब नीयत का
अपने शब्द और बोलने के
साथ ही उसमें अमरत्व और अमृत का
प्रकट होते देखना चाहते
उसका कोइ अर्थ समझे इसका
इन्तजार नहीं कर पाते
अपने भाव और शब्द जोड़ नहीं पाते
अगर अपने शब्द और भावों को
जोड़ने में धैर्य धारण करें और
सहजता से उनके मिलन का दृश्य
अपने ही अंतर्मन में देखें
तभी अभिव्यक्ति कर पाएंगे
नहीं तो बोलने और लिखने का
मतलब स्वयं ही नहीं समझ पायेंगे
पता नहीं क्यों हम
इतनी बात क्यों नहीं समझ पाते
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