दिल का क्या हिसाब रखते

जिस राह से गुजरे हम
वहीं हमसफ़र मिलते गये
वह अपनी मंजिल पर आकर रुके
हम अपनी राह पर चलते गये
किसी से बिछडे तो किसी से मिले
अपना कारवां लिए बढते रहे
जो बिछडे क्या उनका पता रखते
क्या भला अपनी उनको खबर करते
जो साथ होते
उनसे ही निभाने से फुर्सत कहाँ होती
अपनी राह पर हम चलते रहे
कहीं रास्ते में नहीं होंगे हमारे पैर के निशान
कहीं नहीं होगी हमारे नाम की इबारत
हमारे आगे जाते ही सब मिटते गये
हो सकता है कि किसी के दिल में
हमारे लिए जगह हो
क्योंकि दिल पर नहीं होता बस किसी का
अगर बसे तो बस ही गये
करते हों शायद वह लोग
जिन्हें हम खुद भूल गए
दिलों को पढ़ना कहाँ संभव
किसके दिन में कैसे बसे
किसकी आंखों के सामने से गुजरे
और उसके दिल में बसे
और कहाँ बाहर से ही निकल गए
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