माया की कृपा जिन पर होती है उन्हें भगवान् का वरदहस्त मान लिया जाता है. जितनी भगवान् की महिमा अनंत है उतनी ही माया की गाथा अनंत है. इस विश्व में कई ऐसे लोग हैं जो पद, प्रतिष्ठा और पैसे की उपलब्धियों के शिखर पर हैं पर भगवान को नहीं मानते हैं न पूजते हैं. उन लोगों को पूजना भी नहीं चाहिए और उनके नास्तिक विचार पर किसी को आपत्ति भी नहीं करना चाहिए. आखिर हर आदमी भगवान् की पूजा क्यों करता है? माया की कृपा हो इसलिए ही न! कहीं नमन कर तो कहीं ऊपर हाथ उठाकर आखिर आदमी और क्या चाहता है! इस दुनिया में दैहिक और भौतिक सुख ही न!
अब किसी के ऊपर माया मेहरबान हो तो लोग यहीं कहते हैं की भगवान् के मेहरबानी है. पर अगर कोई अपनी उपलब्धियों को अपनी मानता है तो उसे आखिर लोग क्यों जबरदस्ती कहलाना चाहते हैं कि भगवान की कृपा है.मेरे विचार से भक्ति के नितांत एक निजी मामला है. अपने देश में तो और भी अधिक मामला पेचीदा है. एक ही परिवार के पांच सदस्य अलग-अलग भगवानों की पूजा करते हैं और उनके आध्यात्म गुरु भी अलग होते हैं और बडे आराम से एक छत के नीचे रहते हैं. कभी एक दूसरे से नहीं कहते कि ‘तुम हमारे भगवान् को पूजो या हमारे गुरु को मानो’. सब जानते हैं कि यह निरंकार की उपासना का मार्ग हैं. जब लोग अपने घरों में ऐसे मामलों पर बहस नहीं करते तो बाहर विवाद खडा क्यों करना चाहते हैं.
इतिहास गवाह है की पूरे विश्व में आस्तिक और नास्तिक विचारधारा के लोग एक दूसरे की गर्दन तक उड़ा चुके हैं. ऐसी घटनाएं भारत में तो कम बाहर और भी ज्यादा हो चुकी हैं. पर यह उस समय की बात है जब मनोरंजन और आवागमन के साधन काम थे और लोग अपने सीमित दायरों में ही रहते और सोचते थे. उस समय भगवान् को मानने की चर्चा इसलिए अधिक थी क्योंकि काम कम था और समय अधिक. अब समय बदल गया है और ऐसे में आदमी जिन्दगी की धमा-चौकडी में इस कदर फंसा है की उसे यह पूछना अन्याय लगता है कि बता भगवान् है कि नहीं. घर और रोजगार के स्थानों के बीच की दूरी तय करते हुए आदमी का आधा दिन गुजर जाता है. रिश्तेदारी पहले की तरह अब घर के पिछवाडे में नहीं होती. कहीं से सन्देश आ जाये तो वहाँ पहुँचने के साधन की चिंता अलग से कंरनी पड़ती है. इस समय रेल मिलेगी कि बस. समय पर पहुँचेगे कि नहीं. तमाम तरह के घरेलू और सामाजिक तनाव अब ऐसे हैं कि भगवान् के अस्तित्व पर बहस करने का किसी को समय ही नही है.
जिसके मन में हैं वह समय निकाल कर मंदिर चला जाता है और जिसके पास नहीं है घर के अन्दर भी कर लेता है. कोई नहीं भी कर पाता इसका मतलब यह कतई नहीं है वह भगवान् को नहीं मानता-और जो मानता है वह कहने के लिए मानता है औरहृदय में धारण करता है कि नहीं यह पता नहीं लग पाता. ऐसे में जो नहीं मानता तो उससे भी इस बात के लिए बाध्य करना ठीक नहीं है बता-कैसे कहता है कि भगवान् नहीं है”.
अब तो आधुनिक योग में हमारे पास तमाम तरह की वैज्ञानिक जानकारी है और इस धरती के लोग अन्तरिक्ष में विचरण कर रहे हैं तब आस्तिक और नास्तिक पर बहस बेकार लगती है जो कर रहे हैं उनका एकमात्र उद्देश्य लोगों का ध्यान अपनी और आकर्षित करना है.
One Comment
me ek orkut friend iswar ke astit lo parsno se dhidh karen ki kosis ki to manine use ye javab diya ye sabhi aastiko ke liye hai
हर प्रशन का उत्तर एक नया प्रशन उत्तपन करता है और आपने तो केवल प्रशन किया है और उत्तर मुझसे ,हाँ तुम इन प्रश्नों का उत्तर ईस्वर को मानते हो लेकिन मैं लिए मात्र एक संभावना,किसी प्रश्न का कोई सार्थक जवाब न हो तो क्या हम उसे ईस्वर पर धकेल दे,आज भी हमें बहुत से प्रश्नों के जवाब नहीं मालूम है तो क्या हम उन्हें ईस्वर पर छोड़ दे नहीं पहले भी बहुत प्रश्नों के जवाब नहीं मालूम थे लेकिन आज मालूम है,मेरे इन सब बातो का एअर्थ यह नहीं ये की मे ईस्वर को नकार रहा हु,और मे एक बात कहना चाहूगा मनुष्य हर जगह प्रश्नों का सहारा लेकर ईस्वर को सिद्ध करने की चेष्टा करता है प्रश्न बदले हो सकते है लेकिन ईस्वर को नाम लेकर वह आगे के प्रश्नों को गिरा देता है अर्थाथ वह प्रशन समाप्त कर देता है जबकि उसके आगे प्रशन शेष है की वह कैसा है,उसका आकार कैसा है ,वह कौन है ,वह कब से है ,क्या वह अंतिम ईस्वर है ,वह कहा से आया है यह सवाल आजीब से लगे गे क्योकि यह उस ईस्वर के विषय मे है जिस पर हम अपने प्रश्नों को विराम लगा देते है,हम ईश्वर की खोज नहीं करते है बस प्रश्नों से संतुष्ट हो जाते है,जबकि प्रशन शेष है इसलिए मे कहता हूँ की खोजी बनो, इसलिए मैं धयान को एक मात्र रास्ता मानता हु जिससे सायद ईस्वर का अनुभव हो सके,ध्यान इस लिए क्योकि इसमें तुमको ज्ञानी नहीं महा अज्ञानी होना है क्योकि तुमको अपने मस्तिस्क सभी विचारो का त्याग करना होगा तो प्रश्नों होने का सवाल ही नहीं उत्पन्न होता,