अपनी आभा खोते हुए समाचार चैनल

हम भारत के लोग मूलत: सीधे होते हैं इसमें कोई शक नहीं है, क्योंकि इसी कारण विदेशियों ने हम पर कई वर्ष तक शासन किया. उनके शासकमें चालाकी और कुटिलता कूट-कूट कर भरी हुई थी जबकि हमारे देश के लोग एकदम सीधे-साधे थे. पर अब अंग्रेजी भाषा के साथ उसकी मानसिकता को भी अपनाने वाले लोग भी अपने ही देश के लोगों को नासमझ समझने लगे हैं . अब देश के समाचार चैनलों को ही लें. विकसित देश की तर्ज पर इस देश में उन्होने यहाँ कार्यक्रम शुरू किये और उनको लोकप्रियता भी बहुत मिली और यह तय था कि उनको विज्ञापन भी मिले. अब सफलता के गुरूर ने इतना आत्ममुग्ध बना दिया है कि उनको यह भ्रम हो गया है कि हम चाहे जैसे कार्यक्रम दें लोग उसे देखने के लिए बाध्य हैं. उन्होने इस बात को भुला दिया है कि मनोरंजन और समाचार दो अलग अलग चीजे हैं.

इस देश में करोड़ों लोग हैं जो केवल समाचार पढने और सुनने में रूचि लेते हैं और मनोरंजन उनके लिए दूसरी प्राथमिकता होती है. समाचार का मतलब केवल देश के ही नहीं बल्कि विदेशों की भी छोटी और बडे खबरों में उनकी रूचि होती है. सामयिक चर्चाओं को वह बहुत रूचि के साथ पढते और सुनते हैं. एसे लोगों की वजह से ही इन समाचार चैनलों को लोकप्रियता मिली. फिर भी समाचार चैनलों वालों को भरोसा नहीं है और वहा मनोरंजन कार्यक्रमों को ठूंसे जा रहे हैं. मनोरंमन चैनलों पर होने वाली गीत-संगीत प्रतियोगिताओं पर अपना आधे से अधिक समय खर्च कर रहे हैं जैसे कोई देश की बड़ी खबर है. सामयिक चर्चाएं जो कि समाचारों का एक बहुत महत्वपूर्ण भाग माना जाता है उसके मामले में तो सभी चैनल कोरे हैं. उन्हें लगता है कि यह तो केवल एक फालतू चीज है. जिस तरह किसी समाचार पत्र और पत्रिका को उसका संपादकीय ताकत देता है और वैसे ही समाचार चैनलों की ताकत उसकी सामयिक चर्चा होती है. जिन्होंने सी एन एन और बीबीसी का प्रसारण देखा है उन्हें यह चैनल वैसे ही नहीं भाते पर अपनी भाषा के कारण सबको अच्छे लगते हैं पर इन चैनलों ने आपने असली प्रशंसकों पर भरोसा करने की बजाए उसे नई पीढ़ी पर ज्यादा भरोसा दिखाया जिसे अभी समाचारों से अधिक महत्व नहीं है.

कई लोग हैं जो शाम को घर बैठकर देश-विदेश की खबरे और उनके बारे में सामयिक चर्चाएं सुनना चाहते हैं पर उन्हें सुनने पढते हैं बस गाने और डांस. अगर कोई कह रहा है कि लोग यही देखना चाहते हैं तो झूठ बोल रहा है. क्योंकि शुरू में तो इन चैनलों पर ऐसे कार्यक्रम नहीं आते थे तब उन्हें कैसे लोकप्रियता मिली. दर असल घर में बैठी महिलाएं और बच्चे इन्हें देखने लगे थे और इसी का फायदा उठाने के लिए विज्ञापन देने वालों ने इन्हें अपने बस में कर लिया. पैसा कमाने में कोई बुराई नहीं है पर इस तरह अपने मूल स्वरूप से जी तरह छेड़छाड़ कर उन्होने यह साबित किया है कि वह विदेशी चैनलों की तरह व्यवसायिक नहीं हैं. मैं आज भी जब भी बीबीसी पर इस देश के बारे में सामयिक चर्चा सुनता हूँ तो एसा लगता है कि उनके प्रसारणों की इसे देश में कोई बराबरी नहीं कर सकता और न सीख सकता है. कई बार शाम को जब मैं समाचार सुनना चाहता हूँ तो निराशा हाथ लगती है.

इन लोगों को पता ही नहीं है कि समाचार केवल देश के ही नहीं विदेश के भी होते है और लोग उन्हें सुनते हैं. फिर यह कहते हैं कि विदेशी चैनलों की तरह यहां नहीं चल सकता- पर यह नहीं बताते कि पहले कैसे चल रहा था. इस मामले में इस देश का दूरदर्शन चैनल आज भी इनसे आगे है जिस पर यह सरकारी का ठप्पा लगाकर उसकी उपेक्षा करते हैं. कम से कम उस पर सामयिक चर्चाएँ तो सुनाने को तो मिल जाती हैं.

इन समाचार चैनलों को अपना सही स्वरूप बनाए रखें के लिए अपने चैनलों पर सामयिक विषयों पर चर्चा के लिए समय भी रखना चाहिए ताकि उनके साथ बौद्धिक वर्ग के दर्शक भी जुडे रहे. .

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