संत कबीर वाणी:मन तो पंछी है

मनुवां तो पंछी भया, उडिके चला अकास
ऊपर ही ते गिरि पडा, मन माया के पास

संत कबीर दास कहते हैं कि मन पक्षी के रूप में भावना रूपी आकाश में ऊंची उड़ान पर चल पड़ता है। लकिन जैसे ही उसे माया का दृश्य नीचे के ओर दिखता है वह ऊपर से नीचे की तरह आकर गिर पड़ता है।
इसका आशय यह है कि हमारा मन हमेशा हमें भटकाता रहता है और हम कभी इधर तो कभी उधर धन, पद और सम्मान पाने के लिए भटकते हैं। यहाँ नहीं तो वहाँ मिलेगा पर जब लगता है कि जहां हम थे वहीं हमे सब कुछ मिलेगा तो भाग कर फिर लौट आते हैं।

मन चलताँ तन भी चलै, ताते मन को घेर
तन मन दोऊ बसि कराइ, होय राईं सुमेर

मन से ही हमारा तन प्रभावित होकर चलता है। जब मन किसी विषय से आकर्षित होता है तो अपनी शरीर को उसी तरफ ले जाते हैं। इसलिये मन को सदैव अपने वश में रखना चाहिए। यदि तन और मन को वश में कर लिया जाये तो इस थोड़े से प्रयास से हम सुमेरु पर्वत के समान लाभ पा सकते हैं।

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