समझौता ग़मों से, दोस्ती नगमों से कर लो

समझौता ग़मों से कर लो

दोस्ती नगमों से कर लो

महफ़िलों में जाकर

इज्जत की उम्मीद छोड़ दो

जहां सब सज-धज के आएं

वहां तुम्हें देखने की किसे फुर्सत है

सभी बोलें कम अपने लबादे

ज्यादा दिखाएँ

सोचें कुछ और

बोलें कुछ और

सुनकर अनुसना कर सकें तो

सबसे बतियाएं

अगर कोई अपने शब्दों से

घाव कर दे

तो उसका इलाज अपनी

तसल्ली और यकीन की

मरहमों से कर लो

कहैं दीपक बापू

अपनी शान दिखाने के चक्कर

तुम कभी न पडना

दूसरों की चमक में

अपने को अंधा न करना

जिनके चेहरे पर जितनी रोशनी है

उतना ही उनके मन में है अँधेरा

तुम अपने यकीन और हिम्मत के

साथ सबके सामने डटे रहो

किसी और में कुछ भी न ढूँढो

साथ अपने हमदमों को कर लो

—————

रिश्तों को नाम नहीं  देना 

——————–

रिश्तों को नाम देना
लगता है आसान
तब निभाने का
नहीं होता अनुमान
जब दौर आता है
मुसीबत का
अपने ग़ैर हो जाते हैं
ग़ैर फेर लेते हैं मुहँ
रिश्ता कामयाब नहीं कर पाता
अपनी वफ़ा का इम्तहान

कहना कितना आसान लगता है
कि तुम दोस्त ऐसे
मेरे भाई जैसे
तुम सखी ऎसी
बिल्कुल बहिन जैसी
जब आती है घडी निभाने की
तब न भाई का पता
न भाई जैसे दोस्त का पता
न बहिन का पता
न बहिन जैसी का पता
गलत निकलते हैं
अपनेपन के अनुमान

जरा सी बात पर
रिश्ते तैयार हो जाते हैं
होने को बदनाम
फिर भी अपनों से दूर
तुम मत होना
बेवफाई का बदला
तुम वफ़ा से ही देना
दुसरे करते हैं
विश्वास से खिलवाड़
तुम मत करना
कोई कितना भी
रिश्ते को बदनाम करे
तुम निभाते रहना
अपनी नीयत पर डटे रहना
चाहे धरती डोले
या गिरने वाला हो आसमान
————–

Post a Comment

Apki email kabhi bhi kisi aur ko diya nahi jata Required fields are marked *

*
*