हास्य कविता -अल्पज्ञानी और कौवा
तीन मित्र पहुंचे एक पहुंचे हुए
सिद्ध के पास लेने ज्ञान
और बोले
‘महाराज ज़िन्दगी से हैं हम परेशान
तमाम तरह के तंत्र-मंत्र किये
तमाम दरबारों पर मत्था टेका
पर हुआ नही कल्याण
हमारे मन को शांति मिले
कृपा कर ऐसा दें ज्ञान’
सिद्ध पुरुष ने तीनों को देखा और कहा
‘मैं कोई चमत्कारों का सौदागर नहीं
जो पल में कर दूं तुम्हारा कल्याण
पहले लूंगा तुम्हारा इम्तहान
फिर दूंगा जीवन का ज्ञान’
तीनों को दी कापी और पेन और कहा
‘इस पर कौवे पर निबंध लिखो
इसमें तुम्हारा लिखा हुआ ही
कराएगा परिचय दस मिनट में ही कि
कौन कितना बुद्धिमान’
तीनों ने दस मिनट में कापी लिखकर
दे दीं गुरू जीं के हाथ में
करने लगे वह उसकी जांच
एक ने लिखा
‘कौवे के बारे में मुझे कुछ भी
लिखना नही आता
मैं तो हूँ गंवार और अनजान ‘
दुसरे ने लिखा
‘कौवा है एसा पंछी
जिसकी सबसे होती है तीक्ष्ण दृष्टी
उस जैसा गुण पा ले
कभी दुख्नी न हो इन्सान’
तीसरे ने लिखा
‘कौवा काला, काली उसकी नीयत
सुबह उसकी आवाज सुन लें तो
पूरा दिन होते परेशान’
सिद्ध पुरुष ने फैसला दिया
‘कौवे के बारे में जो नहीं जानता
उस निरे अज्ञानी को और
जो उसमें दूरदृष्टि देखता है
उस परम बुद्धिमान को
मैं अपना शिष्य बनाऊंगा
जिसने कौवे में दोष देखे
दिखा उसमें एक भी गुण
उस अल्पज्ञानी को
मैं नहीं दे पाऊँगा कोई ज्ञान’
तीनों चले गए तो गुरुजी के
पुराने और प्रिय शिष्य ने पूछा’
‘उस निरे अज्ञानी से तो वह ठीक था
कुछ लिखना-पढना तो जानता था
उसे भी अपना शिष्य बना लेते
कृतार्थ करते उसे देकर ज्ञान’
सिद्ध पुरुष ने कहा
‘उसे अपने अक्षर ज्ञान का था अहंकार
सब विषय में पढा पर उसका था अभिमान
इसलिये रह गया अल्पज्ञानी
पर उस अपढ़ अज्ञानी को यह मालुम है कि
नहीं है इसके पास नहीं कोई ज्ञान
वह लगन से सीखेगा
बुद्धिमान पर तो होगी थोडी मेहनत
पर उस अल्पज्ञानी पर
पूरी जिन्दगी गुजार देता
फिर भी नहीं होता उसे ज्ञान
सदैव अहंकार में डूबा रहता
थोडा सीखता ज्यादा दिखाता
दोष दूसरों में देखे
नहीं होता कभी उसे अच्छाई का भान
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