हास्य कविता -भीड में भेड मत बनो

न तुम भेड़ बनो
न भेडिया
न बनो भीड़ का हिस्सा
भेड़ बनोगे तो कोई
तुम्हें हांक ले जाएगा
भेडिया बनकर तुम भी
शिकार करोगे या हो जाओगे
भीड़ में कितना भी चलो
अपनी पहचान कभी नहीं बना पाओगे
सब और हैं तुम्हें भटकाने वाले
तुम अपने भीम खुद बनो
अपनी जंग खुद लड़ो
तभी जिन्दगी में
आजादी से जी  पाओगे
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वह तुम्हे हांक रहे है
भेड़ समझकर
तुम समझते हो उन्हें
अपना खैरख्वाह
वह तुम्हें भीड़ समझ रहे हैं
कभी जाति  के अस्तित्व का भय
कभी धर्म के मिटने की आशंका
कभी भाषा के गूंगी होने का संदेह
जताकर वह हांका लगा रहे हैं
तुम क्या उन्हें जानते नहीं
रोज देखते हो वह चेहरे
नारे बदलकर सामने आ रहे हैं
फिर भी तुम भेड़ की तरह भीड़ बनकर
उनके पीछे चले जाते हो
क्या तुम नहीं जानते
तुम्हारे घर के चिराग बुझाकर
वह अपने महल
रोशन किये जा रहे हैं
बात एक दिन की हो तो ठीक
वह रोज रोज भीड जुटाये जा रहे है
लोग हैं कि भेडों के तरह
उनके कहने पर चले जा रहे हैं
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कमरे के बाहर और अंदर की
राजनीति में बहुत फ़र्क होता है
बाहर भीड जुटाकर होती है
जमकर संघर्ष की बात
अंदर प्यार से सौदा होता है
जितनी भीड बाहर  एकत्रित
उतना ही उसे ह्टाने का रेट होता है
अंदर का सच कितनों को पता होता है
भेडों की भीड चाहे कितनी भी हो
भेडिया हमेशा अजेय होता है
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भीड में भेड मत बनो

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