अनुभूति से उपजी अभिव्यक्ति
हर फिल्म की कहानी
मोहब्बत पर ही घूमती है
शादी पर ख़त्म हो जाती है
जिन्दगी के सच से
परे रह जाती है
मोहब्बत एक ख़ूबसूरत ख्वाब है
जिन्दगी के सच से
कड़वाहट घुल जाती है
इसीलिये मोहब्बत की कहानी
महंगी बिकती है बाज़ार
जीवन से सच को जो उजागर करे
वह लायब्रेरी में धरी रह जाती है
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पत्थर के शहर में
कांच के घर बनाकर
चेन की तलाश करता है आदमी
वातानुकूलित कमरों में
कृत्रिम सांस लेता आदमी
जंगल उजाडै
पहाडों को कुचला
पेड काटे और फूल बनने से पहले
कलियों को रौंदा
जब वर्षा ऋतू में पिकनिक मनाने
फिर जलप्रपातों को ढूँढता
हुआ दर-बदर होता आदमी
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रोजी-रोटी की तलाश में
निकल जाता है
अपने घर से दूर
दूसरों के लिए महल बनाता
खुद झौंपडी में रहता
कहलाता है मजदूर
अपने ख़ून-पसीने से
सींचता है विकास का वृक्ष
पर उसके लिए लगे
फल होते अति दूर
कालिज और स्कूल के
लिए भवन बनाता
उसका बच्चा शिक्षा से
वंचित रह जाता
चाहता है वह ज्ञान पाना जरूर
फिर भी वह भीख नहीं माँगता
वह सफैदपोश बन कर
लूट नही मचाता
चाहे होता है
निर्धन और मजबूर
मैले-कुचले कपडे पहनकर
आत्मसम्मान से
अपने धर्म और ईमान
के साथ जीता है मजदूर
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