अनाम बनकर न सताओ-आलेख

देश में सात करोड़ इंटरनेट कनेक्शन हैं पर सभी लोग नहीं लिख सकते क्योंकि यूनिकोड पर जानने वालों की बहुत कमी है। हिंदी ब्लाग जगत पर जो लिख रहे हैं उनमे कुछ लोग बहुत अपने ज्ञान पर इतराते हैं तो यही कहना पड़ता है कि उन्होंने बहुत आसानी से ब्लाग लिखना सीख लिया होगा। शायद अब ब्लाग की अच्छी जानकारी आ जाने पर कुछ लोगों के मन में उसके दुरुपयोग की बात आने लगी है जो अब बेनाम टिप्पणियों में रूप में प्रकट हो रही है।
इस लेखक को पाठकों के लिये पढ़ने योग्य ब्लाग लिखने में तीन महीने लग गये थे। हालत यह थी कि ब्लाग स्पाट के ब्लाग से शीर्षक कापी कर वर्डप्रेस के ब्लाग पर रख रहा था क्योंकि वहां हिंदी आना संभव नहीं थी। हिंदी लिखने का तरीका भी विचित्र था। कंप्यूटर पर एक आउटलुक सोफ्टवेयर दिया गया था। उसमें कृतिदेव फोंट सैट कर यूनिकोड टेक्स्ट के द्वारा लिखने पर हिंदी में लिखा वर्डप्रेस के एचटीएमएल में प्रकाशित तो हो जाता था पर उसे लेखक स्वयं ही पढ़ सकता था। बाकी ब्लाग लेखक चिल्ला रहे थे कि भई यह कौनसी भाषा में लिखा है।
उसके बाद ब्लाग स्पाट के यूनिकोड से छोटी कवितायें ही लिख रहा था। सच तो यह है कि ब्लाग लिखने के मामले में हताश हो चुका था। फिर हिम्मत कर रोमन लिपि में टाईप कर काम चलाता रहा। उस समय एक लेख लिखना पहाड़ जैसा लगता था। बाद में कृतिदेव का यूनिकोड मिला तब जाकर आसानी लगने लगी।
बड़े शहरों का पता नहीं पर छोटे शहरों में जहां तक इस लेखक को जानकारी है बहुत कम लोग लिखने की सोचते हैं और उससे भी कम ब्लाग तकनीकी के बारे में जानते हैं। चाहे कोई ब्लाग लेखक कितना भी दावा करे कि वह तो शुरु से ही सब कुछ जानता है पर सच तो यह है कि अनेक वरिष्ठ ब्लाग लेखकों को भी बहुत सारी जानकारी अभी हुई है। आज हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाने वाले नारद फोरम पर आप सूचना न भी दें तो वह आपका हिंदी ब्लाग लिंक कर लेता है पर इसी नारद से यह धमकी मिली थी कि ‘आपका ईमेल पर प्रतिबंध लगा देंगे क्योंकि आप ब्लाग का पता गलत दे रहे हैं। वह मिल नहीं रहा।’
पहले तो ब्लाग का शीर्षक उनको भेजा फिर बिना http:// लगाकर पता दिया। फिर www लगाकर भेजा। इस लेखक ने तय किया नारद पर पंजीकरण नहीं करायेंगे। इधर दो तीन ब्लाग पर गद्य लिखना प्रारंभ कर दिया तो आज के अनेक धुरंधर अपनी टिप्पणी में कहने लगे कि आप नारद पर पंजीकरण क्यों नहीं कराते। अब तो सभी हमारे मित्र हैं अब उनसे क्या पूछें कि आप खुद ही उस समय स्वयं ही क्यों नहीं पंजीकरण कर रहे थे? संभव है उस समय वह ब्लाग का पता कट पेस्ट करना भी नहीं जानते होंगे।
तय बात है कि उनको भी तब यह समझ में नहीं आ रहा होगा कि वर्डप्रेस पर सभी के सामने चमक रहा ब्लाग उनके यहां कैसे लिंक होगा जब तक दूसरा भेजेगा नहीं। वर्ड प्रेस पर किसी वेबसाईट की इमेज कैसे सैट करें यह अभी एक माह पहले हमें पता लगा।
हमारे एक मित्र ब्लाग लेखक मित्र श्री शास्त्री जी के ब्लाग पर कुछ ब्लाग लेखक हमारे मित्र के आई डी से ही टिप्पणी देकर बता रहे थे कि किस तरह उनके नाम का भी दुरुपयोग हो सकता है? हम तो हैरान हो गये यह देखकर! यह सोचकर डरे भी कि कोई हमारे ईमेल की चोरी न भी कर सका तो वह आई डी की चोरी तो आसानी से कर सकता है। हमारे एक मित्र श्री सुरेश चिपलूनकर इस तरह का झटका झेल चुके हैं।
इतना तय है कि इस तरह की हरकतें करने वाला ब्लाग लेखक कोई पुराना ही हो सकता है। हमारे शहर में जान पहचान के लोग ब्लाग लिखने का प्रयास कर रहे हैं और हमसे आग्रह करते हैं कि आप किसी दिन आकर हमारी मदद कर जाओ। कुछ लोगों को जब हिंदी का इंडिक टूल भेजते हैं तो वह गद्गद् हो जाते हैं-उनके लिये यह जादू की तरह है। हम सोचते हैं कि उन ब्लाग लेखकों को हमारे जितना ज्ञान पाने में ही एक वर्ष तो कम से कम लग ही जायेगा। ऐसे में इतना तय है कि कोई नया ब्लाग लेखक ऐसा नहीं कर सकता कि वह दूसरे के आई. डी. का इतनी आसानी से उपयोग करे।
ऐसे में हमारा तो समस्त अंतर्जाल लेखकों से यही आग्रह है कि भई, क्यों लोगों को आतंकित कर रहे हो। हमारे यहां के आम लोग और लेखक किसी झमेले में फंसने से बचते हैं। ऐसे में जहां पैसा एक भी नहीं मिलता हो और इस तरह फंसने की आशंका होगी तो फिर अच्छे खासे आदमी का हौंसला टूट जायेगा। हमारे सभी मित्र हैं, शायद इसलिये आशंकित हैं कि कहीं कुछ लोग इतिहास में अपना नाम जयचंद की तरह तो दर्ज नहीं कराने जा रहे।
वैसे हम तो सारे प्रसिद्ध ब्लाग लेखकों को पढ़ चुके हैं। इतना भी जान गये हैं कि तकनीकी रूप से कितना सक्षम है्-यह भी अनुमान कर लेते हैं कि कौन ऐसा कर सकता है? बिना प्रमाण किये कुछ कहना ठीक नहीं है फिर समस्या यह है कि सभी हमारे मित्र हैं और किसी पर संदेह करना अपराध जैसा है। ब्लाग से संबंधित कुछ समस्याओं का सामना करते हुए इस लेखक को लगता है कि कुछ लोग अब दूसरे को परेशान करने में सक्षम हो गये हैं।
बहरहाल इस तरह की अनाम या छद्मनाम टिप्पणियां करने का प्रचलन बढ़ रहा है पर दूसरे के नाम का दुरुपयोग कर ऐसे ब्लाग लेखक कोई हित नहीं कर रहे हैं। उनकी इस हरकत से होगा यह कि नये लेखकों को प्रोत्साहन देने कठिन हो जायेगा। अंततः इसके नतीजे उनको भी भोगने पड़ेंगे-क्योंकि जब हिंदी ब्लाग जगत इस तरह बदनाम होगा तो फिर नये लेखक नहीं जुड़ेंगे बल्कि पाठक भी कटने लगेंगे। जो अनाम या छद्म नाम से लिख रहे हैं वह भी कोई न कोई असली नाम से ब्लाग तो इस आशा में लिख ही रहे हैं कि कभी न कभी तो वह प्रसिद्ध होंगे पर अगर देश में नकारात्मक संदेश चला गया तो फिर उनकी यह आशा धरी की धरी रह जायेगी। अंत में यहां दोहरा देना ठीक है कि कि हमारे साथ तो सभी मित्रता निभाते आये हैं इसलिये उनसे करबद्ध प्रार्थना है कि वह इस बात को समझें। उनके इस कृत्य पर इस लेखक का मानना है कि यह अपराध नहीं बल्कि उनका बचपना है आशा है कि वह इसे समझकर इससे निहायत फूहड़ हरकत से परे रहेंगे। एक बात तय है कि हम सब आपस में ही हैं और संख्या में कम हैं इसलिये इधर उधर शिकायत करने की बजाय एक दूसरे को समझाकर या डांट कर साध लेते हैं पर यह संख्या बढ़ी और किसी के लिये यह असहनीय हुआ तो सभी जानते हैं कि फोन नंबर के माध्यम से कोई भी पकड़ा जा सकता है। इससे भी ज्यादा तो हिंदी ब्लाग जगत के बदनाम होने की आशंका है जिससे उन लोगों की भी मेहनत पानी में जायेगी जो अनाम टिप्पणियों से ब्लाग लेखकों के लिये तनाव पैदा कर रहे हैं-नये लेखकों को यहां लाने में मुश्किल होगी क्योंकि वैसे भी लोग अन्य प्रकार के आतंकों से डरे हुए हैं। ऐसे में सीधे इस तरह का आतंक झेलने का वह सोच भी नहीं सकते। इस लेखक का दावा है कि अपनी हरकत के बाद वह स्वयं भी बैचेनी अनुभव करते होंगे। हमारी तो स्पष्ट मान्यता है कि आप मजाक या गुस्से में भले ही टिप्पणी दो पर अनाम न रहो। बाकी किसी की मर्जी है जैसा करे।
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भटकाव-व्यंग्य कविता

कभी इधर लटका
कभी उधर अटका
परेशान मन देह को
लेकर जब भटका
तब आत्मा ने कहा
‘रे, मन क्यों तू देह
को हैरान किये जा रहा है
बुद्धि तो है खोटी
अहंकार में अपनी ही गा रहा है
सम्मान की चाह में
ठोकरें खा रहा है
लेकर सर्वशक्तिमान का नाम
क्यों नहीं बैठ जाता
मेरे से बात कर
मैं हूं इस देह को धारण करने वाली आत्मा’
सुन कर मन गुर्राया और बोला
‘मैं तो इस देह का मालिक हूं
जब तक यह जिंदा है
इसके साथ रहूंगा
यह वही करेगी जो
इससे मैं कहूंगा
तू अपनी ही मत हांक
पहले अपनी हालत पर झांक
मैं तो देह के साथ ही
हुआ था पैदा
शरण तू लेने आयी थी
इस देह में
मूझे भटकता देख मत रो
ओ! भटकती आत्मा।’

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उड़ने के लिए पर-लघुकथा

उसकी पुकार पर सर्वशक्तिमान प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा तो वह बोला
‘सर्वशक्तिमान आप तो सब जानते है। आप हमारी मनोकामना पूरी करो इसलिये आपको मानते हैं। मैं ऊंचा उठना चाहता हूं । जमीन पर कीड़ों की तरह बरसों से रैंगते हुए बोर हो गया हूं। मुझे दायें बायें ऊपर नीचे बंगला, गाड़ी, दौलत और शौहरत के पर लगा दो ताकि आकाश में उड़ सकूं। यह जीना भी क्या जीना है?’
सर्वशक्तिमान ने मुस्कराते हुए कहा-‘मैंने तो इस तरह के पर बनाये ही नहीं जिनका नाम बंगला,गाड़ी,दौलत और शौहरत हो। लगता है कि तुम इंसानों ने ही बनाये हैं इसलिये ऐसे पंख तो तुम इस धरती पर ही ढूंढो। जहां तक मेरी जानकारी है ऐसे पर नहीं बल्कि बोझ है जिनके पास होते हैं वह इंसान उनके बचाने की सोचकर और जिनके पास नहीं होते वह उसके ख्वाबों का बोझ ढोता हुआ जमीन पर वैसे ही रैंगता है जैसे कीड़े। जो जीव आकाश में उड़ते हैं वह कभी ऐसी कामना भी नहीं करते। उड़ने के लिये आजादी जरूरी है पर तुम तो बोझ मांग रहे हो और वह मैं तुम्हें नहीं दे सकता।’
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क्रिकेट मैच की चर्चा फ़िर शुरू-आलेख

बंदर चाहे कितना भी बूढ़ा हो जाये गुलाट लगाना नहीं भूलता यही कुछ हालत हम भारतवासियों की है। कोई व्यसन या बुरी आदत बचपन से पड़ जाये तो उससे पीछा नहीं छुड़ा सकते। ऐसी आदतों में क्रिकेट मैच देखना भी शामिल है। 2007 में इस बात का भरोसा नहीं था कि भारत की क्रिकेट टीम एक दिवसीय विश्व कप मैच जीतेगी फिर भी लोग देखते रहे और जब वहां बुरी तरह हारी तब विरक्त होने लगे। मगर पिछले वर्ष बीस ओवरीय क्रिकेट प्रतियोगिता भारत ने जीती तो बच्चे, बड़े और बूढ़े फिर क्रिकेट मैच देखने लगे।
1983 तक भारत में एक दिवसीय मैच को महत्व नहीं दिया जाता था बल्कि पांच दिवसीय मैचों में ही दिलचस्पी लेते थे। उस वर्ष भारत ने एक दिवसीय क्रिकेट प्रतियोगिता क्या जीती? भारत में उसे देखने का फैशन चल पड़ा-यहां खेल खेलना और देखना भी अब फैशनाधारित हो गये हैं-जिसे देखो वही एक दिवसीय मैचों को देखना चाहता था। उस समय जो बाल्यकाल में थे वह पूरी युवावस्था और जो युवावस्था में थे वह वृद्धावस्था तक क्रिकेट मैच टीवी पर देखकर आखें खराब करते रहे। खिलाड़ियों पर जमकर दौलत और शौहरत बरसी। जब दौलत और शौहरत आती है तो अपने साथ विकार और अहंकार भी लाती है। यही हुआ। क्रिकेट का नाम हुआ तो वह बदनाम भी हुआ। देखने वालों में कुछ ऐसे भी तो जो मुफ्त में मजा लेते थे तो कुछ लोगों ने दांव लगाकर पैसे कमाने चाहे। खेल बदनाम हुआ। इधर अपने देश की टीम के सदस्य कमाते रहे पर खेल में पिछड़ते गये। 2007 में बंग्लादेश से हारे तो लोगों का इस खेल से विश्वास ही उठ गया।
एक समय ऐसा लगने लगा कि अब लोग अब इस खेल से विरक्त हो जायेंगे मगर ऐसा नहीं हुआ। लोगों के पास पैसा भी आया तो समय भी फालतू बहुत था। भीड़ फिर मैदान में रहने लगी। टिकिटों की मारामारी यथावत थी मगर इस देश में फालतू लोगों की संख्या को देखते हुए भी यह लोकप्रियता यथावत होने का प्रमाण नहीं था। इस खेल को बचपन और युवावस्था से केवल देख रहे लोग इससे विरक्त होते जा रहे थे। क्रिकेट की चर्चा ही एकदम बंद हो गयी।
पिछले साल भारत ने बीस ओवरीय क्रिकेट का विश्व कप क्या जीता लोगों के मन मस्तिष्क की वापसी इस खेल के प्रति हो गयी। जब भारत बीस ओवरीय प्रतियोगिता में खेल रहा था तब लोगों का आकर्षण इसके प्रति बिल्कुल नहीं था पर जैसे ही वह जीता सभी नाचने लगे। भारतीय टीम जो एक खोटा सौ का नोट हो गयी थी और पचास में भी नहीं चल रही थी बीस में क्या चली फिर सौ की हो गयी। लोग पुरानी टीम की चाल और चरित्र भूल गये। पहले प्रेमी रहे लोग जो अब क्रिकेट से चिढ़ने लगे थे फिर उसकी तरफ आकर्षित हो गये। भारत के लोगों में आकर्षण दोबारा पैदा हुआ तो क्रिकेट के व्यवसायियों की बाछें खिल गयीं। अब तो क्लब स्तर की टीमें बनाकर वह मैचा करवा रहे हैं जिसमें उनको भारी आय हो रही है।
इससे क्या जाहिर होता है? यही कि इस देश में लोग विजेता को सलाम करते हैं। जीत का आकर्षण भारतीयों की चिंतन क्षमता का हर लेता है। भारतीयों की मानसिकता अब विश्व में व्यवसायियों से छिपी नहीं है। दुनियां का सबसे लोकप्रिय खेल फुटबाल हैं। उसमें भारतीय टीम की उपस्थिति नगण्य है। वैसे कुछ फुटबाल व्यवसायियों ने क्रिकेट के संक्रमण काल में यह प्रयास किया था कि भारत में भी फुटबाल लोकप्रिय हो ताकि यहां के लोगों के जज्बातों का आर्थिक दोहन किया जा सके मगर उसके सफल होने से पहले ही बीस ओवरीय क्रिकेट मैचों के विश्व कप जीतने से भारतीय खेल प्रेमी (?) उसी तरफ लौट आये।
अब हालत यह है कि हम जैसा आदमी जो कि क्रिकेट मैचों से अलविदा कह चुका था वह भी मैच तिरछी नजर से देख लेता है। ऐसे में जब देश की टीम जीत रही हो तो फिर नजरें जम ही जाती हैं। यह इसलिये हुआ कि कहीं चार लोगों में उठना बैठना होता है तो वह अब फिर से क्रिकेट की चर्चा करने लगे हैं। इतना ही नहीं भाई लोग क्लब स्तर के मैच भी देखने लगे हैं। उमरदराज हो गये हैं पर क्रिकेट खेल से लगाव नहीं खत्म हुआ। पहले तो चलो देश की टीम की चर्चा करते थे पर अब क्लब स्तर के मैच-वह भी इस देश से बाहर हो रहे हों तब-देखकर विदेशी खिलाड़ियों की चर्चा करते हैं। मतलब यह बीस ओवरीय प्रतियोगिता की जीत ने भारत के बूढ़े और अधेड़ क्रिकेट प्रेमियों को फिर खींच लिया है। तब यही कहना पड़ता है कि ‘बंदर कितना भी बूढ़ा हो जाये गुलाट खाना नहीं भूलता’, वही हालत इस देश की भी है। जब चर्चा चारों तरफ हो रही हो तो भला कब तक कोई आदमी निर्लिप्त भाव से रह सकता है।
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हास्य कविता का प्रेरक गुस्सा-हास्य व्यंग्य कविता (hasya kavita)

हास्य कवि ढूंढ रहा था
कोई जोरदार कविता
मिल गयी पुरानी प्रेमिका
जिसका नाम भी था कविता।

उसे देखते ही चहकते हुए वह बोली
‘’अरे, कवि
तुम भी अब बुढ़ाने लगे हो
फिर भी बाज नहीं आते
हास्य कविता गुड़गुड़ाने लगे हो
शर्म नहीं आती
पर मुझे बहुत आती
जब पति के सामने
तुम्हारे पुराने प्रेम का किस्सा सुनाती
तब वह बिफर कर कहते हैं
‘क्या बेतुके हास्य कवि से इश्क लड़ाया
मेरा जीवन ही एक मजाक बनाया
कोई श्रृंगार रस वाला कवि नहीं मिला
जो ऐसे हास्य कवि से प्रेम रचाया
जिसका सभी जगह होता गिला
कहीं सड़े टमाटर फिकते हैं
तो कहीं अंड़े पड़ते दिखते हैं’
उनकी बात सुनकर दुःख होता है
सच यह है तुम्हारी वजह से
मैंने अपना पूरा जीवन ही नरक बनाया
फिर भी इस बात की खुशी है
कि मेरे प्यार ने एक आदमी को कवि बनाया’

उसकी बात सुनकर कवि ने कहा
‘मेरे बेतुके हास्य कवि होने पर
मेरी पत्नी को भी शर्म आती है
पर वह थी मेरी पांचवी प्रेमिका
जिसके मिलन ने ही मुझे हास्य कवि बनाया
प्रेम में गंभीर लगता है
पर मिलन मजाक है
यह बाद में समझ आया।
गलतफहमी में मत रहना कि
तुमने कवि बनाया।
तुम्हारे साथ अकेले नहीं
बल्कि पांच के साथ मैंने प्रेम रचाया।
तुम्हारी कद काठी देखकर लगता है कि
अच्छा हुआ तुमसे विरह पाया
कहीं हो जाता मिलन तो
शायद गमों में शायरी लिखता
जिंदगी का बोझ शेरों में ढोता दिखता।
भले ही घर में अपनी गोटी गलत फिट है
पर हास्य कविता कुछ हिट है
दहेज में मिला ढेर सारा सामान
साथ में मिला बहुत बड़ा मकान
जिसके किराये से घर चलता है
उसी पर अपना काव्य पलता है
तुमसे भागकर शादी की होती
तो मेरी जेब ही सारा बोझ ढोती
तब भला कौन सुनता गम की कविता
पांचवीं प्रेमिका और वर्तमान पत्नी भी
कम नहीं है
पर उसके गुस्से ने
मुझे हास्य कवि बनाया

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मनोरंजन और खेल का अर्थशास्त्र-हास्य व्यंग्य

क्रिकेट का अर्थशास्त्र कई लोगों की समझ में नहीं आया। एक समय क्रिकेट के दीवाने इस देश में बहुत थे पर उनको इस खेल से कुछ लेना था तो केवल दिल की खुशी-क्योंकि देश के प्रति जज्बात जुड़े होत थे। मगर अब दीवानगी जिन युवाओं को है वह केवल इसलिये है क्योंकि वह वैसा ही अमीर क्रिकेट खिलाड़ी बनना चाहते हैं जैसे कि वह पर्दे पर देखते हैं। बाकी जो लोग देख रहे हैं वह केवल टाईम पास की दृष्टि से देखते हैं इनमें वह भी लोग हैं जिनका इस खेल से मोहभंग हो गया था पर बीस ओवरीय विश्व कप के बाद वह फिर इस खेल की तरफ आकृष्ट हुए हैं। जहां तक क्रिकेट में देश प्रेम ढूंढने वाली बात है तो वह बेकार है।

पूरे विश्व में सभी जगह मंदी का प्रकोप है। सभी कंपनियां मंदी को रोना रो रही हैं पर क्रिकेट के प्रयोजन के लिये वह सब तैयार हैं। सच बात तो यह है कि क्रिकट अब केवल एक खेल नहीं हैं बल्कि एक व्यवसाय है। इसमें जो खिलाड़ी आ रहे हैं वह खेल प्रेम की वजह से कम कमाने की भावना से अधिक सक्रिय हैं। जब किसी नये खिलाड़ी को लोग देखते हैं तो कहते हैं कि‘ देखो आ गया नया माडल’।
कभी क्रिकेट की बात याद आती है तो अपनी दीवानगी अब अजीब लगती है। विश्व कप 2007 प्रारंभ होने से पूर्व जब भारतीय टीम वेस्टइंडीज रवाना हो रही थी तब ही उसके बुरे लक्षण दिखने लगे थे पर भारतीय प्रचार माध्यम है कि मान ही नहीं रहे थे। वह लगे थे बस इस बात पर कि भारतीय टीम जीतेगी और जरूर जीतेगी। उस समय भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाडि़यों की शारीरिक भाषा देखकर ही लग रहा था कि वह पस्त टीम के सदस्य है। मैंने उस समय कृतिदेव फोंट में एक लेख लिखा था ‘क्रिकेट में सब चलता है यार,’। यूनिकोड में होने के कारण उसे लोग पढ़ नहीं पाये और अब वह पता नहीं कहां है। बहरहाल उसमें इस खेल से जो मुझे निराशा हुई थी उसकी खुलकर चर्चा की थी। इस खेल पर जितना मैंने समय खर्च किया उतना अगर वह साहित्य लेखन में खर्च करता तो शायद बहुत बड़े उपन्यास लिख लिये होते। उस समय मुझे अपने ब्लाग लिखने के तरीके के बारे में अधिक मालुम नहीं था। इधर विश्व कप प्रतियोगिता शुरु होने वाली थी और मैं उस पर ही लिखता जा रहा था। शीर्षक तो मैंने ब्लागस्पाट पर लिखे पर अपनी अन्य सामग्री कृतिदेव में लिखी। ब्लाग स्पाट के ब्लाग पर अंग्रेजी फोंट की जगह कृतिदेव फोंट सैट कर दिये जिससे मेरे पाठ मुझे तो पढ़ाई आते थे पर दूसरों को समझ में नहीं आते थे। यही हाल वर्डप्रेस के ब्लागों का भी था। उसे अपने UTF-8 में कृतिदेव में लिखकर प्रकाशित कर देता था। वह भी मेरे पढ़ाई में आते थे पर बाकी लोग उनको देखकर नाराज हो गये। उन्होंने मुझसे संवाद कायम किया पर मेरे जवाब उनकी समझ से परे थे।
इसी उठापटक के चलते भारतीय टीम हार गयी। मैंने सोचा था कि ब्लाग तैयार कर लूं फिर जमकर दूसरे दौर के क्रिकेट मैच देखूंगा पर वाह री किस्मत! वह पहले ही ढेर हो गयी। तब पहला बड़ा पाठ ‘मेमनों ने किया शेरों का शिकार‘ यह लेख मैंने लिखा’। नारद ने अपने यहां एक विशेष स्तंभ बनाया था जो क्रिकेट के पाठ अपने यहां रख लेता था। मेरे पाठ वहां पर देखकर अन्य ब्लाग लेखक मित्र भड़क गये। होते होते मैंने ब्लाग स्पाट का हिंदी टूल समझ लिया और पहला पाठ पढ़ने योग्य वह भी क्रिकेट पर लिखा। उससे एक पाठक खुश हो गया पर उसने एक बड़े खिलाड़ी के लिये अभद्र शब्द लिख दिया। मैंने वह अभद्र शब्द हटाने की वजह से अपना पूरा पाठ ही हटा लिया।

उसके बाद ब्लाग लिखने की राह पर चलते गये तो लगा कि अच्छा ही हुआ अब जबरदस्ती क्रिकेट में मन नहीं लगाना पड़ेगा। इससे इतना दुःख हुआ कि टीम की हार के बाद प्रचार माध्यमों की हालत देखकर अच्छा लगा। उन्होंने क्रिकेट खिलाडि़यों के विज्ञापन ही हटा लिये। यह क्रम करीब आठ महीने चला पर जैसे ही बीस ओवरीय विश्व कप भारत ने जीता तो प्रचार माध्यमों को संजीवनी मिल गयी। भारत के तीन कथित महान खिलाडि़यों को फिर से येनकेन प्रकरेण टीम में लाया गया जो बीस ओवरीय विश्व कप प्रतियोगिता में शामिल नहीं हुए। उस प्रतियोगिता में भारत के जीतनं पर यह आशंका हो गयी थी कि एक बार प्रचार माध्यम फिर क्रिकेट को भुनाना चाहेंगें। वही हुआ भी। एक बेकार सी कविता‘बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा’ इसी उद्देश्य से लिखी गयी थी कि अब उन तीन खिलाडि़यों को फिर से अवसर मिलेगा जिनको टीम से हटाने की बात चल रही है। हैरानी की बात यह है कि आज जब उस कविता को देखता हूं तो मुझे स्वयं ही बेसिरपैर की लगती है पर वह फिर जबरदस्त हिट लेती है। फिर मैं सोचता हूं कि अगर वह बेसिरपैर की है तो भला इस क्रिकेट नाम के खेल का कौनसा सिर पैर है। यह न तो खेल लगता है न कोई व्यापार। हर कोई इसका अपने हिसाब से उपयोग कर रहा है। कभी कभी कुछ महान हस्तियां क्रिकेट के विकास की बात करती है पर क्या इस खेल को भला किसी विकास या प्रचार की आवश्यकता है?
आज हालत यह है कि जिस दिन मुझे पता लग जाता है कि क्रिकेट मैच है उस दिन कोई भी टीवी समाचार चैनल खोलने की इच्छा नहीं होती सिवाय दिल्ली दूरदर्शन के। वजह मैच वाले दिन टीवी चैनल एक घंटे मेें से कम से कम तीस मिनट तो मैच पर लगाते ही हैं-बाकी के लिये लाफ्टर शो और फिल्म के समाचार उनके पास तो वेेस ही होते हैं। टीम जीत जाती है तो अगले दिन अखबार के मुखपृष्ठ देखते ही नीचे वाली खबरों में ध्यान स्वतः चला जाता है क्योंकि पता है कि ऊपर जो खबर है वह मेरे पढ़ने लायक नहीं है। वहां किसी बड़े खिलाड़ी का गेंद फैंकते या बल्लेबाजी करते हुए बड़ा फोटो होता है। एक दिवसीय मैंचों की विश्व रैकिंग में भारत नंबर एक पर पहुंच गया है इस पर सभी अखबारों ने प्रसन्नता जाहिर की है। ठीक है 2006 में शर्मनाक हार को भुलाने के लिये उनको कोई तो बहाना चाहिये।
दरअसल अनेक लोगों का मन तब ही इस खेल से विरक्त होने लगा था जब टीम के सदस्यों पर फिक्सिंग वगैरह की आरोप टीम के पुराने सदस्यों ने ही लगाये थे। कुछ खिलाडि़यों पर प्रतिबंध भी लगा। सच क्या है कोई नहीं जानता। क्या क्रिकेट जनता के पैसों से चल रहा है या विज्ञापन उसका आधार है? कोई नहीं जानता। कुछ लोगों को यह खेल अब अपने ऊपर जबरन थोपना लगता है क्योंकि उनको समाचार चैनलों और समाचार पत्र पत्रिकाओं पर वह सब सामग्री देखनी पड़ती है जिसे वह देखना नहीं चाहते।
फिर भी वह देखते हैं। वह बिचारे करें भी क्या? सभी लोगों को समय काटने के लिये ब्लाग लिखना तो आता नहीं। हालांकि अनेक लोग यह सवाल तो करते ही हैं कि आखिर इस मंदी में भी यह क्रिकेट चल कैसे रहा है? लोगों के पास न तो चिंतन और मनन का समय है और न क्षमता कि इसके क्रिकेट के अर्थशास्त्र पर दृष्टिपात करें। इसलिये क्रिकेट है कि बस चल रहा है तो चल रहा है।
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श्रीगीता संदेश -दूसरे धर्म का परिणाम सदैव भयावह रहता है

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।
हिंदी में भावार्थ-
श्रीगीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि अपने धर्म से पराया धर्म श्रेष्ठ लगता है तब उसको कभी श्रेय न प्रदान करें। अपना धर्म संपन्न नहीं दिखता पर दूसरे का धर्म तो हमेशा भयावह परिणाम देने वाला होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अक्सर लोग धर्म को लेकर बहस करते हैं पर उसका मतलब नहीं समझते। हर टीवी चैनल, अखबार और पत्रिका को उठाकर देख लें धर्म को लेकर तमाम सतही बातें लिखी मिल जायेंगी जिनका सार तो विषय सामग्री प्रस्तुत करने वाले स्वयं नहीं जानते न ही पाठक या दर्शक समझने का प्रयास करते हैं। कई बार तो ऐसा लगता है कि धर्म बिकने, खरीदने, और लाभ हानि वाली व्यापारिक वस्तु हो गयी है। अनेक प्रचार माध्यम बकायदा धर्मपरिवर्तित कर जिंदगी में भौतिक उपलब्धि प्राप्त करने वाले लोगों का प्रचार करते हैं। इतना ही नहीं धर्म परिवर्तित कर विवाह करने पर लड़कियों को वीरांगना करार दिया जाता है। यह केवल प्रचार है जिससे बुद्धिमान भारतीय तत्व ज्ञान से दिखने वाले कटु सत्यों से भागते हुए करते हैं क्योंकि भारतीय अध्यात्म ज्ञान जीवन के ऐसे रहस्यों को उद्घाटित करने के सत्यों से भरा पड़ा है जिसको जानने वाला धर्म न पकड़ता है न छोड़ता है।
हमारे भारतीय अध्यात्म में स्पष्ट रूप से धर्म को कर्म से जोड़ा गया न कि कर्मकांडों से। कर्मकांडों और रूढ़ियों को लेकर भारतीय धर्मों की आलोचना करने वाले मायावी लोग उस तत्व ज्ञान को जानते नहीं है पर उनको यह पता है कि अगर उसका प्रचार हो गया तो फिर उनकी माया धरी की धरी रह जायेगी।
एक मजे की बात है कि धर्म परिवर्तित दूसरा धर्म अपनाने वाली युवतियां विवाह कर लेती हैं इसमें बुराई नहीं है पर उसके बाद उनको जब दूसरे धर्म के संस्कार अपनाने पड़ते हैं तब उन पर क्या गुजरती है इस पर कोई प्रकाश नहीं डालता। दरअसल फिल्मों की कहानियों को केवल विवाह तक ही सीमित देखने वाले बुद्धिजीवी उससे आगे कभी सोच ही नहीं पाते। यही कारण है कि विवाह के बाद जब पराये धर्म के कर्मकांडों को मन मारकर अपनाना पड़ता है तब उन युवतियों की क्या कहानी होती है इस पर कोई भी आज का महापुरुष नहीं लिखता।
दरअसल धर्म दिखाने या छूने की वस्तु नहीं बल्कि हृदय में की जाने वाली अनुभूति है। बचपन से जिस धर्म के संस्कार पड़ गये उनसे पीछा नहीं छूटता विवाह या अन्य किसी भौतिक प्राप्ति के लिये धर्म परिवर्तन तो लोग कर लेते हैं उसके बाद जो उनपर तनाव आता है उसकी चर्चा भी गाहे बगाहे करते हैं। एक मजे की बात है कि कथित आधुनिक लोग धर्म परिवर्तन करते हैं पर उसके साथ अपना नाम और इष्ट भी परिवर्तित कर लेते हैं। मतलब वह दूसरे धर्म के के बंधन को ओढ़ते है और दावा आजादी का करते हैं। सच बात तो यह है कि धर्म का आशय सही मायने में भारतीय अध्यात्म में ही है जिसका आशय है कि बिना लोभ लालच और कामना के भगवान की भक्ति करते हुए जीवन व्यतीत करना न कि उनके वशीभूत होकर धर्म मानना। दूसरी बात यह है कि धर्म परिवर्तित करने वाले अपनी पहचान गुम होने के भय से अपना पुराना नाम भी साथ लगाते हैं। दूसरे के धर्म के क्या कर्मकांड हैं किसी को पता नहीं होता? इसलिये उस धर्म के लोग मजाक उड़ाते हैं जिसे अपनाया गया है।

संत कबीरदास और चाणक्य भी कहते हैं कि दूसरे धर्म या समुदाय का आसरा लेना हमेशा दुःख का कारण होता है। किसी भी व्यक्ति या समाज को बाहर से देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि उसका धर्म कैसा है या वह उसे कितना मानता है। वह तो जब कोई नया आदमी धर्म परिवर्तन कर उस धर्म में जाता है तब उसे पता लगता है कि सच क्या है? इसके बावजूद यह सच है कि दूसरा धर्म नहीं अपनाना चाहिये क्योंकि उससे तनाव बढ़ता है। हालांकि आजकल प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्षा लाभों के लिये अनेक लोग धर्म बदल लेते हैं। वह भले ही दावा करें कि उनको ज्ञान प्राप्त हुआ है पर यह झूठ है। जिसे ज्ञान प्राप्त होता है वह धर्म से परे होकर योग साधना, ध्यान और भक्ति में रहते हुए निष्काम कर्म और निष्प्रयोजन दया करता है न कि धर्म छोड़ने या पकड़ने के चक्कर में पड़ता है।
हां एक बात महत्वपूर्ण है कि भारतीय धर्म व्यापक दृष्टिकोण वाले होते हैं क्योंकि इसमें किसी प्रकार की भाषा या उस पर आधारित नाम या कर्मकांड की बाध्यता नहीं होती। हमारा श्रीगीता ग्रंथ दुनिया का अकेला ऐसा धर्म ग्रंथ है जिसमें ज्ञान के साथ विज्ञान की भी चर्चा है। इसमें निरंकार परमात्मा की निष्काम भक्ति के साथ ही अन्य जीवों पर निष्प्रयोजन दया करने का भी संदेश है। यह मनुष्य को विकास की तरफ जाने के लिये प्रेरित करने के साथ विनाश से भी रोकता है।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

प्रचार माध्यमों में संस्कृति-आलेख

समाज को सुधारने की प्रयास हो या संस्कृति और संस्कारों की रक्षा का सवाल हमेशा ही विवादास्पद रहा है। इस संबंध में अनेक संगठन सक्रिय हैं और उनके आंदोलन आये दिन चर्चा में आते हैं। इन संगठनों के आंदोलन और अभियान उसके पदाधिकारियेां की नीयत के अनुसार ही होते हैं। कुछ का उद्देश्य केवल यह होता है कि समाज सुधारने के प्रयास के साथ संस्कृति और संस्कारों की रक्षा का प्रयास इसलिये ही किया जाये ताकि उसके प्रचार से संगठन का प्रचार बना रहे और बदले में धन और सम्मान दोनों ही मिलता रहे। कुछ संगठनों के पदाधिकारी वाकई ईमानदार होते हैं उनके अभियान और आंदोलन को सीमित शक्ति के कारण भले ही प्रचार अधिक न मिले पर वह बुद्धिमान और जागरुक लोगों को प्रभावित करते हैं।
ईमानदारी से चल रहे संगठनों के अभियानों और आंदोलनों के प्रति लोगों की सहानुभूति हृदय में होने के बावजूद मुखरित नहीं होती जबकि सतही नारों के साथ चलने वाले आंदोलनों और अभियानों को प्रचार खूब मिलता है क्योंकि प्रचार माध्यम उनको अपने लिये भावनात्मक रूप से ग्राहकों को जोड़े रखने का एक बहुत सस्ता साधन मानते हैं। ऐसे कथित अभियान और आंदोलन उन बृहद उद्देश्यों को पूर्ति के लिये चलते हैं जिनका दीर्घावधि में भी पूरा होने की संभावना भी नहीं रहती पर उसके प्रचार संगठन और पदाधिकारियों के प्रचारात्मक लाभ मिलता है जिससे उनको कालांतर में आर्थिक और सामाजिक उपलब्धि प्राप्त हो जाती है।

मुख्य बात यह है कि ऐसे संगठन दीवारों पर लिखने और सड़क पर नारे लगाने के अलावा कोई काम नहीं करते। उनके प्रायोजक भी इसकी आवश्यकता नहीं समझते क्योंकि उनके लिये यह संगठन केवल अपनी सुरक्षा और सहायता के लिये होते हैं और उनको समझाईश देना उनके लिये संभव नहीं है। अगर इस देश में समाज सुधार के साथ संस्कार और संस्कृति के लिये किसी के मन में ईमानदारी होती तो वह उन स्त्रोतों पर जरूर अपनी पकड़ कायम करते जहां से आदमी का मन प्रभावित होता है।
भाररीय समाज में इस समय फिल्म, समाचार पत्र और टीवी चैनलों का बहुत बड़ा प्रभाव है। भारतीय समाज की नब्ज पर पकड़ रखने वाले इस बात को जानते हैं। लार्ड मैकाले ने जिस तरह वर्तमान भारतीय शिक्षा पद्धति का निर्माण कर हमेशा के लिये यहां की मानसिकता का गुलाम बना दिया वही काम इन माध्यमों से जाने अनजाने हो रहा है इस बात को कितने लोगों ने समझा है?
पहले हिंदी फिल्मों की बात करें। कहते हैं कि उनमें काला पैसा लगता है जिनमें अपराध जगत से भी आता है। इन फिल्मों में एक नायक होता है जो अकेले ही खलनायक के गिरोह का सफाया करता है पर इससे पहले खलनायक अपने साथ लड़ने वाले अनेक भले लोगों के परिवार का नाश कर चुका है। यह संदेश होता है एक सामान्य आदमी के लिये वह किसी अपराधी से टकराने का साहस न करे और किसी नायक का इंतजार करे जो समाज का उद्धार करने आये। कहीं भीड़ किसी खलनायक का सफाया करे यह दिखाने का साहस कोई निर्माता या निर्देशक नहीं करता। वैसे तो फिल्म वाले यही कहते हैं कि हम तो जो समाज में जो होता है वही दिखाते हैं पर आपने देखा होगा कि अनेक ऐसे किस्से हाल ही में हुए हैं जिसमें भीड़ ने चोर या बलात्कारी को मार डाला पर किसी फिल्मकार ने उसे कलमबद्ध करने का साहस नहीं दिखाया। संस्कारों और संस्कृति के नाम पर फिल्म और टीवी चैनलों पर अंधविश्वास और रूढ़वादितायें दिखायी जाती हैं ताकि लोगों की भारतीय धर्मों के प्रति नकारात्मक सोच स्थापित हो। यह कोई प्रयास आज का नहीं बल्कि बरसों से चल रहा है। इसके पीछे जो आर्थिक और वैचारिक शक्तियां कभी उनका मुकाबला करने का प्रयास नहीं किया गया। हां, कुछ फिल्मों और टीवी चैनलों के कार्यक्रमों का विरोध हुआ पर यह कोई तरीका नहीं है। सच बात तो यह है कि किसी का विरोध करने की बजाय अपनी बात सकारात्मक ढंग से सामने वाले के दुष्प्रचार पर पानी फेरना चाहिये।

एक ढर्रे के तहत टीवी चैनलों और फिल्मों में कहानियां लिखी जाती हैं। यह कहानी हिंदी भाषा में होती है पर उसको लिखने वाला भी हिंदी और उसके संस्कारों को कितना जानता है यह भी देखने वाली बात है। मुख्य बात यह है कि इस तरह के कार्यक्रमों के पीछे जो आर्थिक शक्ति होती है उसके अदृश्य निर्देशों को ध्यान में रखा जाता है और न भी निर्देश मिलें तो भी उसका ध्यान तो रखा ही जाता है कि वह किस समुदाय, भाषा, जाति या क्षेत्र से संबंधित है। विरोध कर प्रचार पाने वाले संगठन और उनके प्रायोजक-जो कि कोई कम आर्थिक शक्ति नहीं होते-स्वयं क्यों नहीं फिल्मों और टीवी चैनलों के द्वारा उनकी कोशिशों पर फेरते? इसके लिये उनको अपने संगठन में बौद्धिक लोगों को शामिल करना पड़ेगा फिर उनकी सहायता लेने के लिये उनको धन और सम्मान भी देना पड़ेगा। मुश्किल यही आती है कि हिंदी के लेखक को एक लिपिक समझ लिया है और उसे सम्मान या धन देने में सभी शक्तिशाली लोग अपनी हेठी समझते हैं। यकीन करें इस लेखक के दिमाग में कई ऐसी कहानियां हैं जिन पर फिल्में अगर एक घंटे की भी बने तो हाहाकार मचा दे।

इस समाज में कई ऐसी कहानियां बिखरी पड़ी हैं जो प्रचार माध्यमों में सामाजिक एकता, समरसता और सभी धर्मों के प्रति आदर दिखाने के कथित प्रयास की धज्जियां उड़ा सकती है। प्यार और विवाह के दायरों तक सिमटे हिंदी मनोरंजन संसार को घर गृहस्थी में सामाजिक, धार्मिक और अन्य बंधन तोड़ने से जो दुष्परिणाम होते हैं उसका आभास तक नहीं हैं। आर्थिक, सामाजिक और दैहिक शोषण के घृणित रूपों को जानते हुए भी फिल्म और टीवी चैनल उससे मूंह फेरे लेते हैं। कटु यथार्थों पर मनोरंजक ढंग से लिखा जा सकता है पर सवाल यह है कि लेखकों को प्रोत्साहन देने वाला कौन है? जो कथित रूप से समाज, संस्कार और संस्कृति के लिये अभियान चलाते हैं उनका मुख्य उद्देश्य अपना प्रचार पाना है और उसमें वह किसी की भागीदारी स्वीकार नहीं करते।
टीवी चैनलों पर अध्यात्मिक चैनल भी धर्म के नाम पर मनोरंजन बेच रहे हैं। सच बात तो यह है कि धार्मिक कथायें और और सत्संग अध्यात्मिक शांति से अधिक मन की शांति और मनोरंजन के लिये किये जा रहे हैं। बहुत लोगों को यह जानकर निराशा होगी कि इनसे इस समाज, संस्कृति और संस्कारों के बचने के आसार नहीं है क्योंकि जिन स्त्रोतों से प्रसारित संदेश वाकई प्रभावी हैं वहां इस देश की संस्कृति, संस्कार और सामाजिक मूल्यों के विपरीत सामग्री प्रस्तुत की जा रही है। उनका विरोध करने से कुछ नहीं होने वाला। इसके दो कारण है-एक तो नकारात्मक प्रतिकार कोई प्रभाव नहीं डालता और उससे अगर हिंसा होती है तो बदनामी का कारण बनती है, दूसरा यह कि स्त्रोतों की संख्या इतनी है कि एक एक को पकड़ना संभव ही नहीं है। दाल ही पूरी काली है इसलिये दूसरी दाल ही लेना बेहतर होगा।

अगर इन संगठनों और उनके प्रायोजकों के मन में सामाजिक मूल्यों के साथ संस्कृति और संस्कारों को बचाना है तो उन्हें फिल्मों, टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में अपनी पैठ बनाना चाहिये या फिर अपने स्त्रोत निर्माण कर उनसे अपने संदेशात्मक कार्यक्रम और कहानियां प्रसारित करना चाहिए। दीवारों पर नारे लिखकर या सड़कों पर नारे लगाने या कहीं धार्मिक कार्यक्रमों की सहायता से कुछ लोगों को प्रभावित किया जा सकता है पर अगर समूह को अपना लक्ष्य करना हो तो फिर इन बड़े और प्रभावी स्त्रोतों का निर्माण करें या वहां अपनी पैठ बनायें। जहां तक कुछ निष्कामी लोगों के प्रयासों का सवाल है तो वह करते ही रहते हैं और सच बात तो यह है कि जो सामाजिक मूल्य, संस्कृति और संस्कार बचे हैं वह उन्हीं की बदौलत बचे हैं बड़े संगठनों के आंदोलनों और अभियानों का प्रयास कोई अधिक प्रभावी नहीं दिखा चाहे भले ही प्रचार माध्यम ऐसा दिखाते या बताते हों। इस विषय पर शेष फिर कभी।
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लड़की, लड़का और गिरगिट की नज़र-हास्य व्यंग्य

शाम का समय था और उन शराब के नशे में धुत उन दोनों लड़कों में एक ने राह पर अकेले जा रही उस लड़की का हाथ पकड़ लिया। सामान्य भाषा में कहें तो उसे छेड़ना भी कहते हैं। वह चिल्लाई तो वहां से गुजर रहे दो शहर पहरेदारों की नजर उस पर पड़ गयी। वह सीटी बजाते हुए लड़कों पकड़ने दौड़े। एक लड.का वहां से भाग निकला। दूसरे को मौका नहीं मिला इसलिये लड़के अकड़ कर खड़ा हो गया। दोनों पहरेदारों ने लड़के का हाथ पकड़ लिया और बोले-‘चलो बड़े घर! देखों तुम्हारी क्या हालत करते है?’

लड़का अकड़ कर बोला-‘पहले हाथ छोड़ो! तुम जानते नहीं मैं कौन हूं?’

पहले पहरेदार ने कहा-‘अबे चुप रह! यहां तुम जैसा हर लड़का यहां के मशहूर आदमी शहर साहब का बेटा होने का नाटक करता हैं। ं हर इलाके में शहर साहब का आदमी अगर यही करने लगा तो चल लिया हमारा कानून। चलो बड़े घर! सब पता लग जायेगा। कैसे लड़की छेड़ी जाती है।’

उस लड़के ने कहा-‘कौनसी लड़की? कोई सबूत है तुम्हारे पास?’

पहरेदारों ने इधर उधर देखा। वह लड्र+की वहां से जा चुकी थी। तब एक पहरेदार ने कहा-‘लड़की का यहां होना अब जरूरी नहीं है। बड़े घर चल तेरे को सब बता देंगे। एक नहीं तो दूसरी लड़की बुला लेंगे।’

पहले लड़के ने कहा-‘अरे, तुम अपने लिये मुसीबत मोल ले रहे हो। तुम्हारी वर्दी उतर जायेगीं! मैं वास्तव में शहर साहब का बेटा हूं। बड़े शहर साहब का पोता हूं।’

दोनों पहरेदारों की घिग्घी बंध गयी थी। क्या न क्या करें। पहले पहरेदार ने दूसरे से कहा-‘बड़े घर पर बड़े पहरेदार साहब को फेान लगाकर पता करे कि क्या किया जाये। इसे इतनी मेहनत से पकड़ कर वहां ले चलें और फिर छोड़ना पड़े। खालीपीली अपनो धंधा भी चैपट हो और डांट फटकार भी सुनने को मिले।’

उसी समय मोटर सायकिल पर बड़े पहरेदार साहब भी वहीं से निकल रहे थे। अपने मातहतों पर नजर पड़ी और वह गाड़ी रोककर उनके पास अपने आप ही आ गये। उस लड़के का हाथ पकड़े पहरेदार ने कहा-‘साहब, हमने इस लड़को को एक लड़की को छेड़ते हुए रंगे हाथों पकड़ा है। इसका एक साथी भाग गया। यह कहता है कि यह यहां के मशहूर आदमी शहर साहब का बेटा है।’

बड़े पहरेदार ने कहा-‘बड़े शहर साहब को मोबाइन लगाकर पता कर लो।’

पहरेदार ने कहा-‘ठीक है। ओए लड़के बता बड़े शहर साहब का नंबर।’

लड़के ने बता दिया तो एक पहरेदार उसे लगाने लगा। मगर वह लगा ही नहीं। एक ही जवाब आ रहा था कि यह नंबर मौजूद नहीं है। पहरेदार ने यह बात बड़े पहरेदार को बता दी।
अब बड़े पहरेदार का ताव आ गया और वह बोले-यह झूठ बोल रहा है। पकड़ कर ले चलो बड़े घर।’
एक पहरेदार बोला-‘ साहब। वैसे इनकी शक्ल तो शहर साहब से मिलती है। हो सकता है यह सच बोल रहा हो।’

बड़े पहरेदार ने कहा-‘हां, लगती है। छोड़ दो। भले घर के लगते हैं।’’

लड़का खुश हो गया और बोला-‘और क्या साहब? वह लड़की चालू थी। हमारी जेब काट कर भाग रही थी तो मैंनेे उसका हाथ पकड़ा। इसी बीच यह आ गये। हमें पकड़ लिया। आप देखिये वह भी भाग गयी।’’

बड़े पहरेदार ने कहा-‘नालायक हैं दोनों। आप इनकी गलती क्षमा कर दें।’’

अब दूसरा पहरेदार बोला-‘पर साहब मुझे इनकी शक्ल बड़े साहब से मिलती नहीं दिख रही । उनका मूंह चैड़ा है और इसका लंबा। फिर इसने जो मोबाइल नंबर दिया भी वह फोन लग नही रहा। साहब यकीन मानिए यह झूठ बोल रहा है।’’

बड़े पहरेदार ने उसे गौर से देखा-‘‘ फिर कहा! हां तुम शायद ठीक कहते हो। पकड़ लो इन दोनों को। यह सरासर झूठ बोल रहा है।’’

पहला पहरेदार बोला-‘साहब। पर इसकी आवाज भी बड़े शहर साहब से मिलती है। मुझे लगता है कि यह उनके सुपुत्र ही हैं।’
बड़े पहरेदार ने फिर उसकी तरफ देखा और कहा-‘हां, बिल्कुल ठीक। यह लग ही रहे हैं। अरे, इतने बड़े आदमी का बेटा भला कभी झूठ बोलेगा। छोड़ दो इनको।’
दूसरे ने कहा-‘साहब! बड़े शहर साहब की आवाज मैंने भी सुनी है। उनकी आवाज पतली है और इसकी मोटी। फिर इसने जो मोबाइल नंबर दिया वहां इतनी देर से फोन लग ही नहीं रहा है। कुछ दाल में काला है।’’
बडे पहरेदार ने फिर लड़के को गौर से देखा और कहा-‘दाल में काला! यहां तो दाल ही पूरी काली लग रही है। यह वाकई झूठ बोल रहा है। इसने जरूर ही लड़की को छेड़ होगा। देखो चेहरे से ही खूंखार लग रहा है।’
पहला पहरेदार बोला-पर साहब! मुझे बड़े शहर साहब और इसके बाल एक जैसे घुंघराले लगते हैं। यह सही कह रहा हो।’
बड़े पहरेदार ने लड़के के बाल देखे और कहा-‘हां, मुझे भी लगता है। छोड़ दो इनको। आजकल चालू लड़कियां भी बहुत हैं। भले लोगों को तंग करती हैं। देखो न कैसे भाग गयी। मूर्खों तुम्हें उसे पकड़ना चाहिये था।’

दूसरा पहरेदार बोला-‘साहब! बड़े शहर साहब के बाल तो बरसों से आधे सिर पर हैं। मैं तो उनके बारे में तबसे जानता हूं जब वह इसकी उमर के थे। इसके बाल तो घने हैं।’’

बड़े पहरेदार ने कहा-‘हां, तुम ठीक कहते हो। पकड़ लो इन दोनों को। बड़े घर ले चलो। सब पता लग जायेगा। इनकी वह हालत करेंगे कि फिर अपनी जिंदगी में किसी लड़की को छेड़ेंगे नहीं।’’
इतने में बड़े पहरेदार की घंटी बजी। उसने बात की और बोला-‘इसको छोडो। यहां से थोड़ी दूर गैस रिसने की खबर मिली है। वह तेजी से फैल रही हैै। यहां से भागो इससे पहले कि वह गैस हमें पकड़ ले। कहीं यह भी मर गया तो अपने सिर पर बात आयेगी।’
तीनों इनको भाग गये। लड़का अपनी जान बचाकर भागा। कुछ दूर उसका साथी मिल गया। उसने कहा-‘यार, इस तरह तुम रास्ते चलते हुए लड़की को छेड़ा मत करो। इस बार तो मैंने बचा लिया। अगली बार नहीं बचाऊंगा।’’

पहले वाले लड़के ने उससे पूछा-‘यार निकल लो यहां से। गैस आ रही है।’
दूसरे वाले ने कहा-‘कोई गैस नहीं आ रही। मैंने अपने एक जुआरी दोस्त ने बड़े पहरेदार का फोन लिया और ऐसे ही उसे झूठी खबर सुना दी। वैसे तुमने उसे क्या बताया था? मैं दूर से देख रहा था तो बहुत बहस हो रही थी।’’
पहले ने कहा-‘छोड़ यार! यह जानने की कोशिश भी मत करो। मैं भी भूलना चाहता हूं।’

उधर भागते हुए पहले पहरेदार ने दूसरे से पूछ-‘तुमने रूस के प्रसिद्ध लेखक चेखोव को पढ़ा है। उसने ऐसा ही व्यंग्य लिखा था ‘गिरगिट’। वैसे होने को क्या है? एक घटना दूसरी जगह भी घट सकती है।’

दूसरे ने कहा-‘कौन चेखोव।’
पहला वाला चुप हो गया
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अपने अपने धर्म से ऊबते लोग -आलेख चिंत्तन

धर्म और अध्यात्म दो प्रथक विषय हैं। धर्म ऐसे रीति रिवाजों, कर्मकांडों और पूजा पद्धतियों से मिलकर बनाया गया एक बृहद विषय है जो सांसरिक कार्यों के लिये किसी समूह विशेष से जोड़ता है और जिसे मन चाहे ढंग से बदला भी जा सकता है। उसमें अध्यात्मिक शांति ढूंढना एक निरर्थक प्रयास है।
पहले तो अध्यात्म का मतलब समझ लें। अध्यात्म वह निराकार स्वरूप है जो इस पंच तत्वों से बनी इस देह में स्थित है। मन, बुद्धि और अहंकार तीन ऐसी प्रकृतियां हैं जो इसमें स्वाभाविक रूप से पैदा होकर उसका संचालन करती हैं पर वह अध्यात्म का भाग कतई नहीं है। अध्यात्मिक ज्ञान जीवन के सत्य का ज्ञान है जिसे कभी बदला नहीं जा सकता। हां, यह सच है कि बुद्धि और मन की क्रियाओं से ही अध्यात्म को समझा जा सकता है पर उसके लिये यह आवश्यक है कि कोई ज्ञानी हमारा गुरू बन जाये और इस बात का आभास कराये। वह भी मिल सकता है पर उसके लिये हमें पहले संकल्प करना पड़ता है। अध्यात्म शिक्षा की सबसे बड़ी पुस्तक या कहें इकलौती केवल श्रीगीता ही है जिसमें अध्यात्म ज्ञान पूर्णतः शामिल है। सांसरिक विषयों का ज्ञान तो नहीं दिया गया पर उसके मूल तत्व-जिनको विज्ञान भी कहा जाता है-बताये गये हैं। सीधे कहें तो वह दुनियां की एकमात्र पुस्तक है जिसमें अध्यात्म ज्ञान और सांसरिक विज्ञान एक साथ बताया गया है। अध्यात्मिक ज्ञान का आशय है स्वयं को जानना। स्वयं को जान लिया तो संसार को जान लिया।
धर्म प्रसन्न कर सकता है तो निराश भी। उससे मन को शांति भी मिल सकती है और अशांति भी। कभी उसमें अगर आसक्ति हो सकती है तो विरक्ति भी हो सकती है। एक धर्म से विरक्ति हो तो दूसरे में आसक्ति की मनुष्य तलाश करता है मगर कुछ दिन बात वहां से भी उकता जाता है और कहीं उससे तनाव भी झेलना पड़ता है क्योंकि छोड़ने से पुराना समूह नाराज होता है और विरक्ति का भाव दिखाने से नया। ऐसे में आदमी अकेला पड़ने की वजह से तनाव को झेलता है।
आखिर यह सब क्यों लिखा जा रहा है। आज एक अंग्रेजी ब्लाग देखा जिसमें लेखक अपने धर्म से विरक्ति होकर तमाम तरह की निराशा व्यक्त कर रहा था। वह अपने सर्वशक्तिमान की दरबार में हमेशा जाता था। अपनी पवित्र पुस्तक पढ़ता था। उससे उसका मन कभी नहीं भरा। एक समय उसके अंदर खालीपन आता गया। उसने अपने धार्मिक कर्मकांड छोड़ दिये और अच्छा इंसान बनने के लिये उसने दूसरों की सहायता करने का काम शुरु किया। उसने दुनियां के सभी धर्म को एक मानते हुए उन पर तमाम तरह की निराशा अपने पाठ में व्यक्त की। दूसरे की सहायता कर वह अपने अंदर खुशी अनुभव करता है यह अच्छी बात है पर फिर भी कहीं न कहीं खालीपन दिखाई देता है। अध्यात्म ज्ञान के अभाव में यह भटकाव स्वाभाविक है।

लेखक उसकी बात का जवाब इसलिये नहीं दे पाया क्योंकि एक तो अंग्रेजी नहीं आती। दूसरे यह कि 119 टिप्पणियां प्राप्त उस पाठ में वह लेखक दूसरों की बात का जवाब भी दे रहा था। सीधे कहें तो जीवंत संपर्क बनाये हुए था। उन टिप्पणियों में भी लगभग ऐसे ही सवाल उठाये गये जैसे लेखक ने कही थी। तात्पर्य यह था कि लेखक का पाठ केवल उसके विचारों का ही नहीं वरन् दुनियां के अनेक लोगों की मानसिक हलचल का प्रतिबिंब था। ऐसे में एक अलग से विचार लिखना आवश्यक लगा। आजकल अनुवाद टूलों की उपलब्धता है और हो सकता है कि उस ब्लाग लेखक की दृष्टि से हमारा पाठ भी गुजर जाये और न भी गुजरे तो उस जैसे विचार वालें अन्य लोग इसे पढ़ तो सकते हैं।
इस ब्लाग/पत्रिका का लेखक आखिर क्या कहना चाहता था? यही कि भई, धर्म छोड़ने या पकड़ने की चीज नहीं है। भले ही हम दोनों का धर्म अलग है पर फिर भी यही सलाह दे रहा हूं कि, अपना धर्म छोड़ने की बात मत कहो। चाहे सर्वशक्तिमान की दरबार में जाते हो बंद मत करो। अच्छा काम करना शुरु किया है जारी रखो। बस सुबह उठकर थोड़ा प्राणायम करने के बाद ध्यान आदि करो। अपनी पवित्र पुस्तक पढ़ते हो पढ़ो पर अगर श्रीगीता का अंग्रेजी अनुवाद कहीं मिल जाये तो उसे पढ़ो। नहीं समझ में आये तो हमसे चर्चा करो। गुरू जैसे तो हम नहीं है पर चर्चा कर कुछ समझाने का प्रयास करेंगे। हम हिंदी में लिखेंगे तुम गूगल टूल से अंग्रेजी में अनुवाद कर पढ़ना।’
मगर यह सब नहीं लिखा क्योंकि हमें लगा कि कहीं उसने वार्तालाप प्रारंभ कर दिया तो बहुत कठिन होगा अंग्रेजी में जवाब देना। तब सोचा कि चलो इस विषय पर लिखना आवश्यक है। वजह यह थी कि 119 टिप्पणियों में भी दुनियां के सभी धर्मों को एक मानकर यह बात कही गयी थी। उसमें भारतीय धर्म को मानने वाले केवल एक आदमी की टिप्पणी थी जिसमें केवल वाह वाह की गयी थी। अन्य धर्मों के लोग उसकी बात से सहमत होते नजर आ रहे थे।

यह ब्लाग देखकर लगा कि लोग धर्म से इसलिये ऊब जाते हैं क्योंकि उनमें केवल सांसरिक कर्मकांडों की प्रेरणा से स्वर्ग प्राप्ति का मार्ग बताया जाता है पर अध्यात्म शांति का कोई उपाय उनमें नहीं है। वैसे तो भारत में उत्पन्न धर्म भी कम उबाऊ नहीं है पर अध्यात्म चर्चा निरंतर होने के कारण लोगों को उसका पता नहीं है चलता फिर हमारे महापुरुषों-भगवान श्रीराम चंद्र जी, श्री कृष्ण जी, श्रीगुरुनानक देवजी ,संत कबीर,कविवर रहीम तथा अन्य-ने जीवन के रहस्यों को उजागर करने के साथ अध्यात्मिक ज्ञान का संदेश भी दिया और नित उनकी चर्चा के कारण लोग अपने मन को प्रसन्न रखने का प्रयास करते हैं। केवल धर्मकांडों में लिप्त रहने से उत्पन्न ऊब उनको अंदर तनाव अधिक पैदा नहीं कर पाती हालांकि नियमित अभ्यास के कारण उनको अनेक बार तनाव से बचने का उपाय नजर नहीं आता।
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बौद्धिक पिंजरे में कैद बुद्धिजीवी-संपादकीय

वह जो सभी तरफ दिखाया जा रहा है उसका मुख्य उद्देश्य तुम्हें भीड़ बनाना है। वह भीड़ जो समय पड़े तो उसे जाति, भाषा,धर्म और क्षेत्र के आधार पर बांटा जा सके। इसे बांटकर उन लोगों के सामने प्रस्तुत किया जा सके जिनका काम ही भीड़ पर चला करता है। बदले में भीड़ जुटाने वाले सौंपते हैं उनको तमगे, कप, उपाधियां और सम्मान। भीड़ कभी एक न हो इसका पुख्ता इंतजाम कर लिया जाता है। भीड़ के एक हिस्से को इसलिये खुश किया जाता है कि दूसरा हिस्सा चिढ़े और इसकी अभिव्यक्ति के लिये साधन ढूंढे जो कि पैसे से बिकते हैं।
यह पूर्वनिर्धारित है पर लगता है कि स्वतः चल रहा है। दिखता तो यह स्वतः चलता है है पर इसका बौद्धिक ढांचा बरसों पहले से बनाया जा चुका है और इस पर नियंत्रण केवल खास लोग और उनके चाटुकारो का है। यकीन करो जो तुम कहीं भी कुछ देख और पढ़ रहे हो उसमें कोई सच्चाई नहीं है। अगर है तो वह ऐसी है जैसे किसी फिल्म की होती है-एक काल्पनिक कहानी पर जिस तरह कुछ लोग अभिनय करते हैं। लोग फिल्मों को सच मानने लगे हैं। उनमें अभिनय करने वाले अभिनेता और अभिनेत्रियों को महानायक और महानायिका बना देते हैं। हालत यह है कि पर्दे का खलनायक भी बाहर नायक की तरह सम्मान पाता है और उसके बारे में कहते हैं कि ‘वह तो एक आम इंसान है।’ मगर नायक का पात्र तो महानता की उपाधि पाता है।

तयशुदा पात्र हैं। कोई हंसता दिख रहा है कोई रोता। फिल्म की तरह समाचार हैं और समाचार ही फिल्म बना रहे हैं। आजकल नई सभ्यता है। पहले तो राहजन हथियारों की दम पर लूट लेते थे पर इस नई सभ्यता में हिंसा वर्जित है क्योंकि आदमी की बुद्धि को तमाम तरह की लालच देकर और काल्पनिक सुख दिखाकर भ्रमित किया जा सकता है और मन के स्वामी होने की वजह से मनुष्य कहलाने वाला जीव बिना किसी रस्सी और जंजीर के पशु बनकर जिस आदमी के पास काल्पनिक रस्सी है उसके पीछे चला जाता है।

जिनके पास धन, पद और बाहुबल है उनको कुछ नहीं करना बस इंसानी मन को पकड़ लेने वाले पिंजरे-फिल्म,टीवी चैनल, अखबार और अंतर्जाल-पर कब्जा करना है। वहां से उसे समयानुसार भड़काने, बहलाने, और हड़काने वाले संदेश, समाचार, कहानियां और कविताओं का प्रसारण करना है। सारे दृश्य काल्पनिक और पूर्व रचित हैं। सर्वशक्तिमान ने यह सृष्टि रची है पर बाकी सब तो उसने इस धरती पर विचरने वाले जीवों पर छोड़ दिया है पर फिर भी ऐसे लोग हैं जो ‘भाग्य का खेल है’ या ‘जैसा
उसने रचा है’हमें देखना है जैसे जुमले कहते हैं पर उनके मन में यही है कि हम ही सब कर रहे हैं। दूसरे को दृष्टा बनने का उपदेश देने वाले लोग स्वतः ही अपनी अंर्तज्योति बुझी होने के कारण भीड़ की तरह हांके जा रहे हैं पर इसे नहीं जानते।

बिल्कुल उत्तेजित मत हो! यकीन करो यह योजना है एक व्यापार की। तुम जिन दृश्यों से चिढ़ते हो उनसे मूंह फेर लो। जिन शब्दों से तुम आहत होते हो उनको पढ़ना या सुनना भूल जाओ। जिन लोगों से तुम्हें दुःख मिलता है उनको याद भी मत करो। तुम उन समाचारों पर ध्यान न देते हुए उनकी चर्चा से दूर हो जाओ जिनसे कष्ट पहुंचता है। यह दृष्टा बनना ही है और फिर देखो उन लोगों का खेल! वह जो तुम्हें हड़काते हैं वह स्वयं ही हडकते नजर आयेंगे। वह जो तुम्हें झूठे खेल से बहला रहे हैं पर खुद दहलने लगेंगे। तुम जिन दृश्यों और समाचारों को सत्य समझ कर विचलित होते हुए उन पर बहसें करते हो उनके पीछे के सच पर जब विचार करने लगोगे तो तुम्हें हंसी आयेगी। जो बाजार में बिक रहा है या दिख रहा है-वह आदमी
हो याशय-उसका मूंह तुम्हारी जेब की तरफ है। जैसे पहले बहुरूपिये दिल बहलाकर पैसे ले जाते थे पर अब उनको आने की जरूरत नहीं है। उन्होंने तुम्हारे घर में पर्दे सजा दिये हैं। तुम्हें पता ही नहीं चलता कि तुम्हारा पैसा कैसे उनके पास जा रहा है।

वह तुम्हारा ध्यान किसी चेहरे की तरफ खींचे-चाहे वह हीरोईन का चेहरा हो या सर्वशक्मिान के किसी रूप का-तुम उसे मत देखो और आंखें बंद कर भृकुटि पर नजर रखो। वह तुम्हें संगीत सुनायें तुम ओम शब्द का जाप करने लग जाओ। वह फिल्म चर्चा करें तुम गायत्री मंत्र का जाप करने लगो। अपनी अभिव्यक्ति का केंद्र अपने अंदर रखो। बाहर कोई सुने यह जरूरी नहीं। बस तुम अपने को सुनना शुरु कर दो। अपने को पढ़ो। अपने सत्य कर्म को देखो दूसरे के अभिनय में रुचि रखने से तुम्हारे मन को शांति नहीं मिल सकती। उन्होंने शोर मचा रखा है तुम शंाति अपने अंदर ढूंढो। कहीं दूसरे से सुख और मनोरंजन की आस तुम्हें कमजोर बना रही है। अपने मन में अपने लिये ख्वाब और सपने देखो उसने दूसरे पिंजरे में मत फंसने दो।
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यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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हिंदी ब्लाग लेखन के लिये खुला है आकाश-संपादकीय

हिंदी ब्लाग जगत के कुछ ब्लाग लेखक अंतर्जाल पर वैसी ही गुटबाजी देख रहे हैं जैसी कि सामान्य रूप से बाहर देखने को मिलती है। यहां हम इस बात पर विचार नहीं करेंगे कि क्या वाकई कोई गुटबाजी है या नहीं बल्कि इस बात पर विचार करेंगे कि उन्हें ऐसा देखना चाहिये कि नहीं। सच कहें तो हम हिंदी ब्लाग जगत में सक्रिय ऐसे ब्लाग लेखकों से आग्रह करेंगे कि वह गुलामी की मानसिकता से बाहर निकलकर इस कथित गुटबाजी को देखना ही बंद कर दें। दिखती हो तो आंखें फेर लें। यहां सवाल कुछ ब्लाग लेखकों की गुटबाजी से अधिक उनकी सोच पर उठेगा जो कि स्वतंत्र एवं मौलिक हैं पर उनकी सोच वैसी नहीं हो पाई।

पहले करें हिंदी साहित्य और प्रचार जगत में फैली गुटबाजी की। उससे ऐसे अनेक लेखक-जिनमें इस ब्लाग/पत्रिका का लेखक भी-त्रस्त रहे हैं। यह त्रस्तता इतनी भयानक रही है कि कुछ लोगों ने तो लिखना ही बंद कर दिया और कुछ स्वांत सुखाय लिखते रहे पर उन्हें देश का एक बहुत बड़ा पाठक वर्ग नहीं पढ़ सका। दरअसल लेखक और पाठक के बीच जो बाजार या संस्थान हैं उनके केंद्र बिंदू में सक्रिय पूंजीपति, मठाधीशों और उनके प्रतिनिधियों ने अपनी शक्ति के आगे नतमस्तक लोगों का वहां बनाये रखा। बाजार को पैसे की तो हिंदी संस्थानों को प्रचार की जरूरत थी और जिसने उनकी जरूरतों को पूरा किया वही उनका लाड़ला बना। बाजार के पूंजीपति और हिंदी संस्थानों के कर्णधार अपनी प्रतिभा का उपयोग हिंदी के लेखकों को आगे आने देने की बजाय उनको भेड़ की तरह हांकने में करना चाहते हैं। उनकी मानसिकता एक सभ्य व्यापारी से अधिक ग्वाले की तरह है जो बस अपने पालित पशुओं को हांकना ही जानता है। सच कहें तो लेखकों को एक तरह से लिपिक माना गया।
परिणाम सामने है। पिछले कई दशकों से हिंदी में एक भी ऐसी पुस्तक या रचना नहीं आयी जिसे सदियों तक याद रखा जा सके। हम ब्लाग लेखकों में कई ऐसे हैं जो अपनी नौकरी और व्यापार से जुड़े रहते हुए अपना लेखन सामान्य पाठक तक पहुंचाने में नाकाम रहे पर इसका हमें क्षोभ या दुःख नहीं होना चाहिए क्योंकि ऐसे में हम इसे भाग्य कहें या कर्म कि अंतर्जाल पर स्वतंत्र रूप से ब्लाग/पत्रिका लिखने का अवसर मिला। यहां अंतर्जाल पर ऐसे लेखकों को असफल लेखक कहकर मजाक भी उड़ाया जाता है ऐसा कहने वाले पुरानी प्रवृत्ति के लोग हैं और उनके लिये सफलता का पैमाना अधिक छपना और प्रसिद्ध होने से अधिक कुछ नहीं है। किसी लेखक के पाठ की मौलिकता, गुणवत्ता और कालजयित से उनको कोई मतलब नहीं है। ऐसी रचनायें अब अंतर्जाल पर ही आना संभावित हैं जिसके सामने प्रकाशन व्यवसाय और हिंदी संस्थानों की शक्ति अत्यंत सीमित है।

यहां भले ही कोई पूंजीपति कुछ ब्लाग लेखकों को खरीदकर उसमें अपने यहां के प्रकाशन की पुस्तकों का प्रचार कराये या कोई हिंदी संस्थान अपने निर्धारित लेखकों के प्रचार के लिये कुछ ब्लाग लेखकों को तैयार करे पर समूचे हिंदी ब्लाग जगत का कोई स्वामी नहीं बन सकता। यहां हर ब्लाग लेखक एक प्रकाशन और संस्थान स्वयं हैं। वह किसी सेठ या मठाधीश का मोहताज नहीं है। अपने की बोर्ड को वह एक तोप या मिसाइल लांचर की तरह उपयोग कर अपने पाठ कहीं भी बम या मिसाइल की तरह पहुंचा सकता है। ब्लाग स्पाट या वर्डप्रेस के ब्लाग किसी भारतीय की संपत्ति नहीं है इसलिये पूरा हिंदी ब्लाग जगत किसी एक का बंधुआ बनने की संभावना नहीं है। जहां तक आर्थिक उपलब्धियों का प्रश्न है तो उसकी संभावना स्वतंत्र एवं मौलिक लेखकों के लिये इस समय लगभग नहीं के बराबर है। फिर जो इस समय लिख रहे हैं वह संभवतः आत्मनिर्भर हैं और शौकिया तौर पर ही यहां सक्रिय हैं। जब उनमें से कुछ लोग प्रसिद्धि पा लेंगे तो संभावना है कि बाजार उसका लाभ उठाना चाहे-उसमें भी इस देश से अधिक विदेश से ही संभावना है क्योंकि देशी बाजार के लिये हिंदी लेखक कोई मायने नहीं रखता, अगर स्वतंत्र और मौलिक है तो बिल्कुल नहीं। अनुवाद टूलों के जरिये हिंदी की रचनायें अन्य भाषाओं में पढ़ी जा रही हैं और हिंदी में मौलिक और स्वतंत्र लेखकों के प्रसिद्ध होने का यही एक मार्ग दिखता है। यही वह मार्ग है जहां हिंदी प्रकाशनों और संस्थानों के कर्णधारों की इच्छा और सहयोग के बिना हिंदी लेखकों का प्रसिद्धि के शिखर पर जाने का अवसर मिल सकता है।

हो सकता है कि कुछ लेखक पुरानी प्रवृत्ति के चलते अंतर्जाल पर सक्रिय आर्थिक और सामाजिक शक्तियों के केंद्र बिन्दू में स्थित लोगों की चाटुकारिता करते हों और उनको लाभ भी मिले पर इसका आशय यह बिल्कुल नहीं है कि स्वतंत्र और मौलिक लेखकों के लिये कोई संभावना नहीं है। कई मायनों में स्वतंत्र और मौलिक लेखकों को तो एक नया खुला आकाश मिला है विचरण करने के लिये-जहां वह अपनी कविताओं, कहानियों और हास्य व्यंग्यों को कबूतर की तरह उड़ाने के लिये जिससे उनका नाम भी चमकता नजर आयेगा। जो कथित रूप से गुटबाजी में व्यस्त हैं उनके लिये तो सीमित संभावनायें रहेंगी पर जो स्वतंत्र और मौलिक रूप से लिखने वाले हैं उनके लिये प्रसिद्धि के मोती प्रदान करने वाला विशाल सागर है।

ऐसे में स्वतंत्र लेखक अंतर्जाल की व्यापाकता के साथ बाहर मौजूद प्रकाशनों और संस्थाओं की सीमित उपलब्धियों को समझें। वहां सीमित उपलब्धियां थी और इसलिये उनमें से अपना भाग पाने की प्रतियोगिता ने वहां गुटबाजी पैदा की जिससे हिंदी साहित्य में बेहतर लेखक और रचनाओं का लगभग टोटा पड़ गया। अंतर्जाल पर अपनी सक्रियता को अपना भाग्य मानते हुए स्वतंत्र और मौलिक लेखक अपने रचनाकर्म से जुड़े रहें और कथित गुटबाजी देखने में वह अपनी ऊर्जा को नष्ट करना उनके लिये ठीक नहीं है। वह स्वयं ही लेखक, संपादक और प्रकाशक हैं और उसी स्वाभिमान के अनुरूप उनको व्यवहार करना चाहिये। जो लोग ऐसा नहीं करते और निरंतर गुटबाजी पर ही दृष्टिपात करते हैं उनको यह बात समझ लेना चाहिये कि इस स्वतंत्र आकाश में उनको पुरानी गुलाम मानसिकता का प्रतीक माना जा सकता है।
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कुछ सच कुछ झूठ-लघु कथा

शादी में वह बच्चा अपने मां बाप और दादा के साथ गया। शादी उच्च घराने की थी। वहां तमाम तरह का तामझाम था जिसमें बच्चों के मनोरंजन के लिये तीन ऐसे लोगों का भी प्रबंध जो विचित्र कपड़े और मुखौटे पहने थे। वह कभी वहां मौजूद बच्चों के साथ हाथ मिलाते और कभी आपस में एक दूसरे को मुक्का दिखाते हुए तो कभी एक दूसरे को पटकते हुए लड़ने का नाटक करते । बच्चा उनको बड़े चाव से देख रहा था। उसने तीनों से हाथ भी मिलाया। चूंकि अपने ही खास परिवार की शादी थी इसलिये वह बच्चा अपने माता पिता और दादा के साथ शादी के कार्यक्रम में आखिरी समय तक रुका।

जब शादी का कार्यक्रम समाप्त हो गया तब वह मुखौटे लगाने वाले लोग एक पर्दे के पीछे चले गये। बच्चा भी वहां चला गया। उन सभी ने अपने मुखौटे और कपड़े उतारे और फिर अपनी सामान्य वेषभूषा में बाहर आये और एक आदमी से अपना मेहनताने के पैसे लेकर चले गये।
बच्चे ने अपनी मां से कहा-‘मां, वह लोग तो आपस में एक दूसरे से लड़ने का नाटक कर रहे थे। वह तो हमारी तरह थे। देखो वह जा रहे हैं। अब उनमें कोई झगड़ा नहीं हो रहा है।’
मां ने कहा-‘हां, बेटे! वह पैसे के लिये यह इस तरह के कपड़े और मुखौटा पहनते हैं।’
बेटे ने कहा-‘पर आपस में लड़ते क्यों हैं? वह तो आपस में दोस्त हैं।’
यह बात उस लड़के के दादा भी सुन रहे थे। उन्होंने कहा-‘बेटा, पैसे के लिये वह नकली लड़ाई लड़ते हैं।’
बच्चे ने कहा-‘नकली लड़ाई कैसे लड़ते हैं? उनमें फिर दोस्ती कैसे हो जाती है? वह क्या हमारी तरह बच्चे हैं?’
दादा ने कहा-‘बेटा, तेरे पापा ने अपनी कालोनी की कमेटी के चुनाव में अपने दोस्त से लड़ाई की थी कि नहीं। वह दोस्त जिसे तुम पांच नंबर मकान वाला अंकल कहते हो। तुम्हारे पापा और वह एक दूसरे के खिला्फ कैसे भाषण करते थे। आपस में वाद विवाद भी करते थे। बस मारपीट नहीं हुई? बाकी एकदूसरे की बुराई कितनी कर रहे थे? फिर कैसे दोस्त हो गये?’

बच्चे के पिता ने अपने पिता से कहा-‘क्या पापा! आप भी बच्चे को किस तरह समझा रहे हो? वह लड़ाई तो बस दिखावा थी ताकि हम दोनों में से कोई चुनाव जीते। आपने देखा नहीं सचिव के लिये तीसरा प्रत्याशी किस तरह हार गया जबकि उसके जीतने की संभावना थी।’

बाप ने कहा-‘यही तो मैं इस बच्चे को समझा रहा हूं कि नकली लड़ाई अब केवल बच्चों का खेल नहीं रहा। इसे अब बड़े बड़े लोग खेलने लगे है। जो जितनी बड़ी नकली लड़ाई लड़ेगा उतना ही बड़ा बनेगा।’
बच्चे ने पूछा-‘जो आदमी बड़ा बनता है वह कैसा होता है?’
दादा ने हंसते हुए कहा-‘वह फिर कभी समझाऊंगा। आज नकली लड़ाई देखी तो बता दिया। कभी कोई बड़ा आदमी दिखेगा तो वह भी बता दूंगा।’
बच्चा चुप हो गया।
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आशीर्वाद-लघुकथा

वह युवक गरीब था तब संत के पास जाता था। वह उनके यहां आश्रम की साफ सफाई करता और फिर अपने काम पर चला जाता था। अक्सर वह संत से अपने लिये आशीर्वाद मांगता और कहता था कि ‘आप आशीर्वाद दें तो मेरे पास ढेर सारा पैसा और संपत्ति आ जाये।
संत ने कहा‘तुम क्या इसलिये ही इस आश्रम की सेवा करते हो?’
युवक ने पूरी ईमानदारी से कहा-हां, मेरा उद्देश्य तो यही है कि ढेर सारी संपत्ति आये। इसलिये ही सर्वशक्तिमान का दर्शन करने आपके यहां आता हूं। किराये का मकान है, पटरी पर सामान लगाकर बेचता हूं। पता नहीं नीली छतरी वाला मेरी कब सुनेगा?
संत ने कहा-‘चिंता मत करो। वह सभी को अवसर देता हैं।
युवक ने निराशा में कहा-‘पता नहीं कब सुनेगा?’
संत ने हंसकर कहा-‘जब तुम्हारे सामने अवसर आयेगा तो नीली छतरी वाला आवाज नहीं देगा। चुपचाप तुम्हारे लिये रास्ता खोलता जायेगा।’
युवक चला गया। समय ने पलटा खाया। वह अधिक धन कमाने लगा। वह इतना व्यस्त हो गया कि उसने आश्रम में जाना ही छोड़ दिया। कुछ बरस बाद वह एक दिन सुबह वैसे ही उस आश्रम पहुंचा और झाड़ू लगाने लगा।
संत ने उसे देखकर आश्चर्य जताया और कहा-‘क्या बात है? इतने बरसों बाद तुम यहां आये हो? सुना है कि बहुत बड़े सेठ बन गये हो।’
हां उसने कहा-‘बहुत धन कमाया। बच्चों की अच्छे घरों में शादी की। पैसे की कोई कमी नहीं। ढेर सारे रिश्ते बन गये हैं पर ऐसा लगता है कि सभी पैसे के लिये रिश्ता निभा रहे हैं। बहुत संपत्ति है पर दिल में चैन नहीं है। ऐसा लगता था कि यहां रोज मंदिर आता रहूं पर आ नहीं सका। आज तय किया कि यहीं आकर मुझे चैन मिल सकता है। वह धन दौलत तो बस दिखावा है। नीली छतरी वाले ने सब दिया पर जिंदगी का चैन नहीं दिया।
संत के कहा-‘पर तुमने वह उससे मांगा ही कब था। वैसे तुम भी तो सर्वशक्तिमान की इस आश्रम की सेवा धन मांगने के लिये कर रहे थे तो फिर दूसरों को क्यों दोष देते हो?जो तुमने मांगा था वह मिल गया। फिर अब फिर इस आश्रम की सेवा करने क्यों आ गये? करो, हो सकता है कि दिल चैन भी मिल जाये। हम तो तुम्हें न पहले रोकते थे न अब रोकेंगे। न पहले कुछ मांगा था न अब मांगेंगे।’
उसने उदास होते हुए उनके चरणों में माथा टेक दिया और कहा-‘अब कुछ मांगने के लिये यहां सेवा नहीं करूंगा। बस दिल को शांति मिल जाये।’
संत ने कहा-‘पहले यह तय करो कि कुछ मांगने के लिये आश्रम की सेवा नहीं करोगे या बदले में दिल की शांति चाहिये। सच तो यह है कि चाहे कुछ भी मांगने से मिल जाये पर दिल का चैन नहीं मिलता। इसलिये पहले वाले ही रास्ते पर चलो कि सेवा के बदले कुछ मांगना नहीं है।’
वह उदास भाव से संत को देखने लगा और फिर बोला-‘मुझे कुछ नहीं चाहिये। बस मुझे सेवा करने दीजिये।’
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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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इस ब्लाग/पत्रिका के पाठ पठन संख्या का आंकड़ा ५० हजार तक पहुँचा-आलेख

ब्लाग पत्रिका लेखक अपने उस पाठक का इंतजार कर रहा था जो वर्डप्रेस के शब्द-पत्रिका ब्लाग की पाठ पठन/पाठक संख्या पचास हजार की संख्या पार कराने वाला था। चाहे तो लेखक यह काम स्वयं भी कर सकता था। कौन देखने वाला था पर अपने साथ बेईमानी करना किसी भी मौलिक लेखक के लिये कठिन होता है। इसलिये पहले ही यह संपादकीय लिखना प्रारंभ कर दिया । इस लेखक का यह दूसरा ब्लाग है जो अभी अभी पचास हजार पाठ पठन/पाठक संख्या पार कर गया-प्रसंगवश यह वर्डप्रेस का ही ब्लाग है। पचास हजार की संख्या पार कराने वाला पाठक कोई जबलपुर से था।
वैसे अंतर्जाल पर कोई बात दावे से कहना कठिन है क्योंकि कई बार ब्लाग की पाठ पठन और पाठक संख्या अनेक स्थानों पर देखने से भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है। हो सकता है यह तकनीकी गड़बड़ी के कारण होता हो। आज सुबह इस ब्लाग पर 49982 पाठ पठन/पाठक संख्या का आंकड़ा दर्ज था। उसके हिसाब से अट्ठारह जुड़ने पर पचास हजार हो जाना चाहिऐ था। मगर स्टेटकाउंटर पर इतनी संख्या से एक अधिक होने पर भी इस ब्लाग का डेशबोर्ड 49999 दिखा रहा था। स्टेटकांउटर पर कई बार ऐसा होता है कि ब्लाग पर प्रकाशित त्वरित पाठ पर फोरमों से आई संख्या चार होती है पर हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाने वाले फोरमों पर वह संख्या आठ या दस दिखाई देती है। तब सवाल आता है कि इस तरह के काउंटर सही गणना नहीं करते या वह उनके हिसाब से कोई गणना आवास्तविक है जिसे दिखाने का प्रावधान उसमें नहीं है।
पचास हजार की संख्या पार कराने वाले जबलपुर के उस पाठक का धन्यवाद क्योंकि उसे शायद नहीं मालुम होगा कि वह एक ब्लाग की पाठ पठन/पाठक संख्या का पचास हजार के पार पहुंचा रहा है। ब्लाग स्पाट के ब्लाग पर वर्डप्रेस की अपेक्षा नगण्य पाठ पठन/पाठक संख्या है पर उन पर लिखने का एक अलग ही मजा है।

इस लेखक के 22 ब्लाग में यह ब्लाग चौथे नंबर पर बना था पर हिंदी पत्रिका के बाद सफलता के क्रम में इसका नंबर दूसरा है और इससे पहले बने तीनों ब्लाग अभी बहुत पीछे है जिनमें दो ब्लाग अनंत शब्दयोग और चिंतन हैं और एक वर्डप्रेस का दीपकबापू कहिन है। इसको चुनौती देता एक अन्य ब्लाग ईपत्रिका इसके पीछे चला आ रहा है और हो सकता है कि वह आने वाले दिनों में सफलता के क्रम में पहला स्थान प्राप्त कर ले।
यहां गूगल पेज रैंक की निर्णय क्षमता पर भी सवाल उठाना पड़ रहा है। इस ब्लाग को वहां 3 का अंक प्राप्त है और इसको पीछे छोड़ने वाले ब्लाग शब्दलेख सारथी, हिंदी पत्रिका और शब्दलेख पत्रिका 4 अंकों के साथ इस पर बढ़त बनाये हुए हैं। हिंदी पत्रिका के मुकाबले गूगल पेज रैंक में इसका पिछड़ना पाठों और पाठ पठन/पाठक संख्या को देखते हुए समझा जा सकता है पर शब्दलेख सारथी और शब्दलेख पत्रिका के मुकाबले विचारणीय विषय है। उन दोनों ब्लाग पर न तो पाठ इतने हैं और न ही पाठक संख्या। कहने का तात्पर्य यह है कि यह सब बातें अजीब हैं-आप अंतर्जाल पर कितने भी जानकार हो जायें पर यह नहीं कह सकते कि पूरी तरह से समझ गये हैं।
संभव है कि गूगल पेज रैंक के साफ्टवेयर में कोई कमी नहीं हो पर इस ब्लाग को 3 की रैंक होने पर कुछ ऐसे आंकड़े हैं जो ऐसे प्रश्न उठाते हैं और शायद यही प्रश्न इस अंतर्जाल के लिये दिलचस्पी बढ़ाने का कारण भी हैं।
इस लेखक ने बुधवार को ही यह अनुमान लगाया था कि यह ब्लाग शनिवार दोपहर तक पचास हजार की पाठ पठन/पाठक संख्या पार करेगा क्योंकि शनिवार और रविवार को इस ब्लाग पर आवागमन अधिक होता है और बाकी दिन उसके मुकाबले आधा या उससे थोड़ा अधिक देखने को मिलता है। इसके कुछ ज्ञात कारण है जिनके बारे में दावे से लिखना कठिन है तो कुछ अज्ञात भी हो सकते हैं।

आत्ममुग्ध होकर अपने लिखे की तारीफ करना ठीक नहीं है पर इस ब्लाग की पाठ पठन/पाठक संख्या 50 हजार पार करने के आंकड़े में उन लोगों की जरूर दिलचस्पी होगी जो हिंदी ब्लाग जगत में एक लक्ष्य के साथ सक्रिय हैं। शायद उनके लिये इसमें कोई जानकारी हो। इस पर स्टेटकाउंटर अभी पंद्रह दिन पहले ही लगाया गया है क्योंकि उसे वर्डप्रेस पर लगाना नहीं आ रहा था। ब्लागस्पाट के ब्लाग जहां आसानी से से तकनीकी जानकारी उपलब्ध है वहां तो सभी सैटिंग आसानी से सीखी जा सकती है। फिर अनेक ब्लाग लेखक ब्लाग स्पाट की तकनीकी जानकारी लिखते रहते हैं मगर वर्डप्रेस को समझना इसलिये भी कठिन है क्योकि उसके बारे में लिखने और बताने वाले बहुत कम लिखते हैं। इस पर प्रतिदिन आने वाले पाठकों की संख्या साठ से पचहत्तर नियमित रूप से है पर पाठ पठन की संख्या कभी अधिक और कम होती रहती है। अभी हाल ही में एक ही दिन में 238 की पाठ पठन संख्या आठ अप्रैल 2009 को पार की। 351 पाठों से सजे इस ब्लाग के निरंतर आगे बढ़ने की संभावना है।

अभी एक सर्वे आया था जिससे पता चला कि करीब 95 प्रतिशत ब्लाग लेखक ब्लाग स्पाट और 15 प्रतिशत वर्डप्रेस पर लिखना पसंद करते हैं। इसका मतलब साफ है कि अगर आपका वर्डप्रेस का ब्लाग, हिंदी ब्लाग एक जगह दिखाने वाले फोरमों पर नहंी दिखता और अगर उस पर लिखते हैं तो अपने मित्रों से दूर हो जाते हैं। यही कारण है कि इस लेखक ने ब्लाग स्पाट और वर्डप्रेस के ब्लागों पर अलग अलग दृष्टिकोण अपनाया है। पहले पाठ लिखकर ब्लागस्पाट के ब्लाग पर प्रकाशित किया जाता है फिर उसे वर्डप्रेस के ब्लाग पर रखा जाता है। इस लेखक के ब्लाग स्पाट के सारे ब्लाग उन फोरमों पर रहते हैं और ब्लाग लेखक मित्रों से संपर्क का वही जरिया भी है। एसा नहीं है कि ब्लागस्पाट के ब्लाग बेकार है-कम से कम गूगल पेज रैंक में उनकी स्थिति देखकर तो यही लगता है कि उनकी अपनी उपयोगिता है। इस लेखक का शब्दलेख सारथी ब्लाग स्पाट पर ही है जिसे 4 का अंक प्राप्त है। इस लेखक के कम से दस ब्लाग ऐसे हैं जिनको गूगल पेज रैंक में तीन की वरीयता प्राप्त हैं इसका मतलब यह है कि वह इस ब्लाग की अपेक्षा कम पाठ और पाठ पठन/पाठक संख्या होने के बावजूद इसे गूगल पेज रैंक में तीन का अंक प्राप्त कर उसे बराबरी की चुनौती दे रहे हैं। बाकी अंतर्जाल पर जो पाठ पठन/पाठक संख्या में कितना भ्रम है और कितना सच यह तो कोई विशेषज्ञ ही बता सकता है। इस पर मित्र ब्लाग लेखकों और पाठकों द्वारा इस लेखक को निरंतर प्रोत्साहन देने के लिये हार्दिक आभार प्रदर्शन इस विश्वास के साथ कि वह आगे भी अपना समर्थन जारी रखेंगे।
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व्यक्ति में चेतना लाने से ही समाज जागृत होगा-चिंतन

अक्सर यह सुनने को मिलता है कि ‘महाभारत घर में नहीं रखना चाहिए क्योंकि इससे क्लेश होता है’। हो सकता है या सच हो या भ्र्म! एक बात जरूर है कि जैसा साहित्य आप पढ़ते हैं वैसे ही आपकी बुद्धि भी हो जाती है। शायद यही कारण है कि घर में महाभारत रखने के लिये रोका जाता है कि घर में अगर होगी तो पढ़ी जाएगी और फिर लोगों में क्लेश की भावना पैदा हो सकती है। शायद इसीलिये हमारे देश के अध्यात्मिक चिंतकों ने महाभारत से श्रीगीता को अलग कर दिया। इसक मतलब सीधा है कि उसमें कुछ ऐसे प्रसंग है जिनका दुहराव हमारे समाज में पसंद नहीं किया जायेगा। महाभारत प्रायः घरों में नहीं रखा जाता है पर शायद ही ऐसा घर हो जहां श्रीमदभागवत गीता नहीं रखी जाती हो। सच बात तो यह है कि श्रीगीता न केवल चारों वेदों का सार संग्रह है बल्कि वह हमारे अध्यात्मिक ज्ञान का खजाना होने के साथ ही सभ्य संस्कृति और पवित्र संस्कारों के निर्माण का स्तोत्र भी है।
मजे की बात यह है कि श्रीगीता को जाने बिना ही संस्कार और संस्कृति बचाने के लिये कुछ लोग अनवरत अभियान छेड़े रहते हैं पर अगर उनसे उसका स्वरूप पूछा जाये तो उनकी हवा निकल आयेगी। पाश्चात्य सभ्यता से खतरा बतारने वाले लेाग बताते हैं कि-
1.पश्चिम में माता पिता और गुरु को सम्मान नहीं दिया जाता पर हमारे यहां उसकी परंपरा है। बच्चे अगर अपने संस्कारों ओर संस्कृति से परिचित नहीं होंगे तो बिगड़ जायेंगे और हमारे समाज का ढांचा बिगड़ जायेगा।
2.स्त्रियों को वह वस्त्र पहनने चाहिये जो पूरा शरीर ढंकते हों। अर्द्धनग्न होकर घूमने वाली स्त्रियों इस देश के लिये बहुत बड़ा खतरा है।
3.देश में केवल पुराने त्यौहार ही मनाने चाहिये ताकि संस्कृति बची रहे। पश्चिम के त्यौहार मनाने की प्रवृत्ति नहीं होना चाहिये।
शायद और भी बहुत सारी बातें बतायेंगे। पुत्र के रूप में श्रवण कुमार और भगवान श्रीराम जी और बहु के रूप में श्रीसीता जी का उदाहरण देंगे। यह सब ठीक है। हमारे देश के अनेक धार्मिक गुरु भी खूब उनका बखान करते हैं। देखो कैसे श्रवण कुमार ने माता पिता की सेवा की और भगवान श्रीराम ने पिता की आज्ञा का पालन किया। पत्नी के रूप में स्त्री से पतिव्रता की आशा की जाती है। गौर करें तो पायेंगे कि केवल सारी शिक्षा शासित होने वाले संबंधों पर है और वैसा न होने पर सजा का भी प्रावधान किया गया है ‘रौरव नरक का’। मगर शासक संबंधों का कोई वर्णन नहीं करना चाहता क्योंकि बूढ़े लोग ही धर्म के अधिक सहायक होते हैं और युवाओं से ऐसी अपेक्षा नहीं की जाती। एक अच्छी माता और पिता बनने की शिक्षा युवाओं को शायद ही कोई देता हो और शायद ही कोई ऐसा आदमी मिले जो अच्छे माता पिता न बनने पर उसकी सजा भुगतने की चेतावनी देने का साहस करता हो।
हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि ‘जैसा आदमी कर्म करता है वैसा ही फल उसके सामने आता है’। संस्कृति और संस्कारों के रक्षक यहां आकर खामोश हो जाते हैं। अगर कोई व्यक्ति अच्छा पिता नहीं बना तो उससे कुपुत्र के दुष्कर्मों या अपने प्रति उपेक्षा का भाव उसे झेलना ही है। इसमें पश्चिम संस्कृति के प्रभाव जैसी कोई बात नहीं है। जब वह अपने अकर्मण्यता या दुष्कर्म का दुष्परिणाम भोग रहा है तब उसके साथ सहानुभूति जताते हुए यह कहने का कोई मतलब नहीं है कि‘आजकल जमाना खराब आ गया।’
ऐसा नहीं है कि पश्चिमी सभ्यता आने के पहले कोई इस देश में सभी पुत्र श्रवण कुमार, भगवान श्रीराम तथा अन्य महापुरुषों जैसे थे। अगर होते तो फिर इनके अलावा उनका नाम भी कहीं आता।
सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे समाज में अपनी संतानों को हथियार की तरह उपयोग करने की प्रवृत्ति है वह बहुत खतरनाक है और इस कारण लेाग अपने बच्चों को अपने जीवन मेें केवल एक ही बात सिखाते हैं कि किसी भी तरह कमाओ। उसके बाद जब बच्चे आत्मनिर्भर होते हैं तो उनसे अपेक्षा करने लगते हैं कि वह संस्कार और संस्कृति से परिचित हों। जब बच्चे में संस्कार भरने का समय था तब तो भरा नहीं और जब समय आया तो फिर ऐसे फल की कामना करने लगे जो उन्होंने बोया ही नहीं।
कहने का तात्पर्य यह है कि हम जिस प्रकार की संस्कृति की बात करते हैं वह एक सामान्य आचार और व्यवहार का भाग मात्र है जो हमारे ही कर्म के आधार पर निर्धारित होता है। हम जैसा व्यवहार दूसरों से करते हैं वैसा ही हमें मिलता है। हम अपने से शासित लोगों से अपेक्षायें तो करते हैं पर सिखाते कुछ नहीं। फिर हम मानवीय रिश्तों के निर्वहन और पहनावे में जिस प्रकार संस्कृति और संस्कारों के मूल तत्व ढूंढते हैं वह तो पश्चिम में भी हैं। ऐसा नहीं है कि पश्चिम में पुत्री और पुत्र माता पिता को प्रेम और आदर नहीं देते। अपनी सफलताओं पर वह भी अपने माता पिता का ही नाम लेते हैं। तात्पर्य यह है कि केवल पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों की कथित पवित्रता को ही संस्कृति या संस्कार से को जोड़ना ठीक नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि हम अपने इन रिश्तों के निर्वाह से प्रथक किस तरह का आचार और व्यवहार करते हैं वह भी संस्कारों और संस्कृति से जुड़ा है-मसलन परिवार का भरण भोषण के लिये प्राप्त धन के स्तोत्र पवित्र होना, दूसरे की संपत्ति पर बुरी नजर न डालना तथा निष्काम भाव से दूसरों की सहायता करना।
पश्चिमी पहनावे या उत्सवों को अपनाने से अगर हमारी संस्कृति ढहने वाली होती तो शायद हम आज अपने सारे पवित्र ग्रथों का अध्ययन नहीं करते-जबकि उनका अध्ययन सामान्य शिक्षा में प्रचलित नहीं है। पश्चिमी परिधान पहनने वाले युवक युवतियां मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थानों पर दर्शनार्थ जाते हुए देखे जा सकते हैं। उनकी चारित्रिक दृढ़ता वैसे ही जैसे पहले की पीढ़ी में होती है। वह लोग वैलंटाईन डे मनाते हैं पर इसका मतलब यह नहीं है कि उनको दीपावली याद नहीं हैं। हां, यह सही है कि बाजार के प्रभाव में पश्चात्य उत्सवों को भी कुछ युवक युवतियां मनाते हैं-देश की जनसंख्या की दृष्टि से उनकी संख्या नगण्य है-पर इससे उनके स्वयं के संस्कार तो नष्ट नहीं हो जाते। फिर जो बाजार उनका प्रेरक है वह उन लोगों के दान और चंदे का स्तोत्र भी है जो संस्कृति और संस्कारों की रक्षा और धर्म के प्रचार के लिये कार्यरत हैं। इसलिये धर्म और संस्कृति रक्षकों को अपने अभियान में एक हद के अंदर तो रहना ही पड़ता है क्योंकि वह उस बाजार से अधिक देर तक लड़ नहीं सकते जो उनका भी मददगार है।
हमारे अध्यात्मिक ज्ञान में विराट शक्ति है क्योंकि वह सृष्टि और जीवन के उस सत्य के निकट है जिसके पास अभी पश्चिम का विज्ञान पहुंच रहा है। यही कारण है कि पश्चिम में भारतीय धर्मग्रथों का अध्ययन अब नये सिरे से किया जा रहा है। यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि अगर हम इस समय देश का आचरण देखें तो शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो यह सके कि वह संतुष्ट है। हमें आत्मंथन करना चाहिये कि क्या हम जिस प्रकार का आचरण कर रहे हैं क्या वाकई पूरी तरह से पवित्र और शुद्ध है। केवल धर्म, संस्कृति और संस्कारों की रक्षा का नारा लगाने से काम नहीं चलने वाला। हमारा अध्यात्मिक दर्शन खाने या पहनने के मामले में कोई प्रतिबंध नहीं लगाता सिवाय इसके कि वह देह के स्वास्थ्य और मानसिक शांति के लिये उचित हो। सबसे बड़ा सवाल आचरण और व्यवहार के लिये है और उसके लिये किसी अभियान की बजाय ऐसे सम्मेलनों की जरूरत है जहां मिलकर लोग अपने आचार विचार पर आत्म मंथन कर उसमें सुधार सकें। मुख्य बात समाज को नहीं बल्कि व्यक्ति को सुधारने की की है। उसमें भी दूसरे पर नहीं बल्कि स्वयं पर दृष्टि डालने की है। समूहों में अभियान चलाने से शुद्धता नहीं आ सकती बल्कि उसके लिये स्वयं के स्तर पर प्रयास करना चाहिये।
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सट्टा खेलने वालों को समाज सम्मान से नहीं देखता-आलेख

सच बात तो यह है कि सट्टा एक विषय है जिस पर अर्थशास्त्र में विचार नहीं किया जाता। पश्चिमी अर्थशास्त्र अपराधियों, पागलों और सन्यासियों को अपने दायरे से बाहर मानकर ही अपनी बात कहता है। यही कारण है कि क्रिकेट पर लगने वाले सट्टे पर यहां कभी आधिकारिक रूप से विचार नहीं किया जाता जबकि वास्तविकता यह है कि इससे कहीं कहीं देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिति प्रभावित हो रही है।
पहले सट्टा लगाने वाले आमतौर से मजदूर लोग हुआ करते थे। अनेक जगह पर सट्टे का नंबर लिखा होता था। सार्वजनिक स्थानों-खासतौर से पेशाबघरों- पर सट्टे के नंबर लिखे होते थे। सट्टा लगाने वाले बहुत बदनाम होते थे और उनके चेहरे से पता लग जाता था कि उस दिन उनका नंबर आया है कि नहीं। उनकी वह लोग मजाक उड़ाते थे जो नहीं लगाते थे और कहते-‘क्यों आज कौनसा नंबर आया। तुम्हारा लगा कि नहीं।’
कहने का तात्पर्य यह है कि सट्टा खेलने वाले को निम्नकोटि का माना जाता था। चूंकि वह लोग मजदूर और अल्प आय वाले होते थे इसलिये अपनी इतनी ही रकम लगाते थे जिससे उनके घर परिवार पर उसका कोई आर्थिक प्रभाव नहीं पड़े।

अब हालात बदल गये हैं। दिन ब दिन ऐसी घटनायें हो रही हैं जिसमें सट्टा लगाकर बरबाद हुए लोग अपराध या आत्महत्या जैसे जघन्य कार्यों की तरफ अग्रसर हो रहे हैं। इतना ही नहीं कई जगह तो ऐसे सट्टे से टूटे लोग अपने ही परिवार के लोगों पर आक्रमण कर देते हैं। केवल एक ही नहीं अनेक घटनायें सामने आयी हैं जिसमें सट्टे में बरबाद हुए लोगों ने आत्मघाती अपराध किये। होता यह है कि यह खबरें आती हैं तो सनसनी कुछ यूं फैलायी जाती है जिसमें रिश्तों के खून होने की बात कही जाती है। कहा जाता है कि ‘अमुक ने अपने माता पिता को मार डाला’, अमुक ने अपनी पत्नी और बच्चों सहित जहर खा लिया’, ‘अमुक ने अपनी बहन या भाई के के घर डाका डाला’ या ‘अमुक ने अपने रिश्ते के बच्चे का अपहरण किया’। उस समय प्रचार माध्यम सनसनी फैलाते हुए उस अपराधी की पृष्ठभूमि नहीं जानते पर जब पता लगता है कि उसने सट्टे के कारण ऐसा काम किया तो यह नहीं बताते कि वह सट्टा आखिर खेलता किस पर था।’
सच बात तो यह है कि सट्टे में इतनी बरबादी अंको वाले खेल में नहीं होती। फिर सट्टे में बरबाद यह लोग शिक्षित होते हैं और वह पुराने अंकों वाले सट्टे पर शायद ही सट्टा खेलते हों। अगर खेलते भी हों तो उसमें इतनी बरबादी नहीं होती। बहुत बड़ी रकम पर सट्टा संभवतः क्रिकेट पर ही खेला जाता है। प्रचार माध्यम इस बात तो जानकर छिपाते हैं यह अनजाने में पता नहीं। हो सकता है कि इसके अलावा भी कोई अन्य प्रकार का सट्टा खेला जाता हो पर प्रचार माध्यमों में जिस तरह क्रिकेट पर सट्टा खेलने वाले पकड़े जाते हैं उससे तो लगता है कि अधिकतर बरबाद लोग इसी पर ही सट्टा खेलते होंगे।
अनेक लोग क्रिकेट खेलते हैं और उनसे जब यह पूछा गया कि उनके आसपास क्या कुछ लोग क्रिकेट पर सट्टा खेलते है तो वह मानते हैं कि ‘ऐसा तो बहुत हो रहा है।’
सट्टे पर बरबाद होने वालों की दास्तान बताते हुए प्रचार माध्यम इस बात को नहीं बताते कि आखिर वह किस पर खेलता था पर अधिकतर संभावना यही बनती है कि वह क्रिकेट पर ही खेलता होगा। लोग भी सट्टे से अधिक कुछ जानना नहीं चाहते पर सच बात तो यह है कि क्रिकेट पर सट्टा खेलना अपने आप में बेवकूफी भरा कदम है। सट्टा खेलने वालों को निम्न श्रेणी का आदमी माना जाता है भले ही वह कितने बड़े परिवार का हो। सट्टा खेलने वालों की मानसिकता सबसे गंदी होती है। उनके दिमाग में चैबीसों घंटे केवल वही घूमता है। देखा यह गया है कि सट्टा खेलने वाले कहीं से भी पैसा हासिल कर सट्टा खेलते हैं और उसके लिये अपने माता पिता और भाई बहिन को धोखा देने में उनको कोई संकोच नहीं होता। इतना ही नहीं वह बार बार मरने की धमकी देकर अपने ही पालकों से पैसा एैंठते हैं। कहा जाता है कि पूत अगर सपूत हो तो धन का संचय क्यों किया जाये और कपूत हो तो क्यों किया जाये? अगर धन नहीं है तो पूत ठीक हो तो धन कमा लेगा इसलिये संचय आवश्यक नहीं है और कपूत है तो बाद में डांवाडोल कर देगा पर अगर सट्टेबाज हुआ तो जीते जी मरने वाले हालत कर देता है।
देखा जाये तो कोई आदमी हत्या, चोरी, डकैती के आरोप में जेल जा चुका हो उससे मिलें पर निकटता स्थापित नहीं करे पर अगर कोई सट्टेबाज हो तो उसे तो मिलना ही व्यर्थ है क्योंकि इस धरती पर वह एक नारकीय जीव होता है। एक जो सबसे बड़ी बात यह है कि क्रिकेट पर लगने वाला सट्टा अनेक बड़े चंगे परिवारों का नाश कर चुका है और यकीनन कहीं न कहीं इससे देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है। देश से बाहर हो या अंदर लोग क्रिकेट पर सट्टा लगाते हैं और कुछ लोगों को संदेह है कि जिन मैचों पर देश का सम्मान दांव पर नहीं होता उनके निर्णय पर सट्टेबाजों का प्रभाव हो सकता है। शायद यही कारण है कि देश की इज्जत के साथ खेलकर सट्टेबाजों के साथ निभाने से खिलाड़ियों के लिये जोखिम भरा था।
इसलिये अंतर्राष्ट्रीय मैचों के स्थान पर क्लब स्तर के मैचों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। क्लब स्तर की टीमों मे देश के सम्मान का प्रश्न नहीं होता। सच क्या है कोई नहीं जानता पर इतना तय है कि क्रिकेट पर लगने वाला सट्टा देश को खोखला कर रहा है। जो लोग सट्टा खेलते हैं उन्हें आत्म मंथन करना चाहिये। वैसे तो पूरी दुनियां के लोग भ्रम में जी रही है पर सट्टा खेलने वाले तो उससे भी बदतर हैं क्योंकि वह इंसानों के भेष में कीड़े मकौड़ों की तरह जीवन जीने वाले होते हैं और केवल उसी सोच के इर्दगिर्द घूमते हैं और तथा जिनकी बच्चे, बूढे, और जवान सभी मजाक उड़ाते हैं।
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चोर…….. चोर (हास्य व्यंग्य)

उस गांव एक घर में चार चोर घुसे। उन्होंने बहुत सारा सामान अपने झोलों में भर लिया था कि अचानक घर एक सदस्य की आंख खुल गयी और वह जोर से चिल्लाया ‘चोर…..चोर!’
चोर भाग निकले। वह आदमी चिल्लाता रहा और उसकी आवाज गांव में दूर तक सुनायी दी। लोग जाग उठे। इधर चोर भी जोर से भागे जा रहे थे पर अचानक एक चोर का पांव एक गड्ढे में फंस गया। वह गिर पड़ा पर उसके तीन साथी उसे उठाने की बजाय उसके पास का सामान लेकर भागते बने और उससे कहा कि ‘अगर यह तेरे पास रहा तो तेरा चोरा होना प्रमाणित हो जायेगा। अभी तो बचने की गुंजायश भी होगी।’
बाकी तीनों चोर गांव की सीमा पार कर गये। इधर गांव वालों ने उस चोर को पकड़ा और मारने लगे पर उसी गांव के चार लोग उसे चोर को बचाने आ गये और गांव वालों से बोले-‘इसे मत मारो! आजकल कानून बहुत सख्त है। इसे हमारे हवाले करो। हम इसे नहर में फैंक आते हैं। न यह बचेगा और न कोई इसकी पूछताछ करेगा। इस तरह हमारे ऊपर कोई इल्जाम भी नहीं आयेगा।’
गांव वालों ने उस चोर का हाथ उन चारों को पकड़ा दिया। वह चारों उसकी बुशर्ट का कालर पकड़ ले जाने लगे। वह चिल्ला रहा था‘मुझे नहर में मत फैंको।’
जब वह उसे पकड़ कर गांव से थोड़ा दूर लाये तब उनमें से एक आदमी ने उस चोर की बुशर्ट का कालर छोड़ते हुए कहा-‘पागल हुआ है। हम तुझे नहर में फैंकने के लिये थोड़े ही ले जा रहे हैं। हम तो वहां बैठकर तेरे साथ शिखर वार्ता करेंगे। तू हमे पहचानता नहीं है। हम तेरे गांव से परले वाले गांव में चोरी करते हुए पकड़े गये थे और तू तरले वाले गांव की छोरी छेड़ने के आरोप में हमारे साथ जेल में था।’
अब उस गांव के चारों आदमियों ने उसका हाथ छोड़ दिया। उस चोर ने चारों को पहचान लिया और बोला-‘फिर मेरे को इस तरह बचाकर ले आये।’
दूसरे आदमी ने कहा-‘अपने धंधे वास्ते! नहीं तो हमारी क्या अटकी पड़ी थी? पहले तो तू हमें उन तीन साथियों के पास ले चल और हमारा हिस्सा दिला। फिर आगे बात करेंगे!’
वह चोर उन तीनों को अपने साथियों के पास लाया। अब आठों ने मंत्रणा प्रारंभ की। दूसरे चोर ने कहा-‘अरे, काहे इसमें हिस्सा मांगते हो? हमारे गांव में तुमने कितनी बार चोरी की क्या हमें पता नहीं?’
गांव के तीसरे आदमी ने कहा-‘पर हम कभी तुम्हारे गांव में पकड़े ही नहीं गये तो हिस्सा काहेका?’
तीसरे चोर ने कहा-‘जब पकड़े जाओगे। तब बचाकर उसका कर्जा उतार देंगे। ऐसा तो है नहीं कि चोरी के आरोप में कभी हमारे गांव में पकड़े नहीं जाओगे।’
चौथे आदमी ने कहा-‘तब हम भी हिस्सा देंगे। पहले पकड़े तो जायें। वैसे हमारा गांव बहुत विकसित हो गया है और हम अब अपना गिरोह चलाते हैं खुद यह काम नहीं करते। हमारे चेले चपाटे और भाड़े के टट्टू यह काम करते हैं।’
चौथे चोर ने कहा-‘तो तुम लोग क्या अपनी सेठगिरी का रुतवा झाड़ रहे हो?’
यह विवाद उस नहर के किनारे बैठा एक पुराना चोर सुना रहा था। वह उनके पास आया और बोला-‘अरे, भले आदमियों तुम क्यों इतना झगड़ा कर रहे हो? यह हिस्सा लेने देने की बजाय अपने धंधे के लिये कंपनी बनाओ। इतने दूर दूर तक गांवों में चोर नाम की चीज नहीं बची है। जिसे देखो वही काले धंधे का सेठ बन गया है। कोई नकली घी बना रहा है तो कोई सिंथेटिक दूध बेच रहा है। अब तो चोरी करने वालों का मन गांवों में कम शहरो में अधिक लगता है। ’
सभी ने एक स्वर में पूछा-‘आखिर हम क्या करे?’
‘तुम लोग अब प्रशिक्षक बन जाओ।’उस आदमी ने समझाया-‘हर गांव में बेकार और नकारा घूम रहे लोगों को अपने यहां बुलाकर प्रशिक्षण दो। वह अपना काम कर तुम्हें हिस्सा पहुंचाते रहेंगे। अगर वह कहीं फंस जायें तो तुम उनको सजा दिलाने के नाम पर इस नहर में फैंकने के लिये लाना और छोड़ देना। याद रखना एक गांव में अगर कोई पकड़ा गया हो तो उसे दोबारा उस गांव में मत भेजना।’
एक ने पूछा-‘जब सभी गांव वालों को पता चल गया तो क्या होगा?’
पुराने चोर ने कहा-‘ऐसा नहीं होगा। तुम अपने गांव में सज्जन बने रहना। दोनों गांवों में एक दूसरे के चोर होने की बात कहकर विवाद बनाये रखना। बाहर से लड़ते दिखना पर अंदर एक रहना। कभी एक जना एक गांव के कुत्ते पर पत्थर फैंककर गुस्सा उतारना तो दूसरा भी यही करेगा। कुल मिलाकर लड़ाई का नकली मनोरंजन प्रस्तुत करना। मैं तुम्हें विस्तार से पूरा कार्यक्रम बाद में बताऊंगा, पहले अपनी कंपनी तो बना लो।’
सभी एक साथ विचार करने लगे। कपंनी का अध्यक्ष कौन बने? आखिर में उसी पुराने चोर का अध्यक्ष बनाने का विचार किया गया। सभी इस पर सहमत हो गये। पहले तो उस पुराने चोर ने ना-नुकर की पर बाद में इसके लिये राजी हो गया इस शर्त पर कि वह हर चोरी में बीस प्रतिशत हिस्सा देंगे और यह हिस्सा बाकी खर्चे काटने से पहले होगा। बाद में खर्चे काटकर आठो लोग हिस्सा करेंगे। इस पर भी सहमति हो गयी।
पुराने चोर ने कहा-‘फिर आज से ही अपनी कंपनी की शुरुआत करते हैं। आओ उस चोरी का हिस्सा बांटें। पहले मेरा बीस प्रतिशत हिस्सा निकालो फिर उसे बांट लो।’
इस तरह वह चोर कंपनी शुरु हुई।
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युवा पीढ़ी को प्रोत्साहन-(हास्य व्यंग्य)

वह पुराना अभिनेता अपने बैठक कक्ष में सिगरेट पर सिगरेट फूंकता हुआ इधर से उधर चहलकदमी कर रहा था। उसने अपने सचिव से कहा-‘तुमने उस दो कौड़ी के निर्देशक को फोन किया कि नहीं?‘
सचिव ने कहा-‘कर दिया साहब! आता होगा!’
वह पुराना अभिनेता चिल्लाया-‘उसकी हिम्मत कैसे हुई यह कहने की कि वह अपनी अगली पीढ़ी में किसी नौजवान को अवसर देगा। क्या उसने हमारी फिल्मों से इतना पैसा कमा लिया है कि वह अपनी अलग से फिल्म बनायेगा। अभी तक तो उसकी कंपनी को अप्रत्यक्ष रूप से हम ही मदद करते हैं। क्या उसने अपनी कंपनी इतनी दमदार कर ली है कि क्या वह हमारे बिना फिल्म बनायेगा। अखबारों में कहता है कि अगली फिल्म में किसी नौजवान पीढ़ी के लड़के को हीरो बनायेगा। वह क्या सोचता है कि हम पचास के हो गये तो क्या बूढ़े हो गये हैं। अरे, वह तो हमने अपनी उम्र नहीं छिपायी वरना यहां तो लोग पांच पांच साल उम्र कम बताते हैं। क्या वह उन्हीं में से किसी को चांस देगा? उसकी हिम्मत कैसे हो गयी यह कहने कि अब फिल्मों में युवा पीढ़ी को आना चाहिये।’
सचिव ने कहा-‘साहब, अभी आप पचास के कहां हैं? आपकी उम्र अभी चालीस साल है। आप अपने रक्तचाप को सामान्य रखने का प्रयास करें। हो सकता है कि यह खबर गाॅसिप हो? आजकल समाचार पत्र पत्रिकायें और टीवी चैनल इतने हो गये हैं कि अपने समाचार बेचने के लिये इस तरह की सनसनी पैदा करते हैं।’
इतने में वह निर्देशक अंदर आया और हाथ जोड़कर पुराने अभिनेता के सामने खड़ा हो गया। अभिनेता ने उसे घूरकर देखा और फिर कहा-‘ओ! तो तुम आ गये। भई, हम तो सोच रहे हैं कि अब तुम्हारी कंपनी से दूर हो जायें ताकि नौजवान पीढ़ी को मौका मिल सके।’

निर्देशक ने कहा-‘आप कैसी बात करते हैं? आप तो मेरे अन्नदाता हैं।’
अभिनेता ने गुस्से में उसके सामने वह पत्रिका फैंक दी जिसमें उसका नौजवान पीढ़ी को अवसर देने का बयान छपा था।

निर्माता ने उसे देखा और फिर हंसने लगा तो अभिनेता का दिमाग घूम गया और बोला-‘मैं तुम्हारे इंतजार में दस सिगरेट फूंक चुका हूं और तुम्हें हंसी आ रही है। लगता है तुम्हारे पर निकल आये हैं। अभी इसी वक्त यह बयान जारी करो कि यह गाॅसिप है वरना अपना खेल मेरे घर से खत्म ही समझो।’

निर्देशक ने कहा-‘साहब, आपने इतना गुस्सा कर अपना खूना जलाने से पहले मुझसे पूछा तो होता। अरे, यह बयान मैंने आपके यह कहने के बाद ही दिया है कि ‘आपके सुपुत्र बाबा को लेकर एक छोटे बजट की फिल्म बनाऊं। अरे, अपने बाबा ही तो वही युवा पीढ़ी है। आपने क्या समझा था मैं कि किसान या मजदूर के बेटे को फिल्म का हीरो बनाने वाला हूं। हां, पर मेरी उस छोटे बजट की फिल्म में बाबा को एक मजदूर के बेटे की ही भूमिका निभानी है। क्या मुझे आप नासमझ समझते हैं। आजकल कहीं भी ‘युवा पीढ़ी को आगे लाने’ का मतलब किसी भी बड़े क्षेत्र में सक्रिय परिवार के युवा सदस्य को आगे लाना ही है। अपना बाबा नौजवान है………………………’’

अभिनेता ने संकोच के साथ कहा-‘पर वह पच्चीस का है।’
निर्देशक ने एकदम उतावली के साथ कहा-‘आप किसी दूसरे को यह मत बताईये कि वह पच्चीस के हैं। हम तो उन्हें अट्ठारह साल का कहकर प्रचारित करेंगे। फिल्म में एक गाना भी होगा जिसमें हीरो की उम्र अट्ठारह और हीरोईन की उम्र सोलह लिखी जायेगी।’
अभिनेता ने खुश होकर कहा-‘यार, यह बात तो मैं भूल ही गया था। शायद इसलिये कि मुझे उसकी उम्र तीस ही याद थी और ‘नौजवान और युवा पीढ़ी’ से मैंने समझा कि तुम किसी दूसरे लड़के की बात कर रहे हो।’

निर्देशक ने कहा-‘हुजूर! आप इतने बड़े आदमी होकर भी कभी छोटी बात कर जाते हैं तब मेरा मन दुःखी हो जाता है। यह तो छोटे परिवारों में होता है कि चालीस और पचास के पास पहुंचे आदमी को बूढ़ा कहा जाता है जबकि बड़े परिवार में तो साठ साल तक आदमी को जवान माना जाता है। यकीन न हो तो आप बाजार में चलते फिरते किसी आदमी से पूछ लो वह तो आपको जवान बाबा को नौजवान कहेगा।’
अभिनेता ने चैन की सांस ली और कहा-‘ठीक है! अब तुम बाबा पर फिल्म बनाने की तैयारी करो। मैं तो डर ही गया था। नौजवान पीढ़ी की बात पढ़कर मेरे दिमाग में घबड़ाहट फैल गयी थी।’
निर्देशक बाहर चला तो उसके पीछे अभिनेता का सचिव भी आया। उसने निर्देशक से कहा-‘एक समस्या खड़ी हो गयी है। अभिनेता जी अपनी शादी की तीसवीं सालगिरह मनाना चाहते हैं। उम्र अपनी पचास बताते हैं। उनकी शादी के वीडियो देखो तो उसमें वह तीस के वैसे ही दिख रहे हैं। अब क्या करें? मैंने तो मना किया कि इससे बाबा और उनकी दोनों की उम्र सभी को पता चल जायेगी। बाबा भी उन्तीस वर्ष के हैं।’
निर्देशक ने कहा-‘इतनी सी बात! शादी की सालगिरह को बीसवी बता दो।’

सचिव ने कहा-‘पर अभिनेताजी की शादी तो फिल्म में आने के बाद ही हुई थी। उनके चाहने वालों को सब याद है। अभिनेता की शादी और बाबा की जन्म तारीख का सभी को पता है। हां, उनकी स्वयं की उम्र के बारे में दस वर्ष कम का प्रचार पहले से ही होता रहा है। इसलिये उसकी समस्या नहीं है।’
निर्देशक ने कहा-‘कोई बात नहीं! लोगों की याद्दाश्त कमजोर होती है। फिर पर्दे की चमक के सामने तो उसकी सोच वैसे ही गायब हो जाती है। यह पब्लिक सब जानती है पर उसे बताने वाले भी तो हम ही हैं न! जैसा हम बतायेंगें वैसा ही अखबार और टीवी चैनल बतायेंगे और वही तो वह जानेगी।’
सचिव खुश हो गया और बोला-‘ व्हाट इज आईडिया सर! नौजवान पीढ़ी जिंदाबाद।’
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ज्ञान किसी समाज की संपत्ति नहीं होता-आलेख

ज्ञान किसी समाज की संपत्ति नहीं होता-आलेख
इस बार गुडफ्राइडे के अवसर पर वैटिकन सिटी में आयोजित एक प्रार्थना में हिन्दू धर्म के महान ग्रंथ श्रीगीता सार भी उल्लेख किया गया। इसके साथ ही वहां भारत के अन्य महानपुरुषों के संदेशों पर चर्चा हुई। श्रीगीता के निष्काम भाव तथा महात्मा गांधी के अहिंसा संदेश का भी उल्लेख किया गया। दरअसल इसका श्रेय भारत के ही एक पादरी को जाता है जिनको उनके प्रभावी भाषण बाद उनको खास प्रार्थना के लिये चुना गया था।
कुछ लोग इसे ईसाई धर्म के नजरिए में अन्य धर्म के प्रति बदलाव के संकेत के रूप में देख रहे हैं। यह एक अलग से चर्चा का विषय है पर इतना जरूर है कि भारत विश्व में अध्यात्मिक गुरु के रूप में जाना जाता है और श्रीगीता के मूल तत्वों को विश्व का कोई अन्य धर्मावलंबी अपने हृदय में स्थान देता है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। मुख्य बात यह है कि इसे उनकी सदाशयता माने या विद्वता? यकीनन दोनों ही बातें हैं। सदाशयता इस मायने में कि वह भारतीय विचारों के मूल तत्वों को पढ़ने और समझने में अपनी कट्टरता को आड़े आने नहीं देते। विद्वता इस मायने में कि वह उसे समझते हैं।
यहां ईसाई और हिंदूओं समाजों के आपसी एकता से अधिक यह बात महत्वपूर्ण है कि पूरा विश्व अब पुरानी धार्मिक परंपराओं पर अंधा होकर चलने की बजाय तार्किक ढंग से चलना चाहता है। विश्व में आर्थिक उदारीकरण ने जहां बाजार की दूरियां कम की हैं वही प्रचार माध्यमों ने भी लोगों के विचारों और विश्वासों में आपस समझ कायम करने में कोई कम योगदान नहीं दिया है-भले ही उसमें काम करने वाले कुछ लोग कई विषयों में लकीर के फकीर है।
वैसे देखा जाये तो आज जो आधुनिक भौतिक साधन उपलब्ध हैं उनके अविष्कारों का श्रेय पश्चिम देशों के वैज्ञानिकों को ही जाता है जो कि ईसाई बाहुल्य है। ईसाई धर्म को आधुनिक सभ्यता का प्रवर्तक भी माना जा सकता है पर उसका दायरा केवल भौतिकता तक ही सीमित है। हम यहां किसी धर्म के मूल तत्वों की चर्चा करने की बजाय उनके वर्तमान भौतिक स्वरूप की पहले चर्चा करें। अगर हम पूरे विश्व के खान पान रहन सहन और सोचने विचारने का तरीका देखें तो वह अब पश्चिम से प्रभावित है। आज भारत के किसी भी शहर में चले जायें वहा आपको पैंट शर्ट और जींस पहने लोग मिल जायेंगे और यकीनन वह भारत की पहचान नहीं है। खान पान में भी आप देखें तो पता लगेगा कि उस पर पश्चिमी प्रभाव है। इसे ईसाई प्रभाव कहना संकुचित मानसिकता होगी पर यह भी सच है कि पश्चिम की पहचान इसी धर्म के कारण ही यहां अधिक है।

कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे समाज पर भौतिक रूप से विदेशी प्रभाव हुआ है पर इसके बावजूद हमारी मूल सोच आज भी अपने प्राचीन अध्यात्मिक ज्ञान से जुड़ी हुई है। भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने आधुनिक विश्व में भारत को पहचान दी यह भी एक बहुत बड़ी सच्चाई है-इसका विरोध करना रूढ़वादिता से अधिक कुछ नहीं है। अन्य धार्मिक ग्रंथों से श्रीगीता सबसे छोटा ग्रंथ है पर जीवन और सृष्टि के ऐसे सत्य उसमें वर्णित हैं जो कभी नहीं बदल सकते। इस संसार में समस्त जीवों का दैहिक रूप और उसके पोषण के साधन कभी नहीं बदल सकते -हां उसके वस्त्र, वाहन और व्यापर में बदलाव आ सकता है। इसके साथ ही यह भी सत्य है कि सृष्टि द्वारा प्रदत्त देह में मन, बुंद्धि अहंकार तीन ऐसी प्रवृत्तियों हैं जो हर जीव को पूरा जीवन नचाती हैं। इन पर नियंत्रण करना ही एक बहुत बड़ा यज्ञ है। कहने का तात्पर्य यह है कि श्रीगीता का सत्य सार कभी बदल नहीं सकता।
कुछ लोग इतिहास की बातें कर अपने धर्म की प्रशंसा करते हुए दूसरे धर्म की आलोचना करने लगते हैं। ऐसे लोग हर धर्म में हैं ऐसे में ईसाई धार्मिक स्थान पर श्रीगीता की चर्चा एक महत्वपूर्ण घटना है। विश्व में अनेक ऐसे धार्मिक संगठन है जो धर्म के नाम पर भ्रांति फैलाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं और धार्मिक सिद्धांतों से उनका वास्ता बस इतना ही होता है कि उनके पास पोथियां होती है।
एक पश्चिमी विद्वान ने ही कहा था कि भारतीय की असली शक्ति श्रीगीता का ज्ञान और ध्यान है। उसने यह बात धर्म से ऊपर उठकर प्रमाण के साथ यह बात कही थी। इतिहास लिखने में गड़बड़ियां होती हैं-लेखक अपने नायकों और खलनायकों की अपने ढंग से व्याख्या करते हैं। इसलिये उसके साथ चिपक कर बैठना पौंगेपन के अलावा कुछ नहीं है।
आखिरी बात श्रीगीता के उल्लेख पर हमें अधिक प्रसन्न होने की आवश्यकता नहीं है। सच बात तो यह है कि हमारा समाज उससे दूर होकर चल रहा है। कहने को सभी कहते हैं कि ‘हमारे लिये वह पावन ग्रंथ हैं’पर उसका ज्ञान कितने लोग धारण करते हैं यह अलग से शोध का विषय है। पश्चिम के लोग भौतिकता से ऊब गये हैं इसलिये वह अध्यात्मिक ज्ञान में रुचि रखते हैं और उसका महान स्त्रोत श्रीगीता है। पश्चिम के अनेक लोग अपने धर्म से उठकर श्रीगीता के संदेश को सर्वोत्तम मानते हैं। भारत में भी हिंदुओं के अलावा अन्य धर्म के वह लोग श्रीगीता को समझते हैं जो कट्टरता छोड़कर इसका अध्ययन करते हैं। इतना ही नहीं कबीर और रहीम जैसे महापुरुषों के संदेशों में में भी पूरा विश्व रुचि ले रहा है जिनको हम पुरानी बातें कहकर भूलना चाहते हैं। श्रीगीता का संदेश हो या कबीर दर्शन उस पर अपना अधिकार इसलिये जताते हैं क्योंकि उनका सृजन हमारे देश में हुआ पर याद रखें कि ज्ञान किसी की पूंजी नहीं होता और उसका उपयोग कोई भी कर सकता है। हमने परमाणु तकनीकी इसलिये तो नहीं छोड़ी कि उसका पश्चिम में हुआ है-उसकी बिजली बनाने के अनेक संयंत्र हमारे देश में हैं-उसी तरह पश्चिम भी इसलिये तो हमारे अध्यात्म से मूंह नहीं फेरेगा कि उनका सृजक भारत है। ऐसे में उस भारतीय पादरी की प्रशंसा करना जरूरी है जिसने ईसाई धर्म के लोगों को भारतीय अध्यात्म के मूल तत्वों से परिचय कराने का निष्काम प्रयास किया है।
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