गिरने से पहले वह डालियां सीना तानकर खड़ी थीं

हम किसी बड़ी इमारत में ऐसी जगह बैठे हैं जहां दिन में भी बिजली जलाना पड़ती है। इस कारण चारों तरफ रोशनी बिखरी रहती है। खिड़किया खुली हैं और उन पर रंग बिरंगे पर्दे लहलहा रहे हैं। बाहर तेज गर्मी है और लोग अंदर ऐसी और कूलर में आनंद के साथ बैठकर एक दूसरे से बात कर रहे हैं। अचानक आंधी आती है। बहुत जोर की आंधी हमला करती हुई प्रतीत होती है तो सारा दृश्य बदल जाता है। बिजली चली आती है और खिड़कियां से पल्ले आपस में इतने भयानक रूप से लड़ते हैं जैसे भूतों की कोई फिल्म देख रहे है। खिड़किया बंद कर धूल को अंदर रोकने का प्रयास भी भयानक होता है। अचानक कांच टूटकर आदमी के शरीर पर आ गिरने का खतरा दिखाई देता है। बाहर भी अंधेरा अंदर भी अंधेरा। जो मन अभी दूसरों के साथ बैठकर अंदर बाहर प्रकाश की अनुभूति कर रहा था वह भी अंधेरे में बैठा दिखाई देता है। हंसी ठिठोली के साथ बात करते हुए लोग भयभीत हो जाते हैं। अगर कोई घर से बाहर है तो वह मोबाइल से फोन कर अपने परिवार वालों को सूचित करता है कि ‘मै इधर ठीक हूं तुम घर का ख्याल रखना’। बाहर वायु देवता के प्रकोप से उपजी आंधी चल रही है और मन में चिंताओं की चिता जल रही है।

सच मौसम की तरह जीवन है या यूं कहें कि जीवन की तरह मौसम है। कब मौसम बदले और कब जीवन का रूप कौन जानता है।

मैं रास्ते में स्कूटर पर हूं। आंधी से उड़ती धूल मुझ पर आक्रमण कर मेरी आंखों में प्रवेश कर चुकी है। वह धूल जो कई बार मेरे पांव तले रौंदी गयी है वह हवा के सहारे उड़कर मेरा मार्ग अवरुद्ध करती दृष्टिगोचर हो रही है वह शक्ति का प्रदर्शन कर बता रही है कि प्रतिदिन रौंदे जाने का आशय यह कतई नहीं है कि उसकी कोई शक्ति नहीं है। मैं रुकने के लिये इधर उधर देखता हूं। कुछ पेड़ खड़े दिखाई देते हैं। इनके नीचे कई बार वर्षा होने पर मैंने आश्रय लिया है। यह मेरे प्रतिदिन का मार्ग है पर आज अजनबी हो गया लगता है। मैं इन पेड़ों के नीचे आश्रय लेने की सोच भी नहीं सकता। अचानक वर्षा भी शूरू हो जाती है। मैं स्कूटर लेकर आगे बढ़ता जा रहा हूं। मुझे अपने अंदर ही लड़खड़ाहट का अनुभव होता है। आखिर एक बंद दुकान के नीचे रुकने का निर्णय करता हूं। वहां एक अन्य पथिक भी शायद आश्रय लेकर खड़ा है। मैं स्कूटर खड़ा कर वहां खड़ा हो जाता हूं। थोड़ी दूर पर एक बड़ा पेड़ है पर वहां से कोई खतरा नहीं है।

मैं खड़ा होता हूं, मेरे जेब में रखे मोबाइल में हरकत होती लगती है। मैं फोन उठाता हूं। एक मित्र का फोन है। वह कभी मेरा ब्लाग नहीं पढ़ता पर उसे पता है कि मैं लिखता हूं। अन्य पढ़ने वालों ने उसे बताया भी है। उसे यह भी पता है कि लाईट न होने पर कुछ भी लिखना कठिन है-यह बात मैने उसे बताई। वह कई बार मजाक में विषय भी सुझाता है। मैं फोन उठाता हूं वह हंसते हुए पूछता है-‘‘इस समय कहां हो। कहीं बीच रास्ते में तो नहीं हो। आज तुम्हारे ब्लाग का क्या होगा?‘‘

सूरज डूब चुका है और उसे यह पता है कि मैं रात्रि को घर जाने वाला होता हूं। मेरे मन में विद्रुप भाव उत्पन्न होते हैं और मैं शुष्क भाव से कहता हूं-‘‘तुम्हें मेरी फिक्र है या अपनी? हां मैं तुम्हारा कम कर दूंगा। आज रात मैं उससे शायद ही मिल पाऊं। घर पहुंचने में देर हो जायेगी। फिर पता नहीं आज घर से बाहर जाऊं कि नहीं।

उसने कहा-‘चले जाना यार, इस आंधी में लाईट तो अभी कहीं भी नहीं बन पायेगीं। तुम लिख तो पाओगे नहीं। चले जाओगे तो मेरा काम हो जायेगा।’

अचानक आंधी और तेज हो जाती है। मैने उससे कहा-‘‘मुझे अभी कुछ सुनाई नहीं दे रहा। तुम बाद में बात करना।’

मैने फोन बंद कर दिया। मेरे अंदर उस समय अपने बचाव के लिये संघर्ष के विचार घुमड़ रहे हैं। आंधी की गति ने कुछ दूर खड़े पेड़ की डालियां नीचे गिर पड़ीं। आधे धंटे तक आंधी ने अपना रौद्र रूप दिखाया। जैसे प्रकृति मनुष्य का ललकार रही हो और संदेश देती हो‘आ जाओ, मुझसे युद्ध करो।’

हमेशा अहंकार में डूबे मनुष्य दुबके पड़े हैं। आंधी थम गयी है बरसात भी हल्की हो रही है। मै चलने को उद्यत होता हूं। साथ वाला राहगीर कहता है-‘‘देखिये पल भर में क्या हो जाता है। हम मनुष्य कुछ समझते नहीं। प्रकृति की ताकत देखिये। यह पेड़ की डालियां किस तरह सीना तानकर खड़ी थीं और अब किस तरह आंधी ने उनको गिरा दिया। यह पते जो शान लहरा रहे थे कैसे जमीन पर आकर गिरे।’

मै हंस पड़ा फिर उससे कहा-‘‘पर यह डालियां आंधी आने से पहले सीना तानकर खड़ी थीं। यह पत्ते लहरा रहे थे। यह अपना जीवन जी रहे थे और उसे इन्होंने शान से जिया। यह गिरे यह नहीं बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि यह कैसे जिये? यह प्राणवायु का विसर्जन कर मनुष्यों को जीवन प्रदान करते थे। गिर गये हैं तो भी किसी के काम आयेंगे। कहीं अग्नि में जलकर किसी की रोटी का निर्माण भी करेंगे। आप कुछ देर में देख लेना इनको लोग उठाने आयेंगे और वह कोई इनके निकट संबंधी नहीं होंगे।’

वह आदमी हैरानी से मुझे देख रहा था। फिर बोला-‘‘आपने तो बहुत ऊंची बात कह दी।’

मैंने उसके उत्तर का जवाब नहीं दिया। मैंने कुछ देर पहले ही विकराल आंधी को अपने पास से निकलते देखा था और उस उबा देने वाले संघर्ष ने मेरे को व्यथित कर दिया था कि कुछ अधिक सोच भी नहीं सकता था।

लोगों की लिखने-पढ़ने की रुचि में बदलाव भी संभव-आलेख

कल मैंने हिंदी अंग्रेजी अनुवाद टूल पर एक पोस्ट डाली थी तो उस पर शमशाद जी ने अपनी टिप्पणी (देखें बाक्स में) रखी और यह मानी इस टूल पर हिंदी का ब्लाग रखकर पढ़ा जाये तो नब्बे प्रतिशत परिणाम सही आता है। मैंने भी इतना ही अनुमान किया था। उन्होंने कहा हालांकि कुछ और बातें भी लिखीं है पर मुझे लगता है कि वह उनको इस्तेमाल करने में परेशानी हो रही है। उनका कहना है कि हिंदी अंगेजी दोनों कापी हो जाता है। हां, यह सही है पर उसके बाद अगर कर्सर पुनः अंग्रेजी वाले भाग पर क्लिक किया जाये तो वही हिस्सा कापी होता है।

उनकी टिप्पणी से इस बात की पुष्टि तो हो ही जाती है कि अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद में जितनी निराशाजनक स्थिति है उतनी  हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद नहीं हैं।  गूगल का एक लक्ष्य हिंदी ब्लाग लेखन को प्रोत्साहन देने का इससे तो पूरा हो ही रहा है। मैं एक बात कह सकता हूं कि अगर हम इस पर अपने अनुवाद के लिये कुछ अभ्यास करें तो शेष 10 प्रतिशत से विश्व में हिंदी ब्लाग लेखक अपना एक उल्लेखनीय  स्थान बना सकते हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दूं कि यह अगर हिंदी से अंग्रेजी से अनुवाद कर रहा है तो इसका मतलब यह है कि कुछ अन्य भाषायें भी ऐसी होंगी जिनका यह अंग्रेजी में अनुवाद अच्छा करता होगा। इस बात का हमें विचार अवश्य करना चाहिए। अभी नहीं तो आगे अन्य भाषाओं के ब्लाग लेखक अवश्य ही इसका लाभ उठाते हुए अवश्य प्रसिद्धि प्राप्त करेंगे चाहे भले ही उनको अंग्रेजी कम आती हो। अभी तक हम यह शिकायत करते हैं कि हिंदी में कम लिखा गया है पर आगे यह समस्या भी आयेगी कि हिंदी में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अनुसार नहीं लिखा जा रहा हैं। इसलिये हमें यह विचार करते हुए ही लिखने के मार्ग पर आगे बढ़ना है। 

दीपक जी
अंग्रेजी से हिन्दी में ट्रांसलेशन तो गूगल टूल पर बिलकुल बेकार है हां हिन्दी से अंग्रेजी ट्रांसलेशन काफी हद तक ठीक है। परंतु यहां भी एक समस्या है हिन्दी टाइप करने के बाद ट्रांसलेशन के लिये हम बॉक्स में डालते हैं तो अनुवाद बहुत बेकार होता है परंतु किसी हिन्दी ब्लॉग का यूआरएल लिखकर ट्रांसलेशन करते हैं तो 90 प्रतिशत सही हो रहा है। मैंने हिन्दी में एक पोस्ट लिखकर अंग्रेजी में अनुवाद किया ठीक हुआ परंतु सिर्फ पढने के लिये ठीक था उसे कॉपी करके दूसरी जगह पेस्ट करने पर परिणाम बहुत बुरा निकला। हिन्दी और अंग्रेजी दोनों साथ ही कॉपी हो रहे थे।

अभी तक हिंदी ब्लाग लेखक केवल हिंदी के पाठकों के वृद्धि की प्रतीक्षा कर रहे हैं और अब उन्हें यह भी सोचना होगा कि ऐसे टूलों से उनके ब्लाग किसी भी भाषा के लोग पढ़ सकते है। यह केवल हिंदी ही नहीं हर भाषा के ब्लाग को नये आयाम देने के साथ विश्व में लोगों के पढ़ने और लिखने की रूचियों परिवर्तन में करेगा। मैने आज भी अखबारों में समाचार के आधार पर इस टूल के निराशाजनक होने की बात सुनीं। मैंने एक सज्जन को बताया कि-‘‘इससे हिंदी से अंग्रेजी में अच्छा अनुवाद हो जाता है?’

उन्होंने अपनी नाक-भौं सिकोड़ी-‘इससे क्या फायदा?’

लोगों के कई भ्रम हैं जो इतनी आसानी से नहीं टूटेंगे। दरअसल पिछले कई वर्षों से हिंदी में लोगों को प्रभावित करने वाली सामग्रियां कम होती जा रही है। हां, इस देश में कई लेखक हुए हैं और उनको तमाम पुरस्कार मिले ं पर जनता में उनकी छबि वैसी नहीं बन पायी जैसी अपेक्षा की जाती है। इसका कारण यह भी रहा कि अधिकतर लेखकों ने पहले स्वांत सुखाय लिखा फिर वह पुरस्कारों की दृष्टि से लिखने लगे। देश की गरीबी और भुखमरी को उजागर कर उसके लिये दर्द बटोरने के लिये लिखने वाले अनेक लेखकों ने लिखा और पुरस्कार और सम्मान पाये भी पर जहां लोग इस तरह का दर्द भोग रहे हैं उनको न तो इसका लाभ मिला और न ही कभी उनको अपने दर्द से अलग कुछ मजेदार पढ़ने के लिये मिला। हिंदी में पाठक नहीं मिल रहे हैं तो इसका कारण यह है कि लोगों को यह यकीन नहीं है कि हिंदी में कोई ऐसा लिखा हुआ मिल पायेगा जिससे मन को थोड़ा मनोरंजन और शांति मिल जाये। हालांकि यह अकेला कारण इसके लिये जिम्मेदार नहीं है क्योंकि अधिकतर लोग हिंदी के विकास के बहाने अपने हित साधने के लिये आगे आते हैं और वही तय करते हैं कि किस लेखक को आगे बढ़ायें और किस की उपेक्षा कर दें। शक्ति के सारे केंद्र पर वही लोग हैं और कुप्रबंध का शिकार रहे हिंदी के अनेक लेखक गुमनामी के अंधेरे में खो गये।

ऐसे में जो लेखक अंतर्जाल पर लिखने के लिये आये हैं उन्हें यह बात समझ लेनी होगी कि उनको अपनी भूमिका अंतर्राट्रीय स्तर पर निभानी होगी।  यह मजाक नहीं है और न ही कोई कल्पना। आखिर इस टूल के हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद न होने की कोई शिकायत नहीं मिली। शमशाद जी की टिप्पणी से भी इस बात की पुष्टि होती है। वैसे भी हमारी दिलचस्पी इसके हिंदी से अंग्रेजी अनुवाद में रहनी चाहिए न कि उसके अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद के बारे में सोचकर चिंतित होना चाहिए।

 
http://aakrosh-aakrosh.blogspot.com/

अंधेरे मे तीर चलाना ही उनका काम है-चार क्षणिकाएं

हादसों की खबर से अब
शहर सिहरता नहीं
अपने दर्द इतने भर लिये इंसानं ने
कि किसी अन्य की लाश  से हमदर्दी
जताने के लिये निकलता नहीं
कुछ लोग गिरा देते हैं लाशें
शायद कोई उनको देखकर चैंक जाये
जानते नहीं कि
कोई दूसरे को देखेगा तो तब
अब अपने से आगे देखने की
रौशनी और चाहत होगी
किसी की आंखों  में
अपने सामने कत्ल होते देखकर भी
आदमी अब सिहरता  नहीं
………………………..

शांति की बात सियारों से नहीं होती
पीठ पीछे वार करने वालों से
कभी वफादारी की उम्मीद नहीं होती
जो यकीन करते हैं उन पर
मुसीबत में किसी की भी
उनसे हमदर्दी नहीं होती
…………………

जख्म बांटना ही उनका काम है
इसलिये ही तो उनका नाम है
खंजर लेकर घूमने वालों से दोस्ती की
ख्वाहिश करते हैं कायर
क्योंकि घुटने टेकना ही रोज उनका काम है
………………………..
आग लगाना उनका काम है
मिलते उनको दाम है
कौन देता है कीमत
कौन खरीदता है लाशें
रौशनी जितनी तेज है इस शहर में
अंधेरे का राज है उतना ही गहरा
सच तो सब जानते हैं
पर अंधेरे मे तीर चलाना ही उनका काम है
………………………….

जब लोग अपने दिल की बात लिख देते हैं-आलेख

कल  मीनाक्षी ने मुझे हतप्रभ कर दिया क्योंकि अपने ब्लाग (शब्द पत्रिका) पर मैंने जो लेख रखा था उस पर मुझे कोई टिप्पणी अपेक्षित नहीं थी, पर महेंद्र मिश्र जी और मीनाक्षी जी ने त्वरित टिप्पणी देकर मुझे यह सोचने को बाध्य किया कि आखिर मैं इस हिंदी ब्लाग जगत को क्या समझूं?

पिछले दिनों श्री समीरलाल जी की बात को ध्यान में रखते हुए मैंने आज एक योजना बनाई। सोचा कि चलो आज  से दूसरों के ब्लाग सामने रखकर कविता लिखेंगे और टिप्पणी के रूप में भी रखेंगे और अपनी पोस्ट भी तैयार हो जायेगी। दूसरा लक्ष्य था कि जरा आज हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाने वाले एग्रीगेटर ब्लागवाणी को जरा ध्यान से भी देखें क्योंकि मैं किसी एक एग्रीगेटर  पर ब्लाग देखने को कभी वरीयता नहीं देता। सभी जगह अपने विचार के अनुसार जाता ही रहता हूं। सबसे पहला ब्लाग श्री अनिल रघुराज जी का सामने आया। मैने उसे ध्यान से पढ़ा। मुझे लगा कि इस पर मेरे लिये भी कुछ लिखने को है। इसीलिये एक कविता लिखी और वहां कमेंट के रूप में रख दी। वहां से लौटकर मैंने सोचा लोग चालाकी समझ जायेंगे इसलिये एक कविता और जोड़कर अपनी पोस्ट बनायी।

इसी बीच थोड़ा काम से चला गया और फिर आकर ब्लागवाणी खोली। मैंने सोचा कि चलो कोई और विषय देख लें। वहां देखा तो मदर डे पर अधिक पोस्टें थीं और सोचा कि बना लें कोई हास्य कविता और सब जगह पेस्ट कर दें पर फिर लगा कि उसमें कुछ ऐसा वैसा भी  आ सकता है कि जो किसी कि भावना आहत हो। हालांकि मैं उसमें ऐसा कुछ नहीं लिखता पर हास्य कविता ही अपने आप में ऐसी चीज है कि किसी को भी लग सकता है कि देखो हम तो कितना गंभीर हैं और यह हंस रहा है। अनेक पोस्टें देखीं और लगा कि चलो यह नुस्खा आगे भी आजमायेंगे।  कुल मिलाकर निराश होकर वहां से लौटे। उसी समय एक दोस्त का फोन आया कि आज कुछ ब्लाग पर लिख रहे हो? तो हम देखें। यार, तुम्हारे साथ एक मुसीबत यह है कि इतने ब्लाग मना रखें पता हीं नहीं पड़ता कि किस पर नयी पोस्ट है? मैं तो वह बीस हजार वाली शब्द पत्रिका ही खोलता हूं।’

हमें कुछ नहीं सूझा हमने कह दिया-‘‘आज कहीं घूमे आओ। हम चिंतन लिख रहे हैं और यह शब्द पत्रिका पर ही आयेगा। वैसे तुम कोई भी ब्लाग खोलकर पीछे भी पढ़ा करो। वैसे भी तुम भुगतान के रूप में छहःपोस्ट पढ़ते हो एक टिप्पणी लगाते हो। हमारे मित्रों के ब्लाग पढ़कर हमें उनके बारे में पूछते हो। हमारे कहने के बावजूद वहां टिप्पणियां नहीं लगाते। अगर चाहते हो कि अंतर्जाल पर अच्छा पढ़ा जाय तो उस पर कमेंट लगाओ। अब क्या हम लेखक ही इसका भी दायित्व उठायें? हमें भी क्या मिलता है।’

मित्र का फोन रखते ही हमारे मुख से निकला चिंतन शब्द हमारे दिमाग में घुस गया और फिर बिना किसी संदर्भ के लिखने का मन बनाया। आंखें बंद कीं(कृतिदेव पर लिखते समय ऐसा ही करता हूं) और लिखने बैठ गया। मन में विचारों का क्रम तो सुबह से चल रहा था और एक बार आया कि इसे रोककर दूसरी पोस्ट लिखें पर फिर मैंने सोचा कि अब बहुत हो गया अस्वाभाविक रूप से लिखते हुए। मैनें अपनी पोस्ट लिखी। पोस्ट रखते समय मैं यह अनुमान कर रहा था कि ब्लागवाणी पर अधिकतम पांच का आंकड़ा शायद ही छू पाये। सामान्य शीर्षक और फिर साथ में आलेख का संकेत ब्लागवाणी पर हिट दिलाएगा यह आशा मैं नहीं कर रहा था। न ही अपने मित्र ब्लाग लेखकों से यह आशा कर रहा था कि वह टिप्पणी लिखने के लिए इसे पढ़ेंगे क्योंकि इसके लिये कोई और पोस्ट भी आ सकती है। रखते समय यह भी जानता था कि यह पोस्ट आगे चलकर लंबे समय तक हिट लेती रहेगी और इस पर टिप्पणियां आतीं रहेंगी।

मैं अब ऐसी पोस्टें नहीं लिखना चाहता जो सामयिक विषयों से संबंधित हों। उसमें मेरा परिश्रम हो समय व्यर्थ ही नष्ट होता है।

मीनाक्षी जी ने लिखा
“पढ़ते तो हमेशा है और सोचते हैं कि आप के लेख टिप्पणी के
मोहताज़ नहीं . आज अनायास जी चाहा कि अपने मन के भाव
लिख डालें. आपके सभी  ब्लॉग एक से बढ़कर एक हैं. जीवन को
आसान बनाने के छोटे छोटे मंत्र यहाँ हैं जो बड़ी गहरी बात समझा
जाते हैं. आभार”

महेंद्र मिश्रा जी ने लिखा
“अपने अंदर ही यह अहसास होता हैं कि हम केवल अपने मुख से अपनी झूठी प्रशंसा  कर रहे हैं।
बहुत बढ़िया आलेख प्रस्तुति के लिए धन्यवाद”

टिप्पणियां बहुत आतीं हैं पर कुछ लोग अपने मन की बात इस तरह रख देते हैं तब मैं सोचता हूं कि इनके लिए लिखते रहना चाहिए। कुछ दिनों से मेरा विचार तो यह भी बनता और बिगड़ता  रहा है कि नारद और चिट्ठा जगत ने मेरे जो दो ब्लाग मुझसे पूछे बगैर ही अपने यहां दिखाने शुरू किये हैं अब उन पर ही लिखूं-क्योंकि ब्लागवाणी पर जब कोई हिट की चर्चा मेरे ब्लाग पर करता है तो मुझे अपना ध्यान भंग होता नजर आता है। आज मीनाक्षी जी की टिप्पणी ने मेरे इस विचार को समाप्त ही कर दिया है। मेरा लक्ष्य आम पाठक है और अपनी बात वहां तक पहुंचाने से ही मुझे संतुष्टि होती है। टिप्पणियां लिखता हूं और लोग मुझे देते हैं। इसे मैं एक सामाजिक व्यवहार की तरह मानता हूं-जैसे एक दूसरे से नमस्कार या प्रणाम करना। मेरी अनेक पोस्टें बिना टिप्पणी के आतीं हैं।  आम पाठक की तरह ब्लाग लेखकों में भी विविध रुचि वाले लोग हैं पर चिंतन भी कोई पसंद करता हूं यह मुझे आज पता लगा।
कुछ ऐसी भी घटनाऐं हुईं है कि मैं किसी वरिष्ठ ब्लाग लेखक की पोस्ट पर टिप्पणियां रखकर आया क्योंकि उनका लेखकर मुझे पसंद आया। उन्होने मेरी पंद्रह-पंद्रह दिन पुरानी पोस्ट पर टिप्पणी लिख कर जो कहा उसे यहां दोहराने से कोई मतलब नहीं है। एक ब्लाग लेखक ने लिखा कि‘आपकी हास्य कविता देखकर तो मैं यह समझा कि आप को आम हास्य कवि हैं पर आपका इस ब्लाग की यह  इतनी गहन चिंतन वाली पोस्ट देखकर तो मै हैरान रह गया हूं।’

मैं बहुत पोस्टें लिखता हूं और मुझे नियमित टिप्पणियां देने वाले मित्र सभी पर आयें यह संभव नहीं है और आयें तो मुझे यह लगेगा कि यह मेरी वजह से कष्ट उठा रहे है।

अगर मेरा अनुमान सही है तो अनेक आम पाठक भी टिप्पणियां लिख रहे हैं। कुछ लोगों के पास हिंदी टूल मैंने भिजवाया है। इस समय ब्लाग लेखकों में तमाम तरह की निराशाजनक बातों की चर्चा चल रही है। ऐसे में आम पाठक अगर यह सोचता है कि उसे और अच्छा लिख हुआ पढ़ने को मिले तो उसे भी अब टिप्पणियों को बोझ उठाना होगा। आम पाठकों से सहयोग के बिना अंतर्जाल पर हिंदी में बहुत अच्छा और सार्थक लिखना कठिन है। मेरे ब्लाग पर आने वाले पाठक साइडबार से दूसरे के ब्लाग पर जाते हैं तो मेरी उनसे अपेक्षा रहती है कि वहां वह कोई टिप्पणी जरूय लिखें। सभी ब्लाग पर कमेंट के कालम हैं।

अब हिंदी ब्लाग जगत पर अनेक लेखक साहित्य-व्यंग्य, कहानी, कविता और आलेख-लिख रहे हैं और अंग्रेजी-हिंदी अनुवाद टूल को जिस तरह गूगल हिंदी पृष्ठों के साथ जोड़ रहा है उससे लग रहा है कि हिंदी के कई नये लेखक  अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना और भाषा का नाम रोशन करेंगे।

आम आदमी बने रहने की कोई नहीं सोचता-आलेख

कहने को कई लोग आपसी वार्तालाप में ऐसी टिप्पणियां कर जाते हैं जो उनके स्वयं के समझ में नहीं आतीं तो किसी अन्य व्यक्ति के समझ में क्या आ जातीं  हैं।

एक सज्जन ने कहा कि‘नेता बनने की बजाय मैं भिखारी बनना चाहूंगा।’

एक सज्जन को मैने कहते सुना-‘मैं संत की बजाय वैश्या बनना चाहूंगा।’

किसी ने कहा-‘मैं पुलिस वाला बनने की बजाय मूंगफली बेचने वाला बनना चाहूंगा।

मतलब यह कि किसी खास आदमी से नाराज होने के कारण  कोई व्यक्ति वैसा नहीं बनना चाहता-इस बात की घोषणा तो वह करता है पर आम आदमी बने रहने की कोई इच्छा छोड़कर वह कुछ बनना चाहता है।
हर कोई अपने पास शक्ति के स्त्रोत बनाये रखना चाहता है। पद, पैसा और प्रतिष्ठा पाने के मोह में सब अंधी दौड़ प्रतियोगिता के धावक है। हर कोई आम आदमी की जमात से बाहर  निकलकर खास आदमी की तरह चमकना चाहता है। अपने से दूर उसे आकर्षण का केंद्र दृष्टिगोचर होता है। वहां पहुंचता है तो उसे फिर वही अंधेरा दिखाई देता है। वह फिर दूसरी जगह आकर्षण की तलाश करता है। कोई पद मिल गया तो उससे संतोष नहीं होता उसके साथ अन्य लाभ भी होना चाहिए। धन का लाभ होता है तो वह अन्य प्रकार के लालच भी करता है। घर के बाहर किसी अन्य महिला से संपर्क बने यह भी कुछ लोग अपने अंदर विचार करते हैं। कोई व्यक्ति उसके सामने सच न कहे यह अहंकार का भाव उसमें आता है। अपने ही बनाये गये जाल में पकड़ा   जाता है और फिर  कहता है कि ‘‘मेरे पास सब है पर शांति नहीं है जिसके पास शांति है वही सुखी है।‘

जिसके पास धन प्रचुर मात्रा में नहीं है, न वह किसी उच्च  पद पर विराजमान है, न किसी उच्च पद वाले व्यक्ति का हाथ उसके ऊपर है और न ही वह देह से बलवान होता  है, उसे भी अपने ऐसे गुणों का बखान करने की आदत होती है जो उसमें है ही नहीं। वह अपने को खास आदमी साबित करना चाहता है। हर आदमी  आम है पर खास कहलाना चाहता है। यह भाव  है आदमी के चरित्र और विचारों में पतन का कारण ।

एक बार आम आदमी होने का बोध धारण कर लो और खास आदमी को दूर से देखकर ही अपनी नजर फेर लो। ऐसा नहीं कर सकते  तो पहले उस खास आदमी की दिनचर्या देखो उसमें ऐसा कुछ नहीं होता जो आम आदमी में नहीं होता। उसमें भी  वैसे ही गुण और अवगुण होते हैं जैसे आम आदमी में होते हैं। जब अपने आम आदमी की तरह अनुभव करोगे तुम्हारे ज्ञान चक्षु खुल जायेंगे। यह अनुभव कर सकते हो कि उसके और तुम्हारे अंतर्मन में कोई अंतर नहीं है। आम आदमी होने को अर्थ है जीवन के प्रति दृष्टा भाव रखना। जब हम दृष्टा भाव से देखेंगे तब हमारे मन की बेचैनी दूर हो जायेगी। हमारे जैसी हालत में सब जी रहे हैं। हां, कुछ बाहरी दिखावा करते हैं और उनके देखकर हम भी उन जैसा करने लग जाते हैं फिर अपने अंदर ही यह अहसास होता हैं कि हम केवल अपने मुख से अपनी झूठी प्रशंसा  कर रहे हैं। 

अनुवाद टूल से सभी भाषाओं के लेखक करीब आयेंगे-आलेख

मैंने कुछ अंग्रेजी ब्लाग के पाठों को हिंदी में अनुवाद कर उन्हें पढ़ा। इसमें कुछ भारतीय लेखकों द्वारा भी लिखे गये हैं। ऐसा लगता है कि विश्व का पूरा ब्लाग जगत एक समय एक जैसा ही दिखाई देगा हालांकि उनमें लिखी गयी विषय सामग्री अपने देश और क्षेत्र के कारण पृथक-पृथक दिखाई देगी पर मूल तत्व एक समान नहीं परिलक्षित होगा।

हिंदी अंग्रेजी अनुवाद टूल का उपयोग करने से वह ब्लाग लेखक भी अपनी भाषाई सीमाओं से निकलकर बाहर प्रतिष्ठित हो सकते हैं जो अंग्रेजी नहीं जानते। हिंदी फोरमों पर अपंजीकृत ब्लाग पर मैं अपने पाठों के अंग्रेजी अनुवाद भी प्रस्तुत कर रहा हूं। अंग्रेजी में मेरे आलेख साफ पढ़े जा सकें इसलिये अनुवाद टूल पर मुझे मेहनत तो होगी पर जिज्ञासावश मै यह कर रहा हूं। इस अंग्रेजी-हिंदी टूल की जानकारी अभी मिली पर यह पहले से ही कहीं उपयोग में लाया जा रहा है। एक ब्लाग लेखक ने मुझे उस दिन अपनी एक पोस्ट पर टिप्पणी दी थी और जब मैं उसके ब्लाग पर गया तो वहां हिंदी में पोस्ट थी। ब्लाग लेखक का नाम अंग्रेजी में था। पहले भी कई अंग्रेजी नामों वाले टिप्पणी लिखते रहे पर मैं सोचता था कि यह ऐसे ही रख रहे होंगे। एक ब्लाग लेखक ने मेरे ब्लाग पर अपनी टिप्पणी में ऐसे हिंदी-अंग्रेजी टूल की चर्चा की थी तब मुझे लगा था कि एक दिन ऐसा टूल आयेगा पर इतनी जल्दी आयेगा ऐसी अपेक्षा मुझे नहीं थी।

मुख्य बात है कि अनुवाद का परिणाम शतप्रतिशत नहीं है पर उससे अंग्रेजी को पढ़ने के सहायता तो मिल ही रही है। इसलिये उसका लिखने के लिये भी उपयोग कर रहा हूं। मैं जब अपना पाठ उस पर अनुवाद के लिये लाता हूं तो कई शब्द वह स्वीकार नहीं करता पर फिर उसके लिये वैकल्पिक शब्द रखता हूं। मेरी रचना अंग्रेजी में थोड़ा बहुत समझी जाये तो वह भी मुझे अच्छा लगेगा। ऐसा लग रहा है कि उसकी प्रतिक्रिया सकारात्मक होने वाली है। कुछ अंग्रेजी ब्लाग लेखक भी हिंदी ब्लाग लेखकों से संपर्क बनाने के लिये प्रयासरत दिख रहे हैं। हिंदी ब्लाग लेखक को अब अपन मनःस्थिति विदेशी भाषी ब्लाग लेखकों से अपने संपर्क रखने के लिये बना लेनी चाहिए। यह ब्लाग यहीं घूमने वाले नहीं है और अनुवाद टूल के माध्यम से अन्य भाषी ब्लाग लेखकों से इनके संपर्क में आने की पूरी संभावना है।

ब्लाग शब्द का किसी भाषा में कोई अनुवाद नहीं है और ब्लाग लेखकों के लिये भाषाई दीवार भी खत्म होती नजर आ रही है। कल एक अंग्रेजी ब्लाग लेखिका ने एक पोस्ट पर प्रतिक्रिया दी तो बात समझ में आ गयी कि वह मेरी पोस्ट पढ़कर ही वह लिख रही है Jennifer Lancey ने लिखा Hello there. I was sent a link to your blog by a friend a while ago. I have been reading a long for a while now. Just wanted to say HI. Thanks for putting in all the hard work। अब है न आश्चर्य की बात कि मैं लिख रहा हूं हिंदी में पढ़ रहे है वह लोग जो केवल अंग्रेजी ही जानते हैं। उसने मेरे अंग्रेजी अनुवाद को पढ़ा और उसके बारे में उसकी राय पता नहीं चलती, पर हम लोग भी भला कहां ऐसी टिप्पणियां लगाते हैं जिससे स्पष्ट होता है कि हमारे समझ में आया कि नहीं। हां, मैं इस बात का इंतजार नहीं कर रहा कि कोई मेरे हिंदी ब्लाग को अनुवाद टूल से पढ़े बल्कि स्वयं ही अनुवाद भी रख रहा हूं। अनुवाद में अशुद्धियों को ठीक करने पर इसलिये मेहनत कर रहा हूं ताकि मेरी पोस्ट और अधिक स्पष्ट पठनीय हो। अब लिखते समय इस बात का भी ध्यान रख रहा हूं कि मेरा ब्लाग अन्य भाषाओं के भी अनुवाद होगा। विश्व के सभी भाषाओं के ब्लाग लेखक एक दिन इतने करीब आ जायेंगे कि उनमें दूरियां नाम की रह जायेंगी। मैं चाहता हूं कि हिंदी के ब्लाग लेखक भी विश्व पर प्रतिष्ठित हों और उन्हें अपनी पोस्टों को समय होने पर कभी कभी अनुवाद टूल पर देखना चाहिये कि वह अंग्रेजी में पूरी तरह अनुवाद से पढ़ने में आती है कि नहीं। जो शब्द अनुवाद न हों उसके लिये वैकल्पिक शब्द चुन कर रखें। जरूरी नहीं हैं कि हम अंग्रेजी अनुवाद रखें पर उसे इस लायक तो बना सकते हैं कि उसका अंग्रेजी में अधिकतम शुद्ध अनुवाद हो जाए। इसमें कोई आपत्तिजनक नहीं है क्योंकि हम हिंदी में लिख रहे हैं और अगर अन्य भाषाओं के ब्लाग लेखक हमसे संपर्क रखने के इच्छुक हों तो उन्हें सुविधा हो जायेगी। एक बात का अनुभव हुआ कि अपने पाठों में हम जितने अधिकतम शुद्ध हिंदी शब्दों का उपयोग करेंगे उतना ही इसका अंग्रेजी अनुवाद शुद्ध होगा।

Google’s translation of the text has been presented here to http://rajdpk1.wordpress.com

मै अखबार आज भी क्यों पढ़ता हूं-हास्य व्यंग्य

          मैने अखबार पढ़ना बचपन से ही शुरू किया क्योंकि मोहल्ले का वाचनालय हमारे किराये के घर के पास में ही था। धीरे-धीरे इसकी ऐसी आदत हो गयी कि जब हमने मकान बदले तो भी मैं सुबह वाचनालय अखबार पढ़ने जरूर जाता और धीरे-धीरे शहर बढ़ने के साथ  थोड़ी दूर एक कालोनी में आया और वहां कोई वाचनालय नहीं होने के कारण अखबार मंगवाना शुरू किया।

इधर इलैक्ट्रोनिक मीडिया के तेजी से बढ़ने के साथ ही डिस्क कनेक्शन भी लग गया और एक लायब्रेरी भी पास में खुल गयी जहां मैं अपने घर आने वाले अखबार के अलावा अन्य अखबार वहां कभी कभी पढ़ लेता हूं। कई बार सोचता हूं कि अखबार बंद कर दूं पर श्रीमतीजी उसे बड़ी रुचि के साथ पढ़ती हैं और वही हमें बतातीं हैं कि आज अमुक जगह आपको शवयात्रा या उठावनी में जाना है।

सुबह जब मैं अपने घर के बाहर पेड़ के नीचे योगसाधना करता हूं  तब अखबार वाला फैंक कर चला जाता है और उस समय वह कई बार मेरे ऊपर आकर गिरता है। खासतौर से जब उष्टासन या सर्वांगासन के समय वह आकर गिरता है तब अगर श्रीमतीजी वहां  होती है तो जोर-जोर से  हंसती हैं।

कई बार देर होने की वजह से अखबार नहीं पढ़ पाता तो श्रीमती जी मोबाइल पर सूचना देतीं हैं ‘आपने आप अखबार नहीं पढ़ा आज उठावनी पर जाना है‘ या ‘आज आप जल्दी निकल गये उधर शवयात्रा पर जाना है’। शहर से बाहर होने के बावजूद आप अपने लोगों से कट नहीं सकते। किसी कि शादी में आप जायें या नहीं या कोई आपको बुलाये या नहीं पर गमी में आपको जाना ही चाहिये और इसी कारण इसकी सूचना कहीं न कहीं से होना जरूरी है। कई बार निकट व्यक्ति होने के कारण सूचना फोन पर आ जाती है, पर अगर थोड़ा दूर का हो तो उस फिर उसके लिये अखबार एक मददगार साबित होता है।

कई बार ऐसे अवसरों पर दूसरे शहर भी जाना पड़ता है। उस समय उस शहर में बस स्टेंड या रेल्वे स्टेशन पर ही अखबार खरीद लेता हूं जिससे पता चल जाता है कि उठावनी कहां है। कई बार तो  ऐसा भी हुआ है कि जिनके घर हम जा रहे हैं उनका पता हमें इसीलिये नहीं होता क्योंकि पहले कभी उनके घर गये नहीं हैं या उसकी आवश्यकता नहीं अनुभव की। तब ऐसे ही अखबार से पता लिया है। एक बार तो हम छहः लोग एक साथ एक दूसरे शहर उठावनी में शामिल होने जा रहे थे पर किसी के पास पता नहीं था। तब मैंने ही अखबार का आईडिया सुझाया और मेरा अनुमान सही निकला।  हम समय पर वहां पहुंच गये और वहां किसी को नहीं बताया कि अखबार से पता निकाल कर लायें हैं वरना कोई सुनता तो क्या कहता कि निकटस्थ लोग होकर इनको घर का पता तक नहीं मालुम था। वह समय यह सफाई देने का नहीं होता कि जिसके यहां आये हैं वह हमारे पास कई बार आये पर हम उनके यहां पहली बार आये हैं।

एक बार तो हम एक शोक कार्यक्रम में शामिल होने गये तो जिस व्यक्ति के यहां जा रहे थे उसके घर पर न होने की पक्की संभावना थी क्योंकि उनके पिता का देहांत हुआ था और वह उनसे अलग रहते थे। हम पांच लोग थे और इस बात को लेकर चिंतित थे कि कैसे वहां पहुंचेगे। मैने बस से उतरते ही अखबार खरीद लिया और फिर हमारी समस्या हल हो गयी।

हालांकि अखबार में कई दिलचस्प खबरे आतीं हैं और वह हमारे जीवन को अभिन्न अंग है पर समय के साथ कुछ ऐसा हो गया है कि उसमें दिलचस्पी तभी होती है जब समय होता है पर फिर भी ऐसे अवसरों पर अखबारों की सहायता मिलती है जो उनके प्रकाशन का उद्देश्य बिल्कुल नहीं होता।  हालांकि आजकल अखबार इतने सस्ते हैं कि उसका व्यय तो कही गिना भी नहीं जाता पर फिर भी कभी आदमी सोचता है कि क्या फायदा? कहा जाता है कि किसी की शादी में भले मत जाओ पर गमी में जरूर जाना चाहिए। शहरों के बढ़ने के साथ आधुनिक साधन भी आये हैं पर आदमी की सोच और विचार का दायदा सिकुड़ रहा है। कई बार लोग ऐसे अवसरों सूचना नहीं देते या आवश्यकता नहीं अनुभव नहीं करते पर वहां अपना पहुंचना जरूरी होता है तब अखबारों की सहायता मिल जाती है। इसलिये आज भी अखबार पढ़ता हूं तो केवल इसलिये ताकि अन्य सूचनाओं के साथ ऐसी सूचनाएं भी मिलतीं रहें जिससे समाज से सतत संपर्क में रहा जा सके। अन्य सूचनाएं भी मिल जाती है जो महत्वपूर्ण होती हैं और अपने लिखने के साथ जानकारी बढ़ाने के काम भी आतीं हैं।


क्रिकेट मैच के लिये एक्शन सीन लिख देना-हास्य व्यंग्य

ब्लागर अपने कंप्यूटर पर बैठा था कि उसकी पत्नी ने उसे दूसरे ब्लागर के मिलने की खबर अंदर आकर सुनायी। उसने कहा-‘बोल दो घर पर नहीं है।’

तब तक दूसरा ब्लागर अंदर आ गया और बोला-‘भाई साहब हमसे क्या नाराजगी है?’

पहले ब्लागर ने कहा-‘‘नाराजगी तुमसे नहीं है। तुम्हारी भाभीजी से है तुम्हें अंदर न बुलाकर हमें यह बताने आयीं हैं कि तुम आ गये हो। वैसे हमारी नजरें बहुत तेज हैं और हमने देख लिया था कि तुम अंदर आये हो।’

वह आकर उसके पास रखी कुर्सी पर बैठ गया और बोला-‘‘भाभीजी, आप मुझे शिकंजी पिलाईये। भाई साहब जरूर शिकंजी पीते हैं-ऐसा मेरा विश्वास है।’

पहले ब्लागर ने कहा-‘पर यह बात हमने अपने किसी ब्लाग पर तो नहीं लिखी।’

दूसरा ब्लागर बोला-‘मैने अंदाजा कर लिया था। शिकंजी पीकर इंटरनेट पर ब्लाग पर अच्छी तरह लिखा जा सकता है।’

भद्र महिला चली गयी तो वह अपने असली रूप में आ गया और बोला-‘पर जरूरी नहीं है कि शिकंजी पीकर हर कोई ब्लाग पर अच्छा लिख सकता हो।’

पहले ब्लागर ने कहा-‘हां इसमें कोई शक नहीं है, अगर वह कुछ लिखता हो तो?’
दूसरे ने ब्लागर ने कहा-‘हम पर फब्तियां कस रहे हो!
पहले ब्लागर ने कहा-‘‘और तुम क्या कर रहे थे?वैसे इधर कैसे भटक गये।’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘‘मैं एक क्रिकेट प्रतियोगिता करा रहा हूं। जिसमें चार ब्लागर और चार कमेंटरों की टीमें हैं। मै चाहता हूं कि तुम उनके लिये कोई एक्शन सीन लिख दो।’

तब तक गृहिणी शिकंजी के ग्लास बनाकर लायी। उसने जब सुना कि कोई क्रिकेट के एक्शन सीन की बात हो रही है तो वह उत्सुकतावश वहीं एक तरफ बैठ गयी।
पहला ब्लागर-‘क्रिकेट मैच के लिये एक्शन सीन? और इतने सारे ब्लागर और कमेंटर तुम्हारे पास आये कहां से? क्या कहीं से नीलामी में ले आये क्या?’

दूसरा ब्लागर अब गृहिण की उपस्थिति के आभास होने पर सम्मान के साथ बोला-‘अरे भाईसाहब, आप भी कैसी बात करते हो। अरे, आजकल वह समय गया। आप देख नहीं रहे कहां का खिलाड़ी कहां खेल रहा है। शहर का वासी हो या न हो तो पर उस शहर की तरफ से खेल तो सकता है। वैसे ही ब्लागर हो या न हो, कमेंटर हो या न हो और उसने कभी इंटरनेट खोला भी न हो पर हमने कह दिया कि ब्लागर तो ब्लागर। हमें अपने काम और कमाई से मतलब है।’
दूसरा ब्लागर उसे हैरानी से देखने लगा। फिर वह बोला-‘‘आप तो कुछ एक्शन सीन लिख दो।