धरती के मौसम अलग अलग और आदमी का मन एक -हिन्दी लेख

              अगर मौसम का बदलना न हो तो शायद जीवन इस धरती पर विचरने वाले सभी जीवों का बदरंग हो जाये। मनुष्य का मन तो वैसे भी बहुत शीघ्र एकरसता से ऊब जाता है और मौसम का बदलाव ही उसे वह लाभ देता है जिससे वह एक समय के बाद स्वतः तरोताजा हो जाता है। हमारे देश को समशीतोष्ण जलवायु वाला भूभाग माना जाता है। जब तक विश्व में मौसम की विविधता रही तब तक यहां तेज गर्मी और सर्दी का अहसास किया हमेशा जाता रहा है। उत्तर भारत में पहाड़ों की वजह से गर्मी में धूप की तेजी और सर्दी में ठंडी हवाओं का प्रकोप इस कदर रहता है कि सामान्य आदमी कांपने लगता है। इसलिये यहां सावन तथा बसंत मौसम सबसे अधिक लोकप्रिय रहा है जिसमें लोगों को रहता वाली वायु मिलती है। यह अलग बात है कि श्रमजीवी समाज के लिये ऐसे अवसर पर भी दर्दनाक स्थितियों का सामना करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता।
          मध्यम वर्गीय कार्यशील समाज गर्मी में सुबह शाम और सर्दी की दोपहर में गतिशील होकर अपने को बचाता है। उच्च वर्ग के लिये तो अब वातानुकूलित भवनों तथा वाहनों का जमावड़ा हो गया है इसलिये वह मौसम की मार से दूर है यह अलग बात है कि इसी वर्ग के कई लोग हमारे समाज के भाग्यनियंता हैं और उन्हें देश की समस्याओं पर विदेशी ढंग से सोचने की आदत हो गयी है।
       अब पूरी दुनियां में मौसम बदला है। रहन सहन और खान पान के साथ मनोरंजन के साधन भी बदले हैं। हालांकि इस बदलाव को कुछ लोग देखते है उनमें से बहुत उसे शब्दों में व्यक्त भी करते हैं। जो देखकर कुछ नहीं बोलते या निजी बातचीत में कहीं व्यक्त करते हैं तो वह निजता के दायरे में रहता है पर कोई लेखक या वाचक व्यक्त करता हैं तो वह सार्वजनिक विचार बन जाता है। ऐसे में अभिव्यक्त होने वालों की सोच पर भी विचार होता है। संसार के बदलाव को व्यक्त करने वालों की सोच का दायरा भी अब सिकुड़ गया है। विश्व में फैले प्रदूषण ने बुद्धिजीवियों की सोच को कलुषित या संकुचित नहीं किया हो यह संभव कैसे हो सकता है? वह केवल अपनी सीमा में ही सोचते हैं। संसार में आये बदलाव ने मनुष्य को दैहिक रूप से गतिशील बनाया है पर मानसिक रूप से जड़ की तरह खड़ा भी कर दिया है। जिनमें चेतना है उनकी सोच का दायरा भी इतना ंसकीर्ण हैं कि वह ‘मैं और मेरे’ की नीति से आगे नहीं जा पाते।
      हम मौसम के बदलाव को देखने के साथ उसे परिभाषित होते भी देख रहे हैं मगर लगता है जैसे कि वह अपूर्ण है। उसमें अभी अधिक जानने की आवश्यकता है। सवाल यह है कि उसे व्यक्त कौन करे? बुद्धिजीवी मौसम के बदलाव को मनुष्य तथा अन्य जीवों पर पड़ने वाले दैहिक प्रभावों का अध्ययन कर सकते हैं पर मानसिक प्रभावों का अध्ययन नहीं कर पाते। पश्चिम में ऐसी कोई विद्या नहीं है जिसमें दैहिक तथा मानसिक प्रभावों का एक साथ अध्ययन किया जा सके। वहां शारीरिक विज्ञान और मनोविज्ञान को अलग अलग विषय माना जाता है। यही कारण है कि मौसम के बदलाव को मनुष्य की दैहिक स्थिति पर ही दृष्टिपात किया जाता है।
हमारे यहां श्रीमद्भागवत गीता के साधक दोनों ही प्रभावों का अध्ययन करते हैं पर उनकी अभिव्यक्ति को वैज्ञानिक नहीं माना जाता है। श्रीमद्भागवत गीता को एक धार्मिक ग्रंथ माना जाता है। गीता साधक जानते हैं कि यह ज्ञान और विज्ञान से सुजज्जित ऐसी पुस्तक है जिसकी मिसाल अन्यत्र नहीं मिलती। इंद्रिया ही इंद्रियों में बरत रही है और गुण ही गुणों में बरत रहे हैं यह ऐसे वैज्ञानिक सूत्र हैं जिनका आधुनिक चिकित्सा शास्त्री विश्लेषण नहीं कर सकते और जो ज्ञानी करते हैं उनके पास आधुनिक चिकित्सा शास्त्र की कोई उपाधि नहीं है। श्रीमद्भागवत गीता में वर्णित विज्ञान तत्व पर  गेरुए या धवल वस्त्रधारी धार्मिक प्रवचनकर्ता अपनी अभिव्यक्ति  उस ढंग से नहीं करते जिससे उसकी आधुनिक समय में नई सोच पैदा हो। 
          जब मौसम का प्रभाव देह पर पड़ता है तो मन कैसे बच सकता है। अगर कोई व्यक्ति गर्मी में तप रहा है तो आप उसे यह आशा कैसे कर सकते हैं कि वह आपको शीतलता प्रदान करे। जिसका कंठ सूखा है वह कैसे दूसरे की प्यास बुझा सकता है। उसी तरह जिसका निवास दलदल में है या नाले आदि के पास वह रहता है तो वहां आ रही दुर्गंध उसके देह में प्रवेश करती है। मच्छर या मक्खियों के काटने से वह बीमार पड़ता है। इससे उसकी देह हमेशा कष्ट में रहती है पर दुर्गंध से जो उसका मन विषाक्त होता है उसे कौन समझ सकता है। यह तो रहन सहन का नकारात्मक पक्ष पर इससे मन में जो ग्लानि आती है उसे कोई देखना नहीं चाहता। ऐसे में मौसम के बदलाव ने मनुष्य की मनस्थिति बदली है इस पर कोई विचार नहंीे रक सकता। देखा जाये तो प्राकृतिक रूप से सारे मौसम मौलिक है पर उनके प्रभाव परिवर्तित हुए हैं। उसी तरह मनुष्य की प्रकृति में भी बदलाव नहीं हो सकता पर भले वह मौसम में बदलाव से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती। 
      आखिर यह हमने सब किसलिये लिखा? दरअसल श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों की आज भी प्रासांगिकता है यह बताने के लिये हम यह लिख रहे है कि उसके संदेश इस संसार की मूल प्रकृतियों का विज्ञान बताते हैं जिनमें बदलाव संभव नहीं है। एक समय हमारे देश में सात्विक प्रवृत्ति के लोगों का प्रभाव था पर आज हम देख रहे हैं कि तामसिक लोग प्रभावी होकर समाज के शीर्ष पर बैठे हैं। लोग भले ही कहे कि हम इसके लिये जिम्मेदार नहीं है पर यह अपने आपको धोखा देना है। हम अपने योग और गीता के विज्ञान को भूल गये है इसलिये हमारी सभी इंद्रियों की सक्रियता सीमित हो गयी है। वातावरण में प्रदूषण ने हमें इतना विषाक्त बना दिया है कि हमारी बुद्धि, मुख, तथा आंखें जहर को अमृत समझने लगी हैं। उसका अध्ययन श्रद्धा के साथ ही ज्ञान प्राप्त करने के लिये करें तो उसके संदेश आज भी हमें ज्ञान के साथ संतोष प्रदान कर सकते हैं है। मूल बात यह है कि हमें इसके लये अपना दृष्टिकोण बदलना होगा अपने अध्यात्म ग्रंथों को आधुनिक संदर्भों में देखना होगा।
लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

writer aur editor-Deepak ‘Bharatdeep’ Gwalior

मुफ्त में ईमानदारी-लघु हिन्दी हास्य व्यंग्य

                विद्यालय के संचालक ने प्राचार्य को बुलाकर कहा कि-‘‘देखो मैंने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में भाग लेने का फैसला किया है। तुम अपने साथ शिक्षकों को मेरे साथ रैली में भाग लेने के लिये तैयार रहने के लिये कहो। विद्यालय के छात्रों के लिये देश में व्याप्त भ्रष्टाचार रोकने के संबंध में विशेष ज्ञान देने का प्रबंध करो। मैं चाहता हूं कि मेरे साथ मेरे विद्यालय का नाम भी प्रचार के शीर्ष पर पहुंचे।’’
           प्राचार्य ने कहा-‘‘महाशय, आपका आदेश सिर आँखों  पर! मगर इसी आंदोलन  की वजह से हमारे विद्यालय के शिक्षक अब जागरुक हो गये हैं। आप जितने वेतन की रसीद पर हस्ताक्षर करते हो उसका चौथाई ही केवल भुगतान करते हैं। वह चाहते हैं कि कम से कम आधी रकम तो दें। विद्यार्थियों के पालक भी तयशुदा फीस से अलग चंदा या दान देकर नाराज होते हैं। ऐसे में आप स्वयं भले ही इस आंदोलन में सक्रियता दिखायें पर विद्यालय की सक्रियता पर विचार न करें, संभव है यह बातें आपके विरुद्ध प्रचार का कारण बने।’’
संचालक ने कहा-‘‘तुम कहना क्या चाहते हो, यह भ्रष्टाचार है! कतई नहीं, यह तो मेरा निजी प्रबंधन है। हम तो केवल सरकारी भ्रष्टाचार की बात कर रहे हैं!’’
            प्राचार्य ने कहा-‘हमारे पास कुछ मदों मे सरकारी पैसा भी आता है।’’
संचालक ने कहा-‘‘वह मेरा निजी प्रभाव है। ऐसा लगता है कि तुम देश का भ्रष्टाचार रोकने की बजाय उसकी आड़ में तुम मेरे साथ दाव खेलना चाहते हो! तुम मेरा आदेश मानो अन्यथा अपनी नौकरी खोने के लिये तैयार हो जाओ।’’
             आखिर प्राचार्य ने कहा-‘‘आपका आदेश मानने पर मुझे क्या एतराज हो सकता है? पर संभव है कि छात्रों के पालक अपने बच्चों में भ्रष्टाचार के विरुद्ध तिरस्कार का भाव देखकर नाराज हो जायें। आप तो जानते हैं कि अधिकतर माता पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा पढ़ लिखकर बड़े पद पर पहुंचे। बड़ा पद भी वह जो मलाईदार हो। ऐसे में अगर उसकी निष्ठा कहीं ईमानदारी से हो गयी तो संभव है वह अधिक पैसा न कमा पाये। भला कौन माता पिता चाहेगा कि उसका बेटा मलाई वाली जगह पर बैठकर माल न कमाये। सभी चाहते हैं कि देश में भ्रष्टाचार खत्म हो पर उनके घर में ईमानदार पैदा हो यह कोई नहंीं चाहता। कहंी ऐसा न हो कि हमारे इस प्रयास पर पालक नाराज न होकर अपने बच्चों को दूसरे स्कूल पर भेजना शुरु करें और आपकी प्रसिद्धि ही विद्यालय की बदनामी बन जाये।’’
             संचालक कुछ देर खामोश रहा और फिर बोला-‘‘तुम क्या चाहते हो मैं भी वहां न जाऊं?’
प्राचार्य ने कहा-‘‘आप जाईये, पर अपने स्कूल का परिचय न दें। आप सारे देश में ईमानदारी लाने की बात अवश्य करें पर उसे अपने विद्यालय से दूर रखें।’’
           संचालक खुश हो गया। प्राचार्य बाहर आया तो एक अन्य शिक्षक जिसने दूसरे कमरे में यह वार्तालाप सुना था उससे कहा-‘‘आपने मना किया तो अच्छा लगा। बेकार में हमारे हिस्से एक ऐसा काम आ जाता जिसमें हमें कुछ नहीं मिलता। यह संचालक वैसे ही छात्रों से फीस जमकर वसूल करता है पर हम शिक्षकों को देने के नाम पर इसकी हवा निकल जाती है। वैसे आपके दिमाग में ऐसा बोलने का विचार कैसे आया?’’
         प्राचार्य ने कहा-‘‘अपनी जरूरतें जब पूरी न हों तो ईमानदारी की बात करना भी जहर जैसा लगता है। वैसे फोकट में भ्रष्टाचार का विरोध करना मैं भी ठीक नहीं समझता। खासतौर से जब इस आंदोलन को चलाने वाले घोषित रूप से चंदा लेने वाले हों। हमें अगर कोई पैसा दे तो एक बार क्या अनेक बार ऐसे आंदोलन में जाते। फोकट में टांगें तोड़ना या भाषण देना तो तब और भी मुश्किल हो जब हमें यही अपनी मेहनत का पैसा कम मिलता है।’’

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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  Bharatdeep, Gwalior

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बिग बॉस एक शानदार कार्यक्रम-हास्य कविता

फंदेबाज ने कहा
‘‘दीपक बापू
यह बिग बॉस धारावाहिक
अश्लीलता फैला रहा है
आप इस पर कोई लिखो हास्य कविता,
जल जाये जैसे इसकी चिता,
वैसे भी आप इंटरनेट पर फ्लाप चल रहे हो,
बेमतलब के कवि हिट हो गये
यही सोच जल रहे हो,
शायद बिग बॉस पर कुछ जोरदार लिखने से
आपका नाम चल जाये,
कोई सफल रचना आपका नाम लेकर छाये।’’

दीपक बापू मुस्कराये
‘‘लगता है हमसे लिखवाना कहीं
फिक्स कर आये हो,
शालीनता का संदेश फैलाने के नाम पर
बिग बॉस को सफल बनाने की
शायद सुपारी लाये हो,
समाचार चैनलों में बिग बॉस का नाम छाया है,
ऐसा कोई दिन नहीं जब उसका नाम न आया है,
मगर पब्लिक में नहीं है उसका प्रचार,
चाहे डाले जा रहे अश्लील विचार,
लोगों को शालीनता से ज्यादा
अश्लीलता पसंद आती है,
पर्दे पर साड़ी पहने औरत से अधिक
बिकनी पहनी अभिनेत्री पसंद आती है,
समाचार चैनल तो
उस पर अश्लीलता और अभद्रता का
आरोप लगाकर
लोगों को वह देखने के लिये उकसाते हैं,
भले ही खुद को संस्कृति का रक्षक जताते हैं,
लगता है हमसे अश्लीलता का आरोप लगवाकर
उसे बौद्धिक वर्ग का प्रचार
दिलवाना चाहते हो,
इसलिये हमसे हास्य कविता लिखवाना चाहते हो,
मगर हम तो यही कहेंगे
बिग बॉस अत्यंत शालीनता और
भद्र व्यवहार करना सिखा रहा है,
नयी पीढ़ी को नया मार्ग दिखा रहा है,
मु्फ्त में उसे असंस्कृत कह कर
उसका प्रचार नहीं करेंगे,
हम तो उसे संस्कृत और ज्ञानबर्द्धक कहकर
लोगों में अरुचि का भाव भरेंगे,
वैसे यह कार्यक्रम अब हिट नहीं रहा,
बदतमीजी करने में ज्यादा फिट भी किसी ने नहीं कहा,
गाली गलौच करने वाला कोई
महान कलाकर शायद इसमें नहीं आया,
कपड़े उतारकर शानदार अभिनय करे
ऐसा भी कोई घरवाला नहीं छाया,
बदनाम नहीं हुआ
इसलिये तुम भी शायद नही देखते हो,
इसलिये हमसे इंटरनेट पर
हास्य कविता लिखवाने की बात
हमारी तरफ ही फैंकते हो,
जहां तक हमारे फ्लाप होने सवाल है
तुम्हारी सफलता के नुस्खे
हमें दे जाते हैं हास्य कविता का विषय
भले ही वह कभी हमने नहीं आजमाये।’’
————

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
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2011 in review वर्ष 2011 में इस पत्रिका का पाठ तथा पाठकों का विवरण

The WordPress.com stats helper monkeys prepared a 2011 annual report for this blog.

Here’s an excerpt:

Madison Square Garden can seat 20,000 people for a concert. This blog was viewed about 69,000 times in 2011. If it were a concert at Madison Square Garden, it would take about 3 sold-out performances for that many people to see it.

Click here to see the complete report.

श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान तथा श्रीकृष्ण के प्रति आस्था देश के लिये संजीवनी-हिन्दी लेख shri madbhagwat gita ka gyan aur bhagwan shri krishana ke prati aastha ka sawal-hindi lekh)

        श्रीमद्भागवत पर रूस के एक शहर में प्रतिबंध लगाने का विवाद हमारे देश में फिलहाल तो एक दो दिन चलकर समाप्त हो गया है। ऐसा लगता है कि इस पर सनसनी फैलाकर अधिक समय तक घसीटना शायद समाचार प्रायोजक रणनीतिकारों को अधिक लाभप्रद नहीं लगा होगा। संभव है समाचार माध्यमों में इस विवाद के प्रसारण से विज्ञापन समय अधिक बिताने के दूरगामी दुष्परिणामों को भय भी रहा होगा। आखिर सोवियत संघ कथित रूप से भारत का राजनीतिक मित्र कहा जाता है और भारत में प्रचलित समस्त विचाराधाराओं के शिखर पुरुष कहीं न कहीं मानसिक रूप से उसके प्रभाव में रहते हैं। प्रगतिशील हों या जनवादी या फिर दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी कहीं न कहीं आज भी यह अपेक्षा रखते हैं कि संकट में सोवियत संघ हमारे काम आ सकता है जैसे कि 1973 में पाक युद्ध के दौरान अमेरिकी दखल की संभावना के समय आया था। ऐसे में वहां श्रीमद्भागवत गीता पर प्रतिबंध लगाने जैसा विषय इतना संवेदनशील है कि भारतीय जनमानस में सोवियत संघ की मैत्री वाली छवि खराब हो सकती है इस भय ने विवाद के प्रचार को रोक लिया। वैसे भी बाज़ार तथा प्रचार के शिखर पुरुषों की उस मूल विचाराधारा के विपरीत है जिसके अनुरूप व्यवसायिक पेशेवर बुद्धिजीवियों को चलना होता है।
           हमारा तात्पर्य यही है कि प्रचार माध्यमों में जब कोई बहस होती है तो वह स्पष्टतः प्रायोजित होती है और पक्ष के साथ विपक्ष के तर्क सुनाने के लिये विभिन्न विचारधाराओं के विद्वान जनमानस के समक्ष प्रायोजित रूप से ही प्रस्तुत होते हैं। इसके अलावा आर्थिक, धार्मिक तथा सामाजिक संगठनों के प्रवक्ता इस बात का ध्यान रखते हैं कि जब किसी देश पर टिप्पणी करते समय उसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि अवश्य देखी जाये।
इस विवाद का संबंध धर्म की दृष्टि से प्रचारित हुआ। देखा जाये तो इसका अध्यात्मिक दर्शन से कोई संबंध नहीं है। हम जैसे चिंतक लोग अध्यात्म और धर्म का स्पष्ट रूप से विभाजन करते हैं। धर्म की बात करते समय केवल बाह्य पक्ष देखा जाता है जबकि अध्यात्म चर्चा करते हुए आंतरिक तत्व को भुलाना एक तरह से अज्ञानता है। जब हम कहते हैं कि ‘हम श्रीगीता का अपमान नहीं सहेंगे’, ‘भगवान श्रीकृष्ण का अपमान नहीं सहेंगे’, या ‘हिन्दू धर्म का अपमान नहीं होने देंगे’, तब स्पष्टतः हम बहिर्मुखी होते हैं। अंतर्मन की दृष्टि एकदम बंद हो जाती है।
            ऐसे में ज्ञानी खामोश रहते हैं। उनको पता है कि जिस गीता या श्रीकृष्ण को हम अपमानित अनुभव कर रहे हैं वह दरअसल एक भ्रम है। उसी श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह भक्त ज्ञानी है जो मान अपमान से परे है। हम एक बात तो यह पूछेंगे कि क्या तत्वज्ञान को अपमानित किया जा सकता है? दूसरी बात यह है कि हमने यह सोच कैसे लिया है कि हमारे श्रद्धेय श्रीकृष्ण तथा आदर्श श्रीमद्भागवत गीता का अपमान करने की किसी की औकात भी है? हम अपने ज्ञान की शक्ति को क्या नहीं जानते कि एक शहर या एक देश में प्रतिबंध लगने से आर्तनाद करने लगते हैं। इतना आर्तनाद कि हम प्रदर्शन कर भगवान श्रीकृष्ण और श्रीमद्भागवत गीता के लिये एक देश से याचना करने लगे। यह प्रदर्शन अपने देश में कर हम भले ही अपने आपको शक्तिशाली अनुभव करें पर सच यह है कि कहीं न कहीं हम सम्मान के याचक बन गये थे और ज्ञान कभी किसी को इस स्थिति में नहीं पहुंचाता। 
सम्मान और अपमान को बोझ उठाते योगी 
             इस विवाद में एक बहुत मज़ेदार घटना सामने आयी। भारत के एक बहुत बड़े धार्मिक गुरु हैं जिनको योग और ध्यान की शिक्षा के लिये बहुत ख्याति मिली है उन्होंने जनसमर्थन पाने के लिये यहां तक कह डाला कि ‘अगर रूस में श्रमद्भागवत गीता पर प्रतिबंध लगा तो मैं वहां से मिले दो सम्मान वापस कर दूंगा।’
ज्ञान के अहंकार की यह चरम परकाष्ठा है। योग और ध्यान करने वाले ज्ञानी ऐसे सम्मानों और अपमानो का बोझ नहीं ढोते। उनके बयान का सीधा मतलब यही था कि वह रूस में मिले सम्मानों का बोझ अभी तक ढो रहे हैं और अगर श्रीमद्भागवत गीता पर प्रतिबंध लगता है तो अपमान का बदला अपमान से लेंगे। इस तरह वह व्यवसायिक गुरु अपने शिष्यों के साथ ही आम जनमानस में एक धर्मभीरु होने के साथ स्वयं चेतनावान होने का जो संकेत भेज रहे थे वह श्रीमद्भागवत गीता के साधकों के लिये हास्यास्पद था। सच कहें तो प्रातः योगसाधना करने वालों के लिये हास्यासन करने के लिये यह एक रोचक विषय हो सकता है।
           देश के अनेक शहरों में प्रदर्शन हुए! दूरदर्शन पर अनेक गेरुऐ वस्त्र पहले साधु संत पेशेवर चर्चाकारों से जूझने के लिये आये। श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान दोहराया गया। समझ में नहीं आ रहा था कि संकट अगर कहां है-सोवियत संघ में कि भारत में। ऐसा लगता है कि हमारे देश के प्रचारकों के पास सनसनी फैलाने के लिये विषयों की कमी है या फिर वह केवल लोगों को आवेश में लाकर ही सफलता प्राप्त करने का मंत्र जानते हैं। ऐसे में धर्म अधिक अच्छे ढंग से काम कर सकता है। हमारे देश के लोग भी ऐसे हैं कि भले ही धर्म की पुस्तकों को न पढ़ते हों पर उसके सम्मान की बात करते हुए अत्यंत प्रसन्न होते हैं। अगर कोई विदेशी जोड़ा भारतीय पद्धति से विवाह करता है कि उसके खूब प्रचार मिलता है। ऐसे में समाचार माध्यम तो जानकारी देने से अधिक मनोरंजन करने में लगे हैं। जहां तक भगवान श्रीकृष्ण के प्रति श्रद्धा और श्रीमद्भागवत गीता के तत्वज्ञान के महत्व का प्रश्न है ज्ञानी लोग जानते हैं कि वह अक्षुण्ण रहना है।
                  इस विषय पर दीपक भारतदीप का चिंत्तन ब्लाग पर लिखा गया लेख अवश्य पढ़ें।
समाचार तो यह है कि श्रीमद्भागवत गीता पर प्रतिबंध लगाने के लिये रूस के एक शहर में की अदालत में याचिका दायर की गयी है। यहां इस समाचार को लेकर गीता के विषय में संशय उठ रहे हैं। जिस तरह भगवान श्रीराम के विभिन्न रूप हैं उसी तरह श्रीगीता ने भी अपने भक्तों के अनुरूप धारण कर लिये हैं। भगवान श्रीराम के स्वरूप का प्रश्न है तो अनेक प्रचलित हैं-बाल्मीकी के राम, दशरथ पुत्र राम, कौशल्या के राम, तुलसी के राम-उनमें सबसे श्रेष्ठ रूप माना गया है घट घट में बसे राम! महाभारत युद्ध के समय श्रीकृष्ण ने अपने सखा अर्जुन को जो तत्वज्ञान दिया था वह श्रीमद्भागतगीता के रूप में स्मरण किया जाता है। मूलतः यह वेदव्यास रचित महाभारत ग्रंथ का एक महत्वपूर्ण भाग है। अगर कहें अगर श्रीमद्भागत गीता वाला अंश नहीं होता तो शायद ही कोई महाभारत काल को याद करता। यह भी संभव है कि अगर यह अंश न होता तो भगवान श्रीकृष्ण ने भी वह प्रतिष्ठा अर्जित नहीं की होती जो आज तक अक्षुण्ण बनी हुई है। हम इससे भी आगे जाकर यह कहें कि आज हमारे देश की विश्व में अध्यात्म गुरु की जो छवि है वह श्रीमद्भागवत गीता के कारण ही है तो गलत न होगा। गीता के तत्वज्ञान के रूप में कोई बदलाव नहीं आया पर जिन भगवत्भक्तों ने इसकी साधना से कृपा पायी उन्होंने अपना जीवन इसके प्रचार में इस सीमा तक समर्पित कर दिया कि उनके शब्दों के संचय समूह भी गीतातुल्य सम्मानीय बन गये। उनके साथ उन महापुरुषों के नाम भी जुड़े। ऐसे में अनेक महापुरुषों के नाम से गीता का नाम जुड़ा है। उन महापुरुषों के शब्द संचय समूहों में श्रीमद्भागवत गीता शीर्षक सर्वोपरि है पर उपशीर्षक में कहीं न कहीं उनके स्वयं या आश्रम के नाम जुड़े हुए हैं। नहीं भी जुड़े हैं तो प्रतीक चिन्ह उनकी प्रथक गीता होने की पहचान देते हैं।
               दस बरस पूर्व जब हमें योगसाधक के रूप में ज्ञान पाने की जिज्ञासा जागी तो हमने गोरखपुर प्रेस की अपने घर में रखी श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन प्रारंभ किया। उसमें हर पाठ के साथ उसके अध्ययन की महत्ता तथा पुण्य का प्रभाव भी प्रकाशित था। हम तो श्रद्धा के साथ पढ़ते थे। एक दिन हमें एक ब्राह्मण मित्र मिला। वह हमारी तरह ही साहित्यक रुचि वाला है। अध्यात्म में उसकी रुचि शायद इतनी नहंी है पर पारिवारिक पृष्ठभूमि के नाते उसका ज्ञान की कमी भीनहीं थी। उसे हमने अपनी गीता साधना की चर्चा की तो उसने हमसे कहा‘भाई साहब, आप श्रीमद्भागवत गीता का वही प्रकाशन पढ़ें जिसमें केवल श्लोकों के अनुवाद हों कि साथ में महात्म्य हो। उसमें उसके अध्ययन का महत्व आदि नहीं बताया गया हो। तभी आप समझ पायेंगे वरना आप दूसरी तरह की कहानियों में अपनी ऊर्जा नष्ट करेंगें।’’
            हम हैरान रह गये। बात यह थी कि हम महत्त्ता बताने वाली जिन कहानियों को साथ में पढ़ रहे थे उसमें कोई एक भी पाठ नहीं था जिसमें ब्राह्मण पात्र न हो। ऐसे में उस मित्र की बात थोड़ी चौंकाने वाली लगी मगर जब हमने नयी श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करना प्रारंभ किया तो लगा कि वास्तव में मित्र के हृदय से यह बात भगवत्कृपा की उपज थी। उस दिन हमने अपने मित्र से जब इस बात की चर्चा करते हुए श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों की वर्तमान संदर्भ में व्याख्यान प्रस्तुत किया तो उसने जो कहा वह लिखना अपने मुंह मियां मिट्ठु बनना होगा।
              नियमित योग क्रिया से निवृत होने के बाद गीता की साधना करना हमारे दिन का सबसे स्वर्णिम समय होता है। अब यहां हम श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों की चर्चा करने नहीं जा रहे पर जो लिख रहे हैं वह कहीं न कहीं उनसे प्रभावित है।
           इस्कॉन नाम की एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था है जो भगवान श्रीकृष्ण के संदेशों का प्रचार करती है। उसके आश्रमों में हमारा जाना हुआ है। हम उनमें कोई दोष नहीं देखते। देखने वाले देखते भी हैं। हम देखते हैं सुनते हैं पर लिप्त नहीं होते। सुना देख और भूल गये। उनके संस्थान से प्रकाशित श्रीमद्भागवत का एक संस्करण हमारे पास भी है। इसका अनुवाद विश्व के अनेक भाषाओं के इसलिये हुआ है क्योंकि इस्कॉन ने अनेक देशों में अपना स्थान बनाया है। वैसे भगवान श्रीकृष्ण, भगवान श्रीराम तथा भगवान शिवजी के अनेक भक्तों ने विश्व में उनका प्रचार किया है पर संगठित रूप से यह काम इस्कॉन ने किया है उतना शायद ही कोई कर सका हो। अनेक भारतीय संतों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है पर इससे भारतीय अध्यात्म का प्रचार कम उनकी छवि अधिक बनी है। इस्कॉन की जो कार्यशैली हमने देखी है उसमें दोष हम नहीं देखते पर इतना तय है कि श्रीमद्भागवत गीता के प्रचार में उनकी भूमिका हो सकती है वह उसमें वर्णित तत्वज्ञान के दर्शन उसमें नहीं होते। इस्कॉन के संस्थापक स्वामी प्रभुपाद की कृपा से श्रीमद्भागवत यथारूप प्रस्तुत की गयी है पर उसमें व्याख्या ज्यादा है। हमने नहीं पढ़ी पर उसमें कुछ आपत्तिजनक हो सकता है इस पर यकीन नहीं है। अनुवाद करने या पढ़ने वालों की समझ का फेर हो सकता है। इस फेर में कोई नाराज हो गया तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। जब आत्मा जीवन धारण करता है तो वह सत्य लगता है पर होता तो झूठ है। देहधारी जीव विवादास्पद हो जाते हैं पर आत्मा निर्विवाद है।  यही स्थिति तत्वज्ञान की है। वह सूक्ष्म है जब उसे व्याख्या देकर व्यापक बनाया जाता है तो वह देहधारी जीव की तरह विवादस्पद हो जाता है। यह समझ का फेर अपने देश में ही बहुत सारे गीता सिद्धों को भी है कि श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान अत्यंत गूढ़ है जबकि एक बार अगर श्रीमद्भागवत हृदय में आत्मसात होना प्रारंभ हो तो एक जीवन के प्रति स्वयमेव दृष्टिकोण अन्य लोगों से प्रथक हो जाता है। यह अलग बात है कि कथित गीता सिद्ध इसे रहस्यमय कहकर स्वयं को ज्ञानी साबित करते हैं जैसे उनको समझ में सब कुछ आ गया है। कुछ लोग इस बात से नाराज हो सकते हैं कि मगर गीता सिद्ध अपना ज्ञान दिखाने उन लोगों के पास नहीं जाते जिनकी उसमें रुचि नहीं है। न ही सार्वजनिक रूप से श्रीमद्भागवत गीता पर प्रवचन करते हैं। गीता सिद्ध संगठन बनाकर नहीं चलते क्योंकि वह हंस होते हैं। संगठन तो कौए बनाकर चलते हैं।
               अब तो प्रश्न हैं एक तो क्या इस्कॉन की श्रीमद्भागवत पर प्रतिबंध लगाने की बात है या मूल रूप से गोरखपुर प्रेस जैसे प्रकाशन से जुड़ी श्रीमद्भागवत गीता को भी उसमें शामिल किया गया है। उससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि क्या श्रीमद्भागवत गीता के शब्द उच्चारण पर ही प्रतिबंध लगाने का विचार हो रहा है या उसके श्लोकों के स्थानीय भाषा में अनुवाद पर भी रोक लगेगी। एक रूसी नेता ने भारत में इस विषय पर हो रहे प्रदर्शन पर कहा कि श्रीमद्भागवत गीता का प्रवेश हमारे देश में दो सौ वर्ष पहले ही हो गया था। इससे तो लगता है कि रूस में इसके इतने अनुवाद हो चुके होंगे कि उनको रोकना संभव नहीं होगा।
         जिस तरह का इसमें तत्वज्ञान है और आधुनिक विज्ञान उसके सामने फीका है उसे देखकर तो यह लगता है कि इसका प्रचार वहां स्वयमेव बढ़ेगा। इस विवाद की भारत में चर्चा करने का मतलब इसलिये भी नहीं है क्योंकि यह तत्वज्ञान है इसे कोई नहीं बदल सकता। जहां तक हम जैसे आम गीता साधकों की भावनाओं के आहत होने का प्रश्न है तो यह एक भुलावा है। यह प्रचार माध्यमों के लिये समय पास करने के लिये अच्छा विषय बन गया है।
           हमारा मानना है कि श्रीमद्भावगत गीता में मनोरंजन नहीं है। जिसकी रुचि नहीं है उसे अहंकारवश गीता का ज्ञान देना भी तामस बुद्धि का परिचायक है। जिसकी भगवान श्रीकृष्ण में भक्ति नहीं है उसके सामने तो इसका नाम लेना भी निरर्थक है। अगर कोई यह सोचकर कि श्रीमद्भागवत गीता से ज्ञान मिल जाये ताकि लोगों के सामने अपने ज्ञानवान होने का प्रदर्शन करूं और वह इसे पढ़ने लगे तो जल्दी बोर हो जायेगा। संभव है कि वह अर्थ रटकर उसे सुनाने लगे पर इसका आशय यह कतई नहीं कि वह ज्ञानी है। सच्चे गीता साधक श्रीमद्भागवत गीता शब्द सुनकर न तो भावविभोर होते हैं न उसकी निंदा सुनकर विचलित होते हैं। उनके लिये यह विवाद एक हल्की मुस्कराहट लाने से अधिक प्रभाव नहीं रखता। मान अपमान से परे होने के गुण का महत्व आखिरी श्रीगीता में ही बताया गया है। ऐसी श्रीमद्भागवत गीता और उसके सृजनकर्ता भगवान श्रीकृष्ण का कोई अपमान भी कर सकता है या किसी में इतनी औकात है यह गीता सिद्ध नहीं मानते। ऐसा करने वालों का जो हश्र होगा उसकी कल्पना वही कर सकते हैं जो तत्वज्ञानी हैं।
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
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