चाणक्य संदेश-दूसरे की उन्नति देखकर प्रसन्न होने वाले साधु होते हैं (sadhu svbhav-chankya niti

हस्ती अंकुशमात्रेण वाजी हस्तेन ताडयते।
श्रृङगी लगुडहस्तेन खङगहस्तेन दुर्जनः।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस तरह अंकुश से हाथी तथा चाबुक से घोड़ा, बैल तथा अन्य पशु नियंत्रित किये जाते हैं वैसे ही दुष्ट से निपटने के लिये खड्ग हाथ में लेना ही पड़ता है।
तुष्यन्ति भोजने विप्रा मयूरा धनगर्जिते।
साधवः परसम्पतिौ खलः परविपत्तिषुः।।
हिंदी में भावार्थ-
विद्वान अच्छा भोजन, मेघों की गर्जना से मोर तथा साधु लोग दूसरों की संपत्ति देखकर प्रसन्न होते हैं वैसे ही दुष्ट लोग दूसरों को संकट में फंसा देखकर हंसते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में भांति भांति प्रकार के लोग हैं। जो ज्ञानी और विद्वान है उनको रहने, खाने,पीने और पहनने के लिये अच्छी सुविधा मिल जाये तो वह संतुष्ट हो जाते हैं। जो सच्चे साधु और सज्जन हैं वह दूसरों की भौतिक उपलब्धियों देखकर प्रसन्न होते हैं क्योंकि उनकी मान्यता होती है कि आसपास के लोग प्रसन्न होंगे तो उनके स्वयं के पास अच्छा वातावरण रहेगा और वह शांति से रह सकेंगे। इसके विपरीत कुछ लोग दुष्ट प्रवृत्ति के भी होते हैं जो स्वयं तो विपत्ति में पड़े रहते हैं पर उनका खेद तब कम हो जाता है जब कोई दूसरा भी विपत्ति मेें पड़ता है। ऐसे लोग अपने दुःख से अधिक दूसरे के सुख से अधिक दुःखी होती हैं। इसके अलावा अपने सुःख से अधिक दूसरे का दुःख उनको अधिक प्रसन्न करता है।
वैसे तो जीवन में हिंसा कभी नहीं करना चाहिये क्योंकि फिर प्रतिहिंसा का सामना करने पर स्वयं को भी कष्ट उठाना पड़ा सकता है, पर इस संसार में कुछ ऐसे दुष्ट लोग भी हैं जिनको कितना भी समझाया जाये वह दैहिक आक्रमण से बाज नहीं आते। उनसे शांति और अहिंसा की अपील निरर्थक साबित होती है। ऐसे लोगों से मुकाबला करने के लिये अपने अस्त्रों शस्त्रों तथा अन्य साधनों उपयोग करने में कोई झिझक नहीं करना चाहिये। ऐसे लोगों के लिये धर्म और ज्ञान एक निरर्थक वस्तु हैं। देहाभिमान से ग्रस्त ऐसे लोगों के विरुद्ध लड़ना पड़े तो संकोच त्याग देना चाहिए।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

पहचान के लिए परेशान पूरा ज़माना-हिन्दी चिंतन और कविता (trouble of identity-hindi article and poem)

प्राकृतिक का नियम है परिवर्तन! दिन हुआ है तो रात भी होगी। सूरज उगा है तो जरूर डूबेगा। धूप है तो अंधेरा भी होगा। यह तो प्रतिदिन होने वाले नियम हैं इसलिये दिखाई देते हैं और इनमें किसी प्रकार का परिवर्तन करने की शक्ति हमें अपने अंदर अनुभव नहीं करते इसलिये कोई दावा नहीं करते। मगर परिवर्तनशील प्रकृत्ति के अन्य भी बहुत सारे नियम हैं जो हमें दिखाई नहीं देते। कई जगह छहः महीने का दिन और रात तो कई जगह दशकों का दिन और रात होता है। केवल समय और दिन ही परिवर्तन शील नहीं है बल्कि प्रकृत्ति का स्वरूप भी परिवर्तनशील है। अनेक प्रकार के जीव यहां बने और मिट गये। डायनासोर की चर्चा तो हमने सुनी होगी जिनके बारे में कहा जाता है कि आसमान से टपके किसी कहर की वजह से वह नष्ट हो गये।
इस पृथ्वी का सच कोई नहीं जानता। सभी अनुमान से कहते हैंे कि इस तरह है या उस तरह है। कहने का तात्पर्य यह है कि यहां किसी वस्तु, व्यक्ति, खनिज, अन्न का जो स्वरूप आज है वह कल कुछ दूसरा हो सकता है और आज से पहले कुछ दूसरा रहा होगा। अलबत्ता जीवन निर्माण की प्रक्रिया में कोई परिवर्तन नहीं आता दिखता पर उसके दृश्यव्य बाह्य रूप में परिवर्तन होता है और होता रहेगा।
भाषा, समाज, जाति, तथा अन्य आधारों पर बने व्यक्ति समूहों की यही हश्र होना है इसे कोई रोक नहीं सकता। मनुष्य प्रकृत्ति का दोहन अपनी शक्ति के अनुसार अधिक से अधिक कर सकता है पर उस पर नियंत्रण कभी नही कर सकता। ऐसे में कुछ लोगा यह दावा करते हैं कि वह भाषा, जाति, धर्म, और वर्ण के आधार पर बने अपने समूहों की पहचान बरकरार रखेंगे।
अगर उनसे पूछे कि‘क्यों?’
इसके बिना इस धरा का जीवन नष्ट हो जायेगा। अगर अपनी पहचान नहीं बचाकर रखी तो दूसरी पहचान वाले हमें नष्ट कर देंगे। यह पहचान हमारी अस्मिता है? आदि आदि प्रकार के जवाब।
भला यह कैसे संभव है जो समाज प्राकृतिक परिवर्तनों से बने हैं वह उन्हीं की वजह से नष्ट होने से बच जायें? मगर दावा करने वाले करते हैं। मनुष्य के मन में भावनायें होती हैं और वही उसका संचालन करती हैं। उनका दोहन अपने लाभ के लिये करने वाले व्यापारी उसमें भय, आशंकायें और स्वप्नों का एक जाल रचते हैं। वह ऐसे असंभव काम को अपने हाथों से करने का दावा करते हैं जो उनके बस का है ही नहीं। परिवर्तन को रोकना कठिन है। सौ बरस में मनुष्य का और दो सौ बरस में परिवार का अस्त्तिव मिटने के साथ अपनी पहचान खोता है तो हजार साल में समूह भी अपना अस्तित्व नहीं बचा सकते हैं। जाति, भाषा, धर्म तथा अन्य आधारों पर बने समूह कोई स्थाई पिंजरा नहीं है जिसमें आकर भगवान का हर जीवन हमेशा फंसता रहे। फिर सवाल यह है कि अपनी पहचान किसलिये बनाये रखना चाहिये? अरे, अपना जीवन आदमी शांति और भक्ति के साथ जिये तो उसे फिर पहचान की क्या जरूरत है? ऐसे में पहचान का ढोंग न करें चाहिये न उसमें फंसे।इस पर प्रस्तुत हैं काव्यात्मक अभिव्यक्ति-

धरती पर उगे हैं इंसान
पर वह उसमें गड़े मुर्दों में
अपनी पहचान खोजते हैं।
अपने लहू से सींचे चमन का
मजा लेने की भला कैसे सोचें
पूरी जिंदगी अपनी पहचान के
संकट से जूझते
उनके पसीने का मजा
जिंदगी के दलाल भोगते हैं।।
————-
उसने नारा लगाया कि
‘आओ मेरे पीछे
मैं तुम्हें अपनी पहचान बताता हूं
कैसे बचाओ उसे
इसका रास्ता भी बताऊंगा।’
लोग बिना सोचे समझे
चल पड़े उसके पीछे
पर पहचान नहीं मिली
रास्ते पर रखे पत्थरों का
इतिहास सुनाते हुए वह चलता रहा
भीड़ का कारवां भी उसके पीछे था
उसने सौदागरों के इतिहास में
अपना नाम दर्ज कर लिया
पर पहचान का पता किसी को न दिया
कभी जाति की
तो कभी धर्म की
कभी भाषा की चादर बिछाता रहा
पहचान का प्रमाण दिखाता रहा
बस कहता रहा जिंदगी भर
समूह की एकता की बात
जब थक गया तो कहने लगा कि
‘चलते रहो मेरे साथ
आने वाली पीढ़ियों को भी
इसी पहचान की राह चलना है
इसी में जीना और मरना है
मेरी बात मानना बंद किया तो
फिर भूत की तरह सताऊंगा।’

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

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भावनाओं का व्यापर-हिन्दी आलेख और व्यंग्य कविताएँ

जिन हिंन्दी के महानुभावों ने रसों की पहचान दी है वह भी खूब रहे होंगे। अगर वह इन रसों की पहचान नहीं कराते तो शायद हिन्दी वाले कई ऐसी चीजों को नहीं समझ पाते जिनको बाजार के सौदागर बेचने के लिये सजाते हैं। वात्सल्य, श्रृंगार, वीभत्स, हास्य, भक्ति, करुण तथा वीर रस की चाश्नी में डुबोकर फिल्में बनायी जाती थीं। फिर टीवी चैनल भी बनने लगे। अधिकतर धारावाहिक तथा फिल्मों की कथा पटकथा में सभी रसों का समावेश किया जाता है। मगर अब समाचारों के प्रसारण में भी इन रसों का उपयोग इस तरह होने लगा है कि उनको समझना कठिन है। कभी कभी तो यह समझ में नहीं आता है कि वीर रस बेचा जा रहा है कि करुणता का भाव पैदा किया जा रहा है या फिर देशभक्ति का प्रदर्शन हो रहा है।
इस देश में आतंकवाद की अनेक घटनायें हो चुकी हैं। पिछले साल 26 नवंबर को मुंबई पर हमला किया गया था। सैंकड़ों बेकसूरों की जान गयी। इससे पहले भी अनेक हमले हो चुके हैं और उनमें हजारों बेकसूर चेतना गंवा चुके हैं। मगर मुंबई हमले की बरसी मनाने में प्रचार तंत्र जुटा हुआ है। कहते हैं कि मुंबई पर हुआ हमला पूरे देश पर हमला था तब बाकी जगह हुआ हमला किस पर माना जाये? जयपुर, दिल्ली और बनारस भी इस देश में आते हैं। फिर केवल मुंबई हादसे की बरसी क्यो मनायी जा रही है? जवाब सीधा है कि बाकी शहरों में सहानुभूति के नाम पर पैसे खर्च करने वाले अधिक संभवतः न मिलें। मुंबई में फिल्म बनती है तो टीवी चैनलों के धारावाहिक का भी निर्माण होता है। क्रिकेट का भी वह बड़ा केंद्र है। सच तो यह है कि दिल्ली, बनारस और जयपुर किसी के सपनों में नहीं बसते जितना मुंबई। इसलिये उसके नाम पर मुंबई के भावुक लोगों के साथ बाहर के लोग भी पैसे खर्च कर सकते हैं। सो बाजार तैयार है!
वैसे संगठित प्रचार माध्यम-टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकायें-यह सवाल नहीं उठायेंगे कि क्या बाजार का आतंकवाद से किसी तरह का क्या कोई अप्रत्यक्ष संबंध है जो अमेरिका की तर्ज पर यहां भी मोमबतियां जलाने के साथ एस.एम.एस. संदेशों की तैयारी हो रही है। अलबत्ता अंतर्जाल पर अनेक वेबसाईटों और ब्लाग पर इस तरह के सवाल उठने लगे हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि बाजार का अब वैश्वीकरण हो गया है इसलिये उसके लिये देश की कोई सीमा तो हो नहीं सकती पर वह भक्ति रस बेचने के लिये देशभक्ति का शगुफा छोड़ने से बाज नहीं आयेगा। जहां तक संवेदनाओं के मानवीय गुण होने का सवाल है तो क्या बाजार इस बात की गारंटी दे रहा है कि वह मुफ्त में मोमबत्त्यिां बंटवायेगा या एस. एम. एस. करवायेगा। यकीनन नहीं!
एक बाद दूसरी भी है कि इधर मुंबई के हमलावारों के बारे में अनेक जानकारी इन्हीं प्रचार माध्यमों में छपी हैं। योजनाकर्ताओं के मुंबईया फिल्म हस्तियों से संबंधों की बात तो सभी जानते हैं। इतना ही नहीं उनके भारतीय बैंकों में खातों की भी चर्चा होती है। पहले भी अनेक आतंकवादियों के भारत की कंपनियों में विनिवेश की चर्चा होती रही है। फिल्मों में भी ऐसे अपराधियों का धन लगने की बात इन्हीं प्रचार माध्यमों में चलती रही है जो आतंकवाद को प्रायोजित करते हैं। कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि इस देश के पैसे से ही आतंकवादी अपना तंत्र चला रहे हैं। एक बात तय रही है कि यह अपराधी या आतंकवादी कहीं पैसा लगाते हैं तो फिर चुप नहीं बैठते होंगे बल्कि उन संगठनों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष अपना नियंत्रण रखते होंगे जिनमें उनका पैसा लगा है। मतलब सीधा है कि बाजार के कारनामों में में उनकी अप्रत्यक्ष भूमिका हो सकती है पर शायद बाजार के प्रबंधक इसका आभास नहीं कर पाते। सच तो हम नहीं जानते पर इधर उधर देखी सुनी खबरों से यह आभास किसी को भी हो सकता है। ऐसे में आतंकवाद की घटनाओं में बाजार का रवैया उस हर आम आदमी को सोचने को मजबूर कर सकता है जो फालतु चिंतन में लगे रहते हैं। वैसे पता नहीं आतंकवादी घटनाओं को लोग सामान्य अपराध शास्त्र से पृथक होकर क्यों देखते हैं क्योंकि उसका एक ही सिद्धांत है कि जड़ (धन), जोरु (स्त्री) तथा जमीन के लिये ही अपराध होता है। आतंकवादी घटनाओं के बाद अगर यह देखा जाये कि किसको क्या फायदा हुआ है तो फिर संभव है कि अनेक प्रकार के ऐसे समूहों पर संदेह जाये जिनका ऐसी घटनाओं से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई संबंध नहीं होता? हालांकि इस विचार से भाषा, जाति, तथा धर्म तथा क्षेत्र के नाम पर होने वाली आतंकवादी घटनाओं की विवेचना भी भटक सकती है क्योंकि बाजार में सभी सौदागर ऐसे नहीं कि वह आतंकवाद को धन से प्रश्रय दें अलबत्ता वह लोगों में करुण रस को दोहने इसलिये करते हैं क्योंकि यह उनका काम है? बहरहाल प्रस्तुत है इस पर कुछ काव्यात्मक पंक्तियां-
सज रहा है
देश का बाजार रस से।
कुछ देर आंसु बहाना
दिल में हो या न हो
पर संवेदना बाहर जरूर बरसे।।
———
कभी कभी त्यौहार पर
जश्न की होती थी तैयारी।
अब विलाप पर भी सजने लगा है बाजार
सभी ने भर ली है जेब
उसे करुण रस में बहाकर निकालने की
आयी अब सौदागरों की बारी।।
————-
तारीखों में इतने भयंकर मंजर देखे हैं
कि दर्द का कुंआ सूख गया है।
इतना खून बहा देख है इन आंखों ने कि
आंसुओं की नयी धारा बहाये
वह हिमालय अब नहीं रहा,
देशभक्ति के जज़्बात
हर रोज दिखाओ
यह भी किसने कहा,
जो दुनियां छोड़ गये
उनकी क्या चिंता करना
जिंदा लोगों का भी हो गया रोज मरना
ऐ सौदागरों,
करुण रस में मत डुबोना पूरा यह ज़माना,
इस दिल को तुमने ही आदत डाली है
और अधिक प्यार मांगने की
क्योंकि तुम्हें था अधिक कमाना,
अब हालत यह है इस दिल की
प्यार क्या मांगेगा
नफरत करने से भी रूठ गया है।।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

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मनोरंजन की राह-हिंदी व्यंग्य कविता (manoranjan ki rah-hindi satire)

दुनियां की तबाही देखने के लिये
इंसान का दिल क्यों मचलता है
हमारी आंखों के सामने ही सब
खत्म हो जाये
फिर कोई यहां जिंदा न रह पाये
यही सोचकर उसका दिल बहलता है।
हम न होंगे पर यह दुनियां रहेगी
यही सोच उसका दिमाग दहलता है।
इसलिये ही दुनियां के खत्म होने की
खबर पर पूरा जमाना
मनोरंजन की राह पर टहलता है।

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जख्म और मरहम-व्यंग्य कविता (zakhma aur marham-vyangya kavita

 हमने कहा था

‘जख्म पर मरहम लगा दो’

उन्होंने नमक छिड़क दिया।

पीड़ा से हम कराहते रहे

उन्होंने कहा

‘कुछ जोर से कराहो

ताकि हम मरहम लगाकर

जमाने को बता सकें कि

हमने किसी का दर्द कम किया’।

————

नजारे तो इस दुनियां में बहुत हैं

मगर लोगों को बस दंगल ही भाता ।

अपने मंगल की बजाय

दूसरे के अमंगल पर मजा आता।

जिंदगी खेल है नजरिये का

जैसी नजर

वैसा ही जमाना हो जाता।

तारीफ के लिये कौन करे

इंसानों का भला

शिकायत के लिये

मजबूर करने वालों का नाम

अखबार की सुर्खियों में ही नजर आता।

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ईमानदारी में गज़ब कैसा-हिन्दी हास्य व्यंग्य (imandari men gazab- hindi vyangya)

सप्ताह में उस दुकान से एक बार तो बेकरी का सामान जरूर खरीदते हैं। ऐसा बरसों से चल रहा है। वह दुकानदार अच्छी तरह जान गया है। उसके कुछ पुराने कर्मचारी भी अब देखते ही सामान पूछना शुरु कर देते हैं भले ही दूसरे ग्राहक खड़े हों। हालांकि उस दुकानदार से हमारी कोई खास आत्मीयता नहीं है, यहां तक कि उसके साथ अभिवादन तक नहीं होता। हम दुकान पर पहुंचते ही सीधे सामान मांगना शुरु कर देते हैं।
उस दिन 145 रुपये का सामान लिया और उसे पांच सौ का नोट दिया। उस दुकानदार ने उसे अच्छी तरह रौशनी में देखा और फिर उसने अपनी दराज में रखा और बाकी पैसे वापस करने के लिये नोट गिनने लगा। इसी दौरान वह हमसे कहता रहा कि ‘आजकल नोट नकली आ रहे हैं इसलिये ध्यान से देखना पड़ता है।’ आदि आदि।
हम केवल मुस्कराये। उसने नोट गिनकर हमें दिये। हम उसे बिना गिने ही अपनी जेब में रखने लगे यह सोचकर कि इतना बड़ा सौदा नहीं है कि वह रकम कम देगा-ज्यादा देगा इस पर तो विचार ही नहीं किया? सामान का पैकेट और रुपये हाथ में लेकर अपने स्कूटर के पास पहुंचे और सामान रखकर नोट पर्स में रखने लगे पर लगा कि कुछ गड़बड़ है। नोट अधिक लग रहे थे। हमने गिने तो उसमें सौ रुपया अधिक था।
हमने बिना कुछ सोचे बिचारे वह नोट उसके पास जाकर बढ़ाया और कहा‘-भई, आपने यह सौ का नोट अधिक दे दिया।’
उसे हैरानी हुई और हमसे नोट अपने हाथ में लेते हुए बोला-‘हो सकता है कि बात करते हुए हमसे नोट गिनने में गलती हो गयी। वैसे आप पहले आदमी हैं जो नोट वापस कर रहे हैं। ऐसे कई बार गलती हमें बाद में याद आती है पर कोई भी आदमी हमें नोट वापस नहीं करता। अपने पास रखकर सभी पचा जाते हैं। आपकी ईमानदारी अच्छी लगी।’
हमने हंसते हुए कहा-‘सच तो यह है कि हम नोट गिन नहीं रहे थे। पता नहीं क्या सोचकर गिने। यकीन करो कि अगर यह एक बार पर्स के हवाले होते तो फिर हमें भी वापस करने की याद नहीं आनी थी। वैसे आपके साथ जिन लोगों ने जानबूझकर ऐसा किया उनको आपका पैसा पच ही गया आप यह कैसे कह सकते हैं?’
वह दुकानदार हमें घूरकर देखने लगा और बोला-‘हां, यह तो नहीं सकता कि वह पचा पाते हैं कि नहीं।’
हमने उससे कहा-‘वह आपका दिया अधिक पैसा रख लेते हैं पर कितनी देर? यह तो माया चलती फिरती है इसलिये वह रुपया आखिर वह फिर कहीं जाना है। यह हमारी ईमानदारी का प्रमाण नहीं बल्कि डर का प्रमाण है। एक तो यह रुपया अधिक देर हमारे पास वैसे ही नहीं रहेगा। दूसरा पचेगा भी नहीं! इसलिये वापस किया।’
अधिक देर बात करना ठीक नहीं था। हमने सौदा रखा और वहां से चले आये। उसके बाद भी अनेक बार उसकी दुकान पर गये पर कभी इसकी चर्चा नहीं की।
उस दिन दुकान पर पहुंचे तो उसने हमसे पूछा-‘आपको मैंने बैग दिया है कि नहीं।’
मुझे आश्चर्य हुआ और हमने उससे कहा-‘नहीं, आपने मुझे कोई बैग नहीं दिया।’
उसने अपने पीछे हाथ किया और एक हैंडबैग हमारी तरफ बढ़ाते हुए कहा-‘मैंने पूछने की गुस्ताखी इसलिये की क्योंकि यह केवल कुछ खास ग्राहकों को दिवाली का गिफ्ट दिया था। मुझे याद नहीं आ रहा था कि आपको दिया कि नहीं। हर साल हम कुछ न कुछ ग्राहकों को उपहार देते हैं।
मैंने वह हैंडबैग अपने हाथ में लिया। उसके यहां के एक कर्मचारी ने मुझसे कहा कि ‘सेठ जी बहुत दिनों से आपको यह उपहार देने के लिये कह रहे थे, मैं ही भूल जाता था। आज सेठ जी खुद पूछा तब मुझे भी याद आया।’
उस समय भी वहां पर पांच लोग दूसरे खड़े थे पर उसने बिना उनका विचार करते हुए मुझे हैंडबैग दिया। इतने बरसों से उसने दूसरे खास ग्राहकों को गिफ्ट दिया पर हमें खास नहीं माना। उसके खास तो उसके थोक व्यापारी रहे होंगे। खेरिज ग्राहकों में उसने किसी दूसरे को खास माना होगा यह भी नहीं लगता। बहरहाल उस सौ रुपये की वापसी ने उसकी नजरों में खास बना दिया। उसकी नजर में हम ईमानदार हैं पर हमें खुद को नहीं लगता। वैसे पहले भी कई बार अनेक दुकानदारों को अधिक पैसे हमने वापस लौटाये हैं। वह लोग कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। किस बात की! ईमानदारी की! अरे भई, हमने कई बरस पहले एक बार अपनी जिंदगी में अजमाया है। रास्ते से बीस का नोट मिला था उसे रख लिया। मगर उसके एक दिन बाद ही हमारी साइकिल को एक टूसीटर वाले ने टक्कर मारकर तोड़ दिया। हम बच गये यह गनीमत थी पर उस साइकिल को बनवाने में सौ रुपये लग गये। बस तब से तय कर लिया कि ऐसे पैसे को हाथ भी नहीं लगायेंगे।
यह हमारा डर है जो जबरदस्ती ईमानदार बनाये दे रहा है। कोई जब यह कहता है तो हम उसे समझाने लग जाते हैं कि ‘भई, ऐसा नहीं है। दरअसल हमारा हाजमा खराब है कि ऐसा पैसा हमें पचता नहीं। यह एक रोग है जिसका इलाज किसी के पास नहीं है।’
पहले शराब पीते थे। अब छोड़ दी। जो अब हमारे सामने पीते हैं और हमें परे देखकर कहते हैं कि‘अच्छा हुआ तुमने छोड़ दी। वाकई क्या गजब की तुम्हारी संकल्प शक्ति है।’
हम उनको समझाते हैं कि‘नहीं यार, इससे हमें उच्च रक्तचाप हो गया था। डाक्टर से कहा छोड़ दो नहीं तो मुश्किल में आ जाओगे यह संकल्प शक्ति नहीं हमारा डर है जो हमें पीने नहीं देता। हम तो उन लोगों के कायल हैं जो शराब पीकर पचा जाते हैं।’
वह पीने वाले कहते हैं कि ‘नहीं यार, तमाम तरह की व्याधियां हमारे शरीर में हैं तुम क्या जानो? मगर क्या करें पीना नहीं छूटता।’
उस दिन पार्क से योग साधना कर वापस आ रहे थे तो एक ऐसे सज्जन हमें मिले जो योग साधना के फायदे हमें सुनाकर उस शिविर में ले गये जिसमें योग साधना सिखाई जा रही थी। इस बात को सात वर्ष होने के आ गये। उन्होंने कुल जमा सात दिन भी वहां हाजिरी नहीं दी पर हमें याद है वह किसी तरह हमें वहां लगे और फिर वह शिविर छोड़ दिया । मगर हम डटे रहे। वह कहने लगे-‘यार गजब करते हो? अनवरत छह साल से ऊपर हो गया पर तुम्हारा क्रम भंग नहीं हुआ। मान गये तुम्हारे दृढ़ निश्चय को!’
हमने उसको भी समझाया-‘यार, यह बात नहीं है। इसके बिना हम अब चल ही नहीं सकते। जब किसी दिन किसी मरीज को अस्पताल से देखकर आते हैं उसके अगले दिन ही अपनी योगसाधना की अवधि और आसन बढ़ा देते हैं क्योंकि हमें डाक्टरों से बहुत डर लगता है। वैसे कभी कभी पौन घंटा घर पर ही करते हैं पर जब किसी की गमी से जाते पर वहां जब अन्य लोग बीमारियों का बखान करते हैं तो उनको उनको सुनकर हमारे अंदर डर का बवंडर खड़ा होता है और हम घर पर ही अधिक समय लगाते हैं या फिर बाहर अपने एक मित्र के यहां करने चले जाते हैं। इसमें दृढ़ संकल्प जैसी कोई चीज हमें नहीं लगती।’
लोग पता नहीं हमारी बात समझते हैं कि नहीं! क्योंकि वही लोग जब दोबारा मिलते हैं तो फिर वही बात-‘आप तो गजब करते हैं।’
हम कभी नहीं समझ पाते कि इसमें गजब क्या है? हम डरते हैं तो बचने के रास्ते ढूंढते रहते हैं और लोग तो बहादुर हैं ओर फिर उनका हाजमा हमसे बेहतर है। उल्टे हम तो उन लोगों के प्रशंसक हैं जो गलत पैसा हजम कर जाते हैं। शराब पीकर भी मजे में रहते हैं। सबसे बड़ी बात तो यह कि बिना योग साधना के बहुत से लोग स्वस्थ होकर विचरण करते हैं उनकी प्रशंसा करना भी हमें अच्छा लगता है। बचपन से सुनते आ रहे हैं कि बुरे काम का बुरा परिणाम होता है। इसलिये हम उन लोगों को ही योगी मानते हैं जो बुरा काम कर भी अपनी जिंदगी मजे में गुजारते हैं। कम से कम बाहर से तो ऐसा ही लगता है। अंदर की बात वही जाने। बाकी सभी जानते हैं कि हमारे अंदर डर है जिसका कहीं कोई इलाज नहीं है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

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मातृभक्त पति पसंद नहीं-हास्य व्यंग्य (matrubhakt pati pasand nahin-hasya vyangya)

अधिकतर लड़कियां अपनी मां की बात मानने या सुनने वाले लड़के पंसद नहीं करती। यह पता अब जाकर इस आधुनिक समाज को चला है। सच कहें तो सदियों से पेट में दबी बात अब जुबान में आयी है वरना तो कौन इसे मानता? आधुनिक संचार माध्यमों में तमाम बुराईयां हो सकती हैं पर उससे ऐसे सच सामने भी आने लगे हैं जिन पर समाज जानबूझकर पर्दा डालता आया है। अपने घर का सच बताने में हर पुरुष शर्माता है। चार लोगों के बीच वह यह साबित करता है कि उसका अपने घर पर पूरा नियंत्रण है। अगर कोई गलती से कह दे कि ‘मेरी घर में नहीं सुनी जाती है तो सुनने वाले उसकी मजाक उड़ायेंगे।
इसके विपरीत चार औरतें आपस में मिलेंगी तो अपने परिवार के दोष गिनाने में नहीं चूकेंगी। सासें एकत्रित हुईं तो बहुओं और अगर बहुऐं मिली तो सासों की शिकायत करती हैं।
कोई कोई तो कहते भी नहीं झिझकती कि ‘हमारे पति तो अपनी मां के चमचे हैं।’
कोई मां भी कह जाती है कि ‘मेरा लड़का तो जोरु का गुलाम है।
मान लीजिये ऐसे वार्तालाप में कोई पुरुष दूसरे की निंदा सुन रहा हो तो वह भी ऐसा जाल में फंसता है कि चर्चा किये जाने वाले पुरुष को वैसा ही समझ लेता है। अगर औरत के साथ पुरुष का रक्त संबंध हुआ तो वह उस पुरुष के बारे में प्रतिकूल टिप्पणी भी कर जाता है-‘कैसा आदमी है? क्या उसे घर चलाने की अक्ल नहीं है, लगता है बाप ने कुछ सिखाया ही नहीं है।’
एक औरत मां, पत्नी, बहिन सास तथा दादी तथा अन्य रिश्तों में पुरुष का साथ निभाती है तो पुरुष भी पुत्र, पति, ससुर तथा भाई के रूप में निभाता है। कहने का तात्पर्य यही है कि स्त्री पुरुष के संबंध उसके रिश्तों के अनुसार बनते और बिगड़ते हैं। जब कहीं स्त्री पुरुष के आपसी रिश्ते बिगड़ते हैं तो रक्त संबंधों के अनुसार हर कोई किसी का पक्ष भी लेता है। कहते हैं कि स्त्री का चरित्र और पुरुष का भाग्य कोई नहीं जानता पर यह फार्मूला पुरुष पर भी समान रूप से लागू है।
सफल पुरुष वही है जो स्त्रियों के आपसी संबंधों में बस हां हु ही कहता रहे।
कई बार पत्नी ताना देती है कि ‘जाओ, अपनी मां की बात सुनो। मेरी सुनते ही कहां हो?’
उसके तत्काल बाद मां की भी ताना मिल सकता है कि ‘जा जोरु के गुलाम! तेरी बात पर अब मेरा भरोसा नहीं रहा।’
एक दिन हम एक सेठजी की दुकान पर खड़े थे। उनका एक मित्र आया और बोला-‘तुझे कल सामान खरीदने बाहर चलना है कि नहीं। इतनी देर से दुकान पर न बताने आया और न ही नौकर के हाथ से संदेश भेजा।’
सेठजी ने कहा-‘यार, घर पर एक काम है। देखना पड़ेगा कि चल पाऊंगा कि नहीं।’
उस समय फोन की सुविधा ऐसी नहीं थी जैसी आज है। वह आदमी बोला-‘सीधा कह न! बीबी से पूछे बिना कोई काम नहीं कर सकता।’
सेठजी ने भी सरल भाव से कहा-‘तुम क्या बीबी से बिना पूछे चल रहे हो। परसों जब मैंने चलने को कहा था तो क्यों नहीं चला? तेरा नौकर बता रहा था कि घर से मना कर दिया है। अब तुम मेरे को अपनी सफाई मत देना।’
वह आदमी हंस कर चला गया। उसके जाने के बाद सेठजी हमसे बोले-‘एक बात कहूं। बाहर आदमी कितना भी शेर बनता हो पर घर में होते सभी भीगी बिल्ली हैं। यह अलग बात है कि कोई इस बात को मानता है कि नहीं।’
औरत अगर बहु है तो वह चाहती है कि पति अपनी मां यानि उसकी सास से पहले उसकी बात सुने। अगर मां है तो वह चाहती है कि इतने बरसों से जिस लड़के को पाला है वह मेरी बात सुने।’
फिर इस पर बहने और अन्य रिश्ते भी होते हैं। बहिन सोचती है कि भाई अपनी साली से अधिक हमें तवज्जो दे। साली है तो वह चाहती है कि जीजाजी हमें अपनी बहिन से अधिक सम्मान दें।
हमारे यहां समाज पुरुष प्रधान इसलिये है क्योंकि अभी भी अधिकतर प्रत्यक्ष आय का भार उस पर है-याद रहे अमेरिकी विशेषज्ञ कहते हैं कि सामान्य भारतीय गृहिणियां अपनी पति से अधिक आय करती हैं यानि वह इतना काम करती हैं कि अगर उनका रुपये में मूल्यांकन हो तो पति से अधिक आय उनकी होना चाहिये। इस प्रत्यक्ष आय के कारण उसका प्रभाव घर पर रहता है पर दूसरी समस्या उसके साथ यह है कि वह हमेशा घर से बाहर ही होता है। दिन में घर पर क्या हुआ? किसने क्या कहा? उसे पता तब चलता है जब वह शाम को घर वापस आता है। हर कोई अपने हिसाब से अपनी बात उसे सुनाता है। ऐसे मेें उसकी थकान और तनाव बढ़ जाता है। यह घर घर की कहानी है। इस पर हंसने जैसी कोई बात नहीं है। यदि इन बातों पर आप हंसते हैं तो इसका आशय यह है कि अभी आपका विवाह नहीं हुआ या फिर आप हमसे क्या अपने आपसे अपना सच छिपा रहे हैं।
अब सवाल है कि लड़कियां ही ऐसा लड़का पसंद नहीं करती जो मां की बात सुनता है तो फिर उसके जीवन साथी से आप क्या कहेंगे? मां की बात सुन क्योंकि पुरुष तो तू है। इधर दहेज एक्ट और घरेलू हिंसा के भी कानून बना रखे हैं तब आदमी पर एक दबाव तो रहता ही है। एक अजीब संयोग है कि इस समय वंदेमातरम को लेकर तमाम तरह की चर्चा है ऐसे में ही एक टीवी चैनल से यह संदेश निकला कि ‘लड़कियां ऐसा लड़का पसंद नहीं करती जो मां की बात सुनता है।’ इन्हीं लड़कियों में ही भविष्य की मातायें हैं और कभी वंदेमातरम शब्द सुनकर उनको भी खुशी होगी पर अभी उनके लिये इसका क्या मतलब? ऐसे में अगर कोई लड़का अगर पसंद होने और करने के लिये-आजकल दोनों की मर्जी चलती है- किसी लड़की से मिलने गया और जाते ही बोला दिया ‘वंदेमातरम’, तब वह तो पहली नजर में ही अस्वीकृत कर दिया जायेगा। हमने टीवी चैनल के उस कार्यक्रम के कुछ हिस्से कभी कभी देखे हैं और उसमें लड़कियों की लड़कों की माताओं पर टिप्पणियां भी सुनी है तब यह सोचते हैं कि समाज ने बहुत समय से कई बातें दबा कर रखी हैं जो सामने आ रही हैं।
हमारे एक सेठ जी कहते थे कि सफल पुरुष वही है जो औरतों की विवाद में बस हां हु करता रहे। जिस आदमी ने सोचा कि मैं कोई फैसला कर शांति करवाऊं वह अपने घर के साथ ही अपने दिल की भी शांति ऐसे दांव पर लगा देगा कि काम पर भी उसका मन नहीं लगेगा।’
बहरहाल स्त्री और पुरुष के आपसी संबंधों के साथ ही स्त्रियों के आपसी रिश्ते भी होते हैं और उनके बीच जब पुरुष फंसता है और बात ऊंच नीच हुई तो पुरुष का ही नाम खराब होता है क्योंकि नाम उसके घर पर ही चलता है। इस विषय पर एक विद्वान का कथन याद आ रहा है। जब यह निर्णय किया गया कि स्कूल में प्रवेश के समय पिता के नाम की अनिवार्यता नहीं होगी और मां भी अपना नाम वहां लिखा सकती है। तब उन विद्वान ने कहा था कि ‘पुरुष का तो बस एक नाम ही था वरना तो घर तो चलाती स्त्रियां ही हैं। अब वह नाम भी पुरुष के हाथ से गया।’
कहने का तात्पर्य यही है कि इस संसार में किसी रिश्ते को समझना और उस बयान करना ही गलती है। हालात, समय और स्वार्थ अपने हिसाब से संबंध बदलते रहते हैं।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

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सम्मेलन पर झगड़ा-हास्य व्यंग्य (hindi sammelan-hasya vyangya)

ब्लागर उस समय सो रहा था कि चेले ने आकर उसके हाथ हिलाकर जगाया। ब्लागर ने आखें खोली तो चेले ने कहा-‘साहब, बाहर कोई आया है। कह रहा है कि मैं ब्लागर हूं।’
ब्लागर एकदम उठ बैठा और बोला-‘जाकर बोल दे कि गुरुजी घर पर नहीं है।’
चेले ने कहा-’साहब, मैंने कहा था। तब उसने पूछा ‘तुम कौन हो’ तो मैंने बताया कि ‘मैं उनका शिष्य हूं। ब्लाग लिखना सीखने आया हूं’। तब वह बोला ‘तब तो वह यकीनन अंदर है और तुम झूठ बोल रहे हो, क्योंकि उसने सबसे पहले तो तुम्हें पहली शिक्षा यही दी होगी कि आनलाईन भले ही रहो पर ईमेल सैटिंग इस तरह कर दो कि आफलाईन लगो। जाकर उससे कहो कि तुम्हारा पुराना जानपहचान वाला आया है। और हां, यह मत कहना कि ब्लागर दोस्त आया है।’

ब्लागर बोला-‘अच्छा ले आ उसे।’
शिष्य बोला-‘आप   निकर छोड़कर पेंट  पहन लो। वरना क्या कहेगा।’
ब्लागर ने कहा-‘ क्या कहेगा ? वह कोई ब्लागर शाह है। खुद भी अपने घर पर इसी तरह तौलिया पहने  कई बार मिलता है। मैं तो फिर भी आधुनिक प्रकार की  नेकर पहने रहता  हूं, जिसे पहनकर लोग सुबह मोर्निंग वाक् पर जाते हैं।’
इधर दूसरे ब्लागर ने अंदर प्रवेश करते ही कहा-‘यह शिष्य कहां से ले आये? और यह ब्लागिंग में सिखाने लायक है क्या? बिचारे से मुफ्त में सेवायें ले रहे हो?’
पहले ब्लागर ने कहा-‘अरे, यह तो दोपहर ऐसे ही सीखने आ जाता है। मैं तुम्हारी तरह लोगों से फीस न लेता न सेवायें कराता हूं। बताओ कैसे आना हुआ।’
दूसरे ब्लागर ने कंप्यूटर की तरफ देखते हुए पूछा-‘यह तुम्हारा कंप्यूटर क्यों बंद है? आज कुछ लिख नहीं रहे। हां, भई लिखने के विषय बचे ही कहां होंगे? यह हास्य कवितायें भी कहां तक चलेंगी? चलो उठो, मैं तुम्हारे लिखने के लिये एक जोरदार समाचार लाया हूं। ब्लागर सम्मेलन का समाचार है इसे छाप देना।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘तुम खुद क्यों नहीं छाप देते। तुम्हें पता है कि ऐसे विषयों पर मैं नहीं लिखता।’
दूसरा ब्लागर बोला-‘अरे, यार मैं अपने काम में इतना व्यस्त रहता हूं कि घर पर बैठ नहीं पाता। इसलिये कंप्यूटर बेच दिया और इंटरनेट कनेक्शन भी कटवा दिया। अब अपने एक दोस्त के यहां बैठकर कभी कभी ब्लाग लिख लेता हूं।’
पहले ब्लागर ने घूरकर पूछा-‘ब्लाग लिखता हूं से क्या मतलब? कहो न कि अभद्र टिप्पणियां लिखने के खतरे हैं इसलिये दोस्त के यहां बैठकर करता हूं। तुमने आज तक क्या लिखा है, पता नहीं क्या?’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘क्या बात करते हो? आज इतना बड़ा सम्मेलन कराकर आया हूं। इसकी रिपोर्ट लिखना है।’
पहले ब्लागर ने इंकार किया तो उसका शिष्य बीच में बोल पड़ा-‘गुरुजी! आप मेरे ब्लाग पर लिख दो।’
दूसरा ब्लागर बोला-‘अच्छा तो चेले का ब्लाग भी बना दिया! चलो अच्छा है! तब तो संभालो यह पैन ड्ाईव और कंप्यूटर खोलो उसमें सेव करो।’
शिष्य ने अपने हाथ में पैन ड्राईव लिया और कंप्यूटर खोला।
पहले ब्लागर ने पूछा-‘यह फोटो कौनसे हैं?
दूसरे ब्लागर ने एक लिफाफा उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा‘-जब तक यह इसके फोटो सेव करे तब तक तुम उसको देखो।
ब्लागर ने फोटो को एक एक कर देखना शुरु किया। एक फोटो देखकर उसने कहा-‘यह फोटो कहीं देखा लगता है। तुम्हारा जब सम्मान हुआ था तब तुमने भाषण किया था। शायद…………….’
दूसरे ब्लागर ने बीच में टोकते हुए कहा-‘शायद क्या? वही है।’
दूसरा फोटो देखकर ब्लागर ने कहा-‘यह चाय के ढाबे का फोटो। अरे यह तो उस दिन का है जब मेरे हाथ से नाम के लिये ही उद्घाटन कराकर मुझसे खुद और अपने चेलों के लिये चाय नाश्ते के पैसे खर्च करवाये थे। मेरा फोटो नहीं है पर तुम्हारे चमचों का…….’’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘अब मैं तुम्हारे इस चेले को भी चमचा कहूं तो तुम्हें बुरा लगेगा न! इतनी समझ तुम में नहीं कि ब्लागिंग कोई आसान नहीं है। जितना यह माध्यम शक्तिशाली है उतना कठिन है। लिखना आसान है, पर ब्लागिंग तकनीकी एक दिन में नहीं सीखी जा सकती। इसके लिये किसी ब्लागर गुरु का होना जरूरी है। सो किसी को तो यह जिम्मा उठाना ही है। तुम्हारी तरह थोड़े ही अपने चेले को घर बुलाकर सेवा कराओ। अरे ब्लागिंग सिखाना भी पुण्य का काम है। तुम तो बस अपनी हास्य कवितायें चिपकाने को ही ब्लागिंेग कहते हो।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘हां, यह तो है! यह तीसरा फोटो तो आइस्क्रीम वाले के पास खड़े होकर तुम्हारा और चेलों का आईस्क्रीम खाने का है। यह आईसक्रीम वाला तो उस दिन मेरे सामने रास्ते पर तुमसे पुराना उधार मांग रहा था। तब तुमने मुझे आईसक्रीम खिलाकर दोनों के पैसे दिलवाकर अपनी जान बचाई थी।’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘मेरे फोटो वापस करो।’
पहले ब्लागर ने सभी फोटो देखकर उसे वापस करते हुए कहा-‘यार, पर इसमें सभी जगह मंच के फोटो हैं जिसमें तुम्हारे जान पहचान के लोग बैठे हैं। क्या घरपर बैठकर खिंचवायी है या किसी कालिज या स्कूल पहुंच गये थे। सामने बैठे श्रोताओं और दर्शकों का कोई फोटो नहीं दिख रहा।’
दूसरे ब्लागर ने पूछा-‘तुम किसी ब्लागर सम्मेलन में गये हो?’
पहले ब्लागर ने सिर हिलाया-‘नहीं।’
दूसरा ब्लागर-‘तुम्हें मालुम होना चाहिये कि ब्लागर सम्मेलन में सिर्फ ब्लागर की ही फोटो खिंचती हैं। वहां कोई व्यवसायिक फोटोग्राफर तो होता नहीं है। अपने मोबाइल से जितने और जैसे फोटो खींच सकते हैं उतने ही लेते हैं। ज्यादा से क्या करना?
पहला ब्लागर-हां, वह तो ठीक है! ब्लागर सम्मेलन में आम लोग कहां आते हैं। अगर वह हुआ ही न हो तो?
दूसरे ब्लागर को गुस्सा आ गया-‘लाओ! मेरे फोटो और पैन ड्राइव वापस करो। तुमसे यह काम नहीं बनने का है। तुम तो लिख दोगे ‘ न हुए ब्लागर सम्मेलन की रिपोर्ट’।
पहला ब्लागर ने कहा-‘क्या मुझे पागल समझते हो। हालांकि तुम्हारे कुछ दोस्त कमेंट में लिख जाते हैं ईडियट! मगर वह खुद हैं! मैं तो लिखूंगा ‘छद्म सम्मेलन की रिपोर्ट!’
दूसरे ब्लागर को गुस्सा आ गया उसने कंप्यूटर में से खुद ही पेनड्राइव निकाल दिया और जाने लगा।
फिर रुका और बोला-‘पर इस ब्लागर मीट पर रिपोर्ट जरूर लिखना। हां, इस ब्लागर सम्मेलन का जिक्र कहीं मत करना। तुम जानते नहीं इंटरनेट लेखकों के सम्मेलन और चर्चाऐं कैसे होती हैं? इंटरनेट पर अपने बायोडाटा से एक आदमी ने अट्ठारह लड़कियों को शादी कर बेवकूफ बनाया। एक आदमी ने ढेर सारे लोगों को करोड़ों का चूना लगाया। इस प्रकार के समाचार पढ़ते हुए तुम्हें हर चीज धोखा लगती है। इसलिये तुम्हें समझाना मुश्किल है। कभी कोई सम्मेलन किया हो तो जानते। इंटरनेट पर कैसे सम्मेलन होते हैं और उनकी रिपोर्ट कैसे बनती है, यह पहले हमसे सीखो। सम्मेलन करो तो जानो।’
पहले ब्लागर ने व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा-ऐसे सम्मेलन कैसे कराऊं जो होते ही नहीं।’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘होते हैं, करना हमसे सीख लो।’
वह चला गया तो पहला ब्लागर सामान्य हुआ। उसने शिष्य से कहा-‘अरे, यार कम से कम उसके फोटो तो कंप्यूटर में लेना चाहिये थे।’
शिष्य ने कहा-‘ गुरुजी फोटो तो मैंने फटाफट पेनड्राइव से अपने कंप्यूटर से ले लिये।’
पहला ब्लागर कंप्यूटर पर बैठा और लिखने लगा। शिष्य ने पूछा’क्या लिख रहे हैं।
पहले ब्लागर ने कहा-‘जो उसने कहा था।’
शिष्य ने पूछा-‘यही न कि इस मुलाकात की बात लिख देना।’
ब्लागर ने जवाब दिया‘नहीं! उसने कहा था कि ‘इस सम्मेलन का जिक्र कहीं मत करना’।’’
……………………….
नोट-यह व्यंग्य पूरी तरह से काल्पनिक है। किसी घटना या सम्मेलन का इससे कोई लेना देना नहीं है। किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो यह एक संयोग होगा। इसका लेखक किसी दूसरे ब्लागर से ब्लागर से मिला तक नहीं है।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior

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हमदर्दी कला-व्यंग्य कविता (art of sypothy)

हमदर्दी जताने की कला
हमें कभी नहीं आई
किसी का दर्द देखकर
मन रोया मन भर आंसु
पर आंखें दरिया न बन पाई।
शायद लोग दिमाग से सोचते हैं
इसलिये हमदर्दी के शब्द जल्दी ढूंढ लेते
दिल तक नहीं पहुंचता
दूसरे का दर्द
कर लेते हैं दिखावे में कमाई।
नहीं करना सीखा पाखंड
इसलिये दूसरे के घाव पर मरहम लगाकर भी
अपने लिये ओढ़ लेते हैं तन्हाई।

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

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ज़िन्दगी के देखे दो ही रास्ते-हिंदी कविता (zindagi ke do raste-hindi poem)

ज़िन्दगी के देखे दो ही रास्ते
एक बागों की बहार
दूसरा उजाड़ की कगार का.

चलती है टांगें
मकसद तय करता है मन
दुश्मन की शान में गुस्ताखी करना
या तारीफ के अल्फाज़ कहकर
दिल खुश करना यार का..

फिर भी समझ का फेर तो
होता है इंसान में अलग अलग
कहीं रौशनी देखकर अंगारों में
अपने पाँव जला देता है
कहीं प्यार के वहम में
अपनी अस्मत भी लुटा देता है
जिंदगी है उनकी ही साथी
जो आगे कदम बढ़ाने से पहले
अनुमान कर लेता है
समय और हालत की धार का..

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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior

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ख्वाहिशें हमेशा बनी रही यार-हिंदी कविता (khavahishen-hindi kavita

यूं तो दर-ब-दर भटकते रहे
इस नीले आसमान के नीचे।
कभी सोचा न था कि
इस दौर में भी छप रहे हैं
धरती पर हमारे कदमों के निशान पीछे।

पल पल अपने दर्द के साथ जीते रहे
अपने गम खुद ही पीते रहे
पर अल्फाजों में कभी नहीं कहे
जमाने ने चाहे
हमारे पांव बढ़ने से रोकने के लिये खींचे।

जब बैठते हुए मुड़कर देखा
तब दिल में हुई खुशी यह देखकर कि
उन जगहों पर अल्फाजों के शेर
खिले थे फूल की तरह
जिस रास्ते हम चले थे
हमारे पांवों से गिरे पसीने ने ही वह सींचे।
———
अपनी चाहतों का
कभी पूरा करने का मौका ही न मिला
जब एक रुपया था जेब में
तब कीमत थी दो रुपया
जब दो था तब हो गयी चार।
पैमाने के नीचे ही
झूलते रहे
जिन्होंने हमेशा साथ निभाया
वही ख्वाहिशें हमेशा बनी रही यार।

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior

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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।

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प्रजातंत्र में ब्लॉग की महत्वपूर्ण भूमिका-हिंदी लेख (democracy and hindi blog-hindi article)

भारत में इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या सात करोड़ से ऊपर है-इसका सही अनुमान कोई नहीं दे रहा। कई लोग इसे साढ़े बारह करोड़ बताते हैं। इन प्रयोक्ताओं को यह अनुमान नहीं है कि उनके पास एक बहुत बड़ा अस्त्र है जो उनके पास अपने अनुसार समाज बनाने और चलाने की शक्ति प्रदान करता है-बशर्ते उसके उपयोग में संयम, सतर्कता और चतुरता बरती जाये, अन्यथा ऐसे लोगों को इस पर नियंत्रण करने का अवसर मिल जायेगा जो समाज को गुलाम की तरह चलाने के आदी हैं।

यह इंटरनेट न केवल दृश्य, पठन सामग्री तथा समाचार प्राप्त करने के लिये है बल्कि हमें अपने फोटो, लेखन सामग्री तथा समाचार संप्रेक्षण की सुविधा भी प्रदान करता है। कहने का तात्पर्य यह है कि हम केवल प्रयोक्ता नहीं निर्माता और रचयिता भी बन सकते हैं। अनेक वेबसाईट-जिनमें ब्लागस्पाट तथा वर्डप्रेस मुख्य रूप से शामिल हैं- ब्लाग की सुविधा प्रदान करती हैं। अधिकतर सामान्य प्रयोक्ता सोचते होंगे कि हम न तो लेखक हैं न ही फोटोग्राफर फिर इन ब्लाग की सुविधा का लाभ कैसे उठायें? यह सही है कि अधिकतर साहित्य बुद्धिजीवी लेखकों द्वारा लिखा जाता है पर यह पुराने जमाने की बात है। फिर याद करिये जब हमारे बुजुर्ग इतना पढ़े लिखे नहीं थे तब भी आपस में चिट्ठी के द्वारा पत्राचार करते थे। आप भी अपनी बात इन ब्लाग पर बिना किसी संबंोधन के एक चिट्ठी के रूप में लिखने का प्रयास करिये। अपने संदेश और विचारों को काव्यात्मक रूप देने का प्रयास हर हिंदी नौजवान करता है। इधर उधर शायरी या कवितायें लिखवाकर अपनी मित्र मंडली में प्रभाव जमाने के लिये अनेक युवक युवतियां प्रयास करते हैं। इतना ही नहीं कई बार अपने ज्ञान की अभिव्यक्ति के लिये तमाम तरह के किस्से भी गढ़ते हैं। यह प्रयास अगर वह ब्लाग पर करें तो यह केवल उनकी अभिव्यक्ति को सार्वजनिक रूप ही नहीं प्रदान करेगा बल्कि समाज को ऐसी ताकत प्रदान करेगा जिसकी कल्पना वह नहीं कर सकते।

आप फिल्म, क्रिकेट,साहित्य,समाज,उद्योग व्यापार, पत्र पत्रिकाओं, टीवी चैनल तथा उन अन्य क्षेत्रों को देखियें जिससे बड़े वर्ग द्वारा छोटे वर्ग पर प्रभाव डाला जा सकता है वहां पर कुछ निश्चित परिवारों या गुटों का नियंत्रण है। यहां प्रभावी लोग जानते हैं कि यह सभी प्रचार साधन उनके पास ऐसी शक्ति है जिससे वह आम लोगों को अपने हितों के अनुसार संदेश देख और सुनाकर उनको अपने अनुकूल बनाये रख सकते हैं। क्रिकेट में आप देखें तो अनेक वर्षों तक एक खिलाड़ी इसलिये खेलता  है क्योंकि उसे पीछे खड़े आर्थिक शिखर पुरुष उसका व्यवसायिक उपयोग करना चाहते हैं। फिल्म में आप देखें तो अब घोर परिवारवाद आ गया है। सामान्य युवकों के लिये केवल एक्स्ट्रा में काम करने की जगह है नायक के रूप में नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे आर्थिक, सामाजिक तथा प्रचार के शिखरों पर जड़ता है। आप पत्र पत्रिकाओं में अगर लेख पढ़ें तो पायेंगे कि उसमें या तो अंग्रेजी के पुराने लेखक लिख रहे हैं या जिनको किसी अन्य कारण से प्रतिष्ठा मिली है इसलिये उनके लेखन को प्रकाशित किया जा रहा है। पिछले पचास वर्षों में कोई बड़ा आम लेखक नहीं आ पाया। यह केवल इसलिये कि समाज में भी जड़ता है। याद रखिये जब राजशाही थी तब यह कहा जाता था कि ‘यथा राजा तथा प्रजा’, पर लोकतंत्र में ठीक इसका उल्टा है। इसलिये इस जड़ता के लिये सभी आम लोग जिम्मेदार हैं पर वह शिखर पर बैठे लोगों को दोष देकर अपनी असमर्थता जाहिर करते हैं कि ‘क्या किया जा सकता है।’

इस इंटरनेट पर जरा गौर करें। अक्सर आप लोग देखते होंगे कि समाचार पत्र पत्रिकाओं में में उसकी चर्चा होती है। आप सुनकर आश्चर्य करेंगे कि इनमें से कई ऐसे आलेख होते हैं जिनको इंटरनेट पर ब्लाग से लिया जाता है-जब किसी का नाम न दिखें तो समझ लें कि वह कहीं न कहीं इंटरनेट से लिया गया है। यह सब इसलिये हो रहा है क्योंकि अधिकतर इंटरनेट प्रयोक्ता केवल फोटो देखने या अपने पढ़ने के लिये बेकार की सामग्री पढ़ने में व्यस्त हैं। उनकी तरफ से हिंदी भाषी लेखकों के लिये प्रोत्साहन जैसा कोई भाव नहीं है। ऐसा कर आप न अपना समय जाया कर रहे हैं बल्कि अपने समाज को जड़ता से चेतन की ओर ले जाने का अवसर भी गंवा रहे हैं। वह वर्ग जो समाज को गुलाम बनाये रखना चाहता है कि फिल्मी अभिनेता अभिनेत्रियों के फोटो देखकर आप अपना समय नष्ट करें क्योंकि वह तो उनके द्वारा ही तय किये मुखौटे हैं। आपके सामने टीवी और समाचार पत्रों में भी वही आ रहा है जो उस वर्ग की चाहत है। ऐसे में आपकी मुक्ति का कोई मार्ग नहीं था तो झेल लिये। अब इंटरनेट पर ब्लाग और ट्विटर के जरिये आप अपना संदेश कहीं भी दे सकते हैं। इस पर अपनी सक्रियता बढ़ाईये। जहां तक इस लेखक का अनुभव है कि एक एस. एम. एस लिखने से कम मेहनत यहां पचास अक्षरों का एक पाठ लिखने में होती है। जहां तक हो सके हिंदी में लिखे गये ब्लाग और वेबसाईट को ढूंढिये। स्वयं भी ब्लाग बनाईये। भले ही उसमें पचास शब्द हों। लिखें भले ही एक माह में एक बार। अगर आप समाज के सामान्य आदमी है तो बर्हिमुखी होकर अपनी अभिव्यक्ति दीजिये। वरना तो समाज का खास वर्ग आपके सामने मनोरंजन के नाम पर कार्यक्रम प्रस्तुत कर आपको अंतर्मुखी बना रहा है ताकि आप अपनी जेब ढीली करते रहें। आप किसी से एस. एम. एस. पर बात करने की बजाय अपने ब्लाग पर बात करें वह भी हिंदी में। ऐसे टूल उपलब्ध हैं कि आप रोमन में लिखें तो हिंदी हो जाये और हिंदी में लिखें तो यूनिकोड में परिवर्तित होकर प्रस्तुत किये जा सकें।
याद रखें इस पर अपनी अभिव्यक्ति वैसी उग्र या गालीगलौच वाली न बनायें जैसी आपसी बातचीत में करते हैं। ऐसा करने का मतलब होगा कि उस खास वर्ग को इस आड़ में अपने पर नियंत्रण करने का अवसर देना जो स्वयं चाहे कितनी भी बदतमीजी कर ले पर समाज को तमीज सिखाने के लिये हमेशा नियंत्रण की बात करते हुए धमकाता है।
प्रसंगवश यहां यह भी बता दें कि यह ब्लाग भी पत्रकारिता के साथ ही चौथा स्तंभ है पांचवां नहीं जैसा कि कुछ लोग कह रहे हैं। सीधी सी बात है कि विधायिका, कार्यपालिका, न्याय पालिका और पत्रकारिता चार स्तंभ हैं। इनमें सभी में फूल लगे हैं। विधायिका में अगर हम देखें तो संसद, विधानसभा, नगर परिषदें और ग्राम पंचायतें आती हैं। कार्यपालिका में मंत्री, संतरी,अधिकारी और लिपिक आते हैं। न्याय पालिका के विस्तारित रूप को देखें तो उसमें भी माननीय न्यायाधीश, अधिवक्ता, वादी और प्रतिवादी होते हैं। उसी तरह पत्रकारिता में भी समाचार पत्र, पत्रिकायें, टीवी चैनल और ब्लाग- जिसको हम जन अंतर्जाल पत्रिका भी कह सकते हैं- आते हैं। इसे लोकतंत्र का पांचवां स्तंभ केवल अभिव्यक्ति के इस जन संसाधन का महत्व कम करने के लिये प्रचारित किया जा रहा है ताकि इस पर लिखने वाले अपने महत्व का दावा न करे।

कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदी के ब्लाग जगत में आपकी सक्रियता ही इंटरनेट या अंतर्जाल पर आपको प्रयोक्ता के साथ रचयिता बनायेगी। जब ब्लाग आम जन के जीवन का हिस्सा हो जायेगा तक अब सभी क्षेत्रों में बैठे शिखर पुरुषों का हलचल देखिये। अभी तक वह इसी भरोसे हैं कि आम आदमी की अभिव्यक्ति का निर्धारण करने वाला प्रचारतंत्र उनके नियंत्रण में इसलिये चाहे जैसे अपने पक्ष में मोड़ लेंगे। हालांकि अभी हिंदी ब्लाग जगत अधिक अच्छी हालत में नहीं है- इसका कारण भी समाज की उपेक्षा ही है-तब भी अनेक लोग इस पर आंखें लगाये बैठे हैं कि कहीं यह माध्यम शक्तिशाली तो नहीं हो रहा। इसलिये पांचवां स्तंभ या रचनाकर्म के लिये अनावश्यक बताकर इसकी उपेक्षा न केवल स्वयं कर रहे हैं बल्कि समाज में भी इसकी चर्चा इस तरह कर रहे हैं कि जैसे इसको बड़े लोग-जैसे अभिनेता और प्रतिष्ठत लेखक-ही बना सकते हैं। जबकि हकीकत यह है कि अनेक ऐसे ब्लाग लेखक हैं जो अपने रोजगार से जुड़े काम से आने के बाद यहां इस आशा के साथ यहां लिखते हैं कि आज नहीं तो कल यह समाज में जनजन का हिस्सा बनेगा तब वह भी आम लोगों के साथ इस समाज को एक नयी दिशा में ले जाने का प्रयास करेंगे। इसलिये जिन इंटरनेट प्रयोक्ताओं की नजर में यह आलेख पड़े वह इस बात का प्रचार अपने लोगों से अवश्य करें। याद रखें यह लेख उस सामान्य लेखक है जो लेखन क्षेत्र में कभी उचित स्थान न मिल पाने के कारण यह लिखने आया है।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior

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समाज को नकली नायकों के महिमा मंडन बचना होगा-चिंत्तन आलेख (nakali naykon ka mahim mandan-hindi lekh)

भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान में व्यक्ति को सदैव सकारात्मक सोच की प्रेरणा दी जाती है। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि मनुष्य का मन उसे अपने सुख सुविधायें पाने के लिये हमेशा विचलित किये रहता है। ऐसे में मनुष्य या तो दिमागी रूप से आलसी होकर रह जाता है या फिर उसके अंदर नकारात्मक विचारों के प्रति रुझान बढ़ता है।

देखा जाये तो हमारे देश में नकारात्मकता का बोलबाला हमेशा ही रहा है इसलिये धर्मग्रंथों में नाटकीयता के साथ अध्यात्मिक ज्ञान भी सम्मिलित किया गया है पर लोग उनमें शामिल नाटकीय विषयों को मनोरंजन की दृष्टि से देखते हैं जबकि उसमें शामिल अध्यात्मिक ज्ञान ही ग्रहण करने लायक है यह बहुत कम लोग सोच पाते हैं।
लोगों के दृष्टिकोण का यह हाल है कि उनको नकारात्मक विषयों के प्रति अधिक रुझान रहता है।
हमारे देश में यह पंरपरा है कि लड़का जब बाहर कहीं जाता है तो अपने माता पिता के पांव छूता है और आता है तो छूता है। ऐसे दृश्य को लोग निरपेक्ष भाव से देखते हैं। कभी आपसी चर्चा में ऐसे नहीं कहते कि ‘अमुक लड़का अपने माता पिता के पांव छूता है’। इसके विपरीत अगर किसी लड़के ने माता पिता पर हमला कर दिया तो चीत्कार कर उठते हैं ‘आजकल कैसा खराब जमाना आ गया है’।
ठीक उसी तरह हर माता अपने माता अपने बच्चे को प्यार करती है पर कुछ ऐसी घटनायें ऐसी भी हो जाती हैं जब वह अपने बच्चे का गला घोंट देती है। तब भी ऐसी ही चीत्कार। कहने का तात्पर्य यह है प्रेम और सम्मान निरपेक्ष भाव से देखे जाते हैं और चर्चा के लिये घृणा के साथ हिंसा के विषय लोगों को अच्छे लगते हैं। यह आज से नहीं बल्कि बहुत समय से होता रहा है। आजकल समाचार पत्र और टीवी ने तो एक तरह से आदमी की सोच को लुप्त ही कर दिया है। उसमें आये दिन ऐसे ही समाचार आते हैं। उसमें खलपात्रों का भी प्रचार किया जाता है। अमुक डान ने यह किया तो अमुक ने वह किया। एक तो समाज में वैसे ही नकारात्मक सोच की प्रधानता उस परा टीवी और समाचार पत्रों के खलपात्रों का महिमामंडल आज की पीढ़ी को भटका रहा है। सच तो यह है कि समाज में अच्छाई और बुराई का भेद ही समाप्त हो चुका है। बुराई और दुस्साहस को सक्रियता और अच्छाई को निष्क्रियता की तरह प्रदर्शन करना अंततः इस देश के लिये भारी संकट बनता जा रहा है।

अपने विषयों की प्रस्तुति की आक्रामक अभिव्यक्ति करने की प्रवृत्ति भी बढ़ती जा रही है यही कारण है कि फिल्म, नाटक, धारावाहिक और साहित्य में सकारात्मक सृजन का अभाव दृष्टिगोचर हो रहा है। लोग तात्कालिक उपलब्धियों के लिये चीख और चिल्ला कर अपनी अभिव्यक्ति इस तरह दे रहे हैं जैसे कि उसके बिना उनकी कोई सुनेगा ही नहीं। यह सही है कि किसी भी प्रकार के दृश्यव्य और शाब्दिक सृजन में नायक की प्रतिष्ठा तभी बढ़ती है जब उसके सामने खलनायक हो पर इसमें नाटकीयता के साथ संदेश भी होना चाहिए। मगर हमेशा ही नायक और खलनायक की द्वंद्वपूर्ण कथा संदेश देने वाली नहीं होती। हमारे पुराने ग्रंथों में भी नायक और खलनायकों की चर्चा है पर उनमें ऐसे भी पूज्यनीय लोग भी चर्चित रहे हैं जिन्होंने किसी भौतिक खलनायक का मुकाबला न करते हुए अपने सृजन से ही अपना नाम प्रतिष्ठित किया। हम भगवान श्रीराम और कृष्ण का नाम जानते हैं पर इन्हें जननायक की तरह प्रतिष्ठित करने वाले बाल्मीकी और वेदव्यास कभी प्रत्यक्ष किसी बैरी से नहीं लड़े। महाराज शुकदेव ने श्रीमद्भागवत की कथा का प्रतिपादन किया। विदुर और उनके पुत्र संजय ने भी अपना नाम प्रतिष्ठित करते हुए किसी प्रकार का युद्ध नहीं किया। कहने का तात्पर्य यह है कि दृश्यव्य और शाब्दिक सृजन में नायक और खलनायक की द्वंद्वपूर्ण नाटकीयता का महत्व तो होता है पर सभी कुछ वही नहीं होता। सकारात्मक संदेश देने वाले लोग भी नायक से कम नहीं होते।
वैसे इस नकारात्मक सोच के पीछे हमारी फिल्मों का भी कम योगदान नहीं है। उसमें नायक, नायिका, खलनायक और खलनायिका की प्रधानता रही है। लोग भी इसके आदी हो गये हैं। नायक या नायिका तो सभी नहीं बन सकते-आजकल के जमाने में सभी लोग इस सत्य का जाने गये हैं-इसलिये लोग वास्तविक खलनायकों के कृकृत्यों का मुकाबला करने की बजाय उनको अनदेखा कर जाते हैं। दरअसल निष्क्रियता को लोगों ने अच्छाई का प्रमाण मान लिया है।
दिल्ली में हाल ही में हुई एक धटना याद आ रही है। उसमें कार में जा रहे एक दंपत्ति को भीड़ भरे बाजार में लुटेरों ने लूट लिया। पत्नी कार से उतर कर ठेले वाले से सब्जी ले रही थी-इसका मतलब वह भीड़ वाला इलाका था-उसी समय लुटेरों ने उसके पति पर हमला कर दिया। पत्नी अपने पति को बचाने आई तो उस भी हमलावर टूट पड़े। लोग खड़े देख रहे थे क्योंकि वह नायक नहीं बन सकते थे। खामोशी से सब देखने में उनको अच्छाई नजर आई। वैसे भी फिल्मों में दिखाया जाता है कि खलनायकों से लड़ने वाले पुलिस अधिकारियों या अन्य पात्रों के परिवारों को ही साफ कर दिया जाता है। शोले भले ही हिंदी फिल्मों की सबसे लोकप्रिय फिल्म रही हो पर उसने समाज में भले लोगों को निष्क्रियता का भाव अच्छाई के नाम पर भरने का जो काम किया उसे तो एक घृणित फिल्म कहना ही ठीक होगा।

पिछले कुछ दिनों में ऐसी अनेक वारदातें हो चुकी हैं जिसमें भीड़ ने अपराधियों को पीटकर मार डाला। इस विषय पर कभी आप फिल्म बनते नहीं देखेंगे क्योंकि इससे समाज में सक्रियता का संदेश जायेगा। इन्हीं फिल्मों की आड़ में पता नहीं कौन कौन अपना पैसा लगाकर अपने प्रायोजित संदेश दे रहा है यह अलग से चर्चा का विषय है। समस्या यही नहीं है बल्कि फिल्म और टीवी वालों के इन अदृश्य प्रायोजकों को रेडियो और अखबारों से भी सहायता मिल रही है। इस तरह के संदेशों से आदमी नायक या खलनायक ही बनेगा। नायकों के लिये सुरक्षित स्थान हो गये हैं पर खलनायकों के लिये जगहें अधिक खाली रहती हैं। इसलिये समाज के अनेक युवक युवतियों का रुझान खलपात्र की भूमिका अदा करने की ओर आकृष्ट होता हो तो आश्चर्य क्या है? खासतौर से जब पर्दे के नायकों द्वारा सामाजिक खलनायकों की दरबार में नृत्य प्रस्तुति की जाती हो तब तो यही संदेश जाता है कि खलनायकों की समाज में असली भूमिका है।

बहरहाल इसका एक ही उपाय है कि हम अपने अध्ययन, श्रवण, और चिंतन में ऐसे लोगों पर भी विचार करने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन दें जो नाटकीयता से पृथक होकर समाज सेवा, रचनाकर्म, तथा वैज्ञानिक प्रस्तुति करते हों। द्वंद्वपूर्ण नाटकीयता से परे नहीं रहा जा सकता पर उस पर चर्चा करने की बजाय ऐसे विषयों को महत्व दें, जो सकारात्मक विचार तथा सहज भाव पैदा करने वाले हों। इस समय समाज में अस्थिरता, भय और असुरक्षा का भाव है उसके लिये यह जरूरी है।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior

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मनुष्य बनाने की जरुरत-चिंतन आलेख (charitra aur manushya-chintan alekh)

ऐसा नहीं लगता कि निकट भविष्य में जाति पाति, धर्म, भाषा, और क्षेत्र के आधार पर बने समूहों के आपसी विवाद कोई थम जायेंगें। सच बात तो यह है कि पहले की अपेक्षा यह विवाद बढे़ हैं और इसमें कमी की आशा करना ही व्यर्थ है। समस्या यह है कि लोग देश, समाज, और शहर बनाने की बात तो करते हैं पर व्यक्ति निर्माण की बात कोई नहीं करता। बहसों में इस बात पर चर्चा अधिक होती है कि समाज कैसा है? इस प्रश्न से सभी लोग भागते हैं कि व्यक्ति कैसे हैं?
इन विवादों की जड़ में व्यक्ति के अंदर स्थित असुरक्षा की भावना है जो न चाहते हुए भी अपने समाज का हर विषय पर अंध समर्थन करने को बाध्य करती है। कई बार तो ऐसा होता है कि व्यक्ति सच जानते हुए भी- कि उसके संचालक प्रमुख केवल दिखावे के लिये समूह का हितैषी होने का दावा करते है जिसमें उनका स्वयं का स्वार्थ होता है-अपने समूह का समर्थन करता है। आजादी से पहले या बाद में जानबूझकर समूह बने रहने दिये गये ताकि उनके प्रमुख आपस में मिलकर अपने सदस्यों पर नियंत्रण कर अपना काम चलाते रहें। देश की हालत ऐसी बना दी गयी है कि हर आदमी अपने को असुरक्षित अनुभव करने लगा है और बाध्य होकर विपत्तिकाल में अपने समूह से सहयोग की आशा में उसके प्रमुख के नियंत्रणों को मान लेता है। आधुनिक शिक्षा ने जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र की भावना को समाप्त करने की बजाय बढ़ाया है। पहले अशिक्षित व्यक्ति चुप रहते थे यह सोचकर कि बड़ लोग ही जाने। मगर अब हालत यह है कि शिक्षित व्यक्ति ही अब समूह के समर्थन में ऐसी गतिविधियां करने लगे हैं कि आश्चर्य होता है। नई तकनीकी का उपयोग करने वाले आतंकवादी इस बात का प्रमाण है।

सर्वजन हिताय की बजाय सर्व समाज हिताय करने की नीति ने आम आदमी को बेबस कर दिया है कि वह अपने समूहों से जुड़ा रहे। अगर हम दैहिक जीवन के सत्यों को देखें तो यहां कोई किसी का नहीं है पर समूह प्रमुखों की प्रचार रणनीति यह है कि हम ही वह भगवान हैं जो तुम्हारा भला कर सकते हैं।
देश में सामान्य व्यक्ति के लिये बहुत कठिनता का दौर है। बेरोजगारी के साथ ही शोषण बढ़ रहा है। शोषित और शोषक के बीच भारी आर्थिक अंतर है। गरीब और आदमी के बीच अंतर की मीमांसा करना तो एक तरह से समय खराब करना है। आजादी के बाद देश की व्यवस्था संचालन में मौलिक रूप से बदलाव की बजाय अंग्रेजों की ही पद्धति को अपनाया गया जिनका उद्देश्य ही समाज को बांटकर राज्य करना था। मुश्किल यह है कि लोग इसी व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं बजाय बदलकर व्यवस्था चलाने के। आम आदमी का चिंतन मुखर नहीं होता और जो जो मुखर हैं उनका आम आदमी से कोई लेना देना नहंी है। हर कोई अपना विचार लादना चाहता है पर सुनने को कोई तैयार नहीं।
मुख्य विषय व्यक्ति का निर्माण होना चाहिये जबकि लोग समाज का निर्माण करने की योजना बनाते हैं और उनके लिये व्यक्ति निर्माण उनके लिये गौण हो जाता है। कुछ विद्वान उपभोग की बढ़ती प्रवृत्तियों में कोई दोष नहंी देखते और उनके लिये योग तथा सत्साहित्य एक उपेक्षित विषय है। कभी कभी निराशा होती है पर इसके बावजूद कुछ आशा के केंद्र बिन्दू बन जाते हैं जो उत्साह का संचार करते हैं। इस समय धर्म के नाम पर विवाद अधिक चल रहा है जो कि एकदम प्रायोजित सा लगता है। ऐसे में अगर हम भारतीय धर्म की रक्षा की बात करेें तो बाबा रामदेव जी ने अभी बिटेन में योग केंद्र स्थापित किया है। इसके अलावा भी भारतीय योग संस्थान भी विश्व भर में अपनी शाखायें चला रहा है। ऐसे में एक बात लगती है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान अक्षुण्ण रहेगा और धर्म का विस्तार अपने गुणों के कारण होगा। सच बात तो यह है कि योग साधना और ध्यान ऐसी प्रद्धतियां हैं जो व्यक्ति का निर्माण करती हैं। यह हमारे धर्म का मूल स्त्रोत भी है। वह गैरजरूरी उपभोग की वस्तुओं के प्रति प्रवृत्त होने से रोकती हैं। इस देश की समस्या अब यह नहीं है कि यहां गरीब अधिक हैं बल्कि पैसा अधिक आ गया है जो कि कुछ ही हाथों में बंद हैं। यही हाथ अपनी रक्षा के लिये गरीबों में ऐसे लोगों को धन मुहैया कराकर समाज में वैमनस्य फैला रहे हैं ताकि गरीबों का ध्यान बंटा रहे। हम इधर स्वदेशी की बात करते हैं उधर विदेशी वस्तुओं का उपभोग बढ़ रहा है। व्यक्ति अब वस्तुओं का दास हो रहा है और यहींे से शुरुआत होती आदमी की चिंतन क्षमता के हृास की। धीरे धीरे वह मानसिक रूप से कमजोर हो जाता है। फिर उसके सामने दूसरो समूहोें का भय भी प्रस्तुत किया जाता है ताकि वह आजादी से सोच न सके।
देखा जाये तो सारे समूह अप्रासंगिक हो चुके हैं। मासूम लोग उनके खंडहरों में अपनी सुरक्षा इसलिये ढूंढ रहे हैं क्योंकि राज्य की सुरक्षा का अभाव उनके सामने प्रस्तुत किया जाता है। जबकि आज के समय व्यक्ति स्वयं सक्षम हो तो राज्य से भी उसे वैसी ही सुरक्षा मिल सकती है पर प्रचार और शिक्षा के माध्यम से शीर्ष पुरुष ही ऐसा वातावरण बनाते हैं कि आदमी समर्थ होने की सोचे भी नहीं। ऐसे में उन्हीं लोगों को ईमानदार माना जा सकता है कि जो व्यक्ति निर्माण की बात करे।
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कवि,लेखक और संपादक, दीपक भारतदीप,ग्वालियर

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दूसरी किताब-हास्य व्यंग्य (doosri kitab- hindi hasya vyangya)

बुद्धिजीवियों का सम्मेलन हो रहा था। अनेक प्रकार के बुद्धिजीवियों को उसमें आमंत्रण दिया गया। यह सम्मेलन एक ऐसे बुद्धिजीवी की देखरेख में हो रहा था जिन्होंने तमाम तरह की किताबें लिखी और जिनको अकादमिक संगठनों के पुस्तकालय खरीदकर अपने यहां सजाते रहे। आम लोग उनका नाम समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी के माध्यम से जानते थे कि कोई ऐसे लेखक हैं जो लिखते हैं। इस सम्मेलन के आयोजन के लिये एक प्रकाशन संस्थान ने उनके प्रेरित किया जो अब ऐसे लेखक ढूंढ रहा था जिनको अपने बुद्धिजीवी होने का भ्रम हो और वह किताब छपवायें।
प्रकाशक ने उस बुद्धिजीवी से कहा-‘कोई नये बकरे लाओ तो हम आपका कविता संग्रह बिना पैसे लिये छाप देते हैं।’
उस बुद्धिजीवी ने कहा-‘अब तो मैं बूढ़ा हो गया हूं। अब ऐसे बकरे नहीं मिलते जो छपास के लिये किताबें छपवायें।’
प्रकाशक ने कहा-‘ठीक है! कोई दूसरा आदमी ढूंढता हूं। हमें प्रकाशन के लिये ऐसे बकरे चाहिये जो आप जैसे बुद्धिजीवियों की महफिलों में भेड़ की तरह हांक कर लाये जाते हैं।’
बुद्धिजीवी ने कहा-‘ठीक है! तुम कहते हो तो कोशिश करता हूं।’
उसने अपने चेले चपाटों को बुलाया। एक चेले ने कहा-‘महाराज, हमारे झांसे में अब ऐसे भेड़नुमा लेखक कहां आयेंगे जिनको बकरा बनाकर उस प्रकाशक के पास ले जायें।’
बुद्धिजीवी ने कहा-‘लानत! सारी शिक्षा बेकार गयी। इतने वर्ष से क्या मेरे यहां झक मार रहे थे। अरे, कोई सम्मेलन करो। इतने सारे लोग छद्म श्री, और अहम भूषण सम्मानों के लिये फिर रहे हैं। उनको अपने वाक्जाल में फंसाकर लाओ।’

चेले अपने अभियान पर निकल पड़े। एक महाबुद्धिजीवी सम्मेलन का आयोजन किया। कुल जमा पहुंचे आठ लोग-जिनमें अधिकतर नये नये बुद्धिजीवी बने थे जिनको अपने बहुत बड़े लेखक होने का गुमान था। सम्मेलन संपन्न हो गया। फोटो वगैरह भी खींच लिये गये। बुद्धिजीवी के साथ उसके पच्चीस चेले पांच पांच के समूह में बारी बारी से ही मंच पर विराजमान होते रहे। एक एक कर बाहर ने आये नये बुद्धिजीवियों को परिचय देने के लिये मंच पर बुलाया गया था। बाद में उनको नीचे धकिया दिया जाता था। एक नये बुद्धिजीवी लेखक ने कहा-‘भई, हमें भी कुछ बोलने दो।’
मंच पर उन महान बुद्धिजीवी ने अपने चेले को देखा तो वह उस पर बरस पड़ा-‘अबे, तेरी किताबें छपी हैं जो इतने बड़े मंच पर बोलने का अवसर चाहता है।’
तब बुद्धिजीवी ने अपने चेले को डांटा-‘अरे, ऐसा बोला जाता है। यह नये लेखक हैं इनको प्रोत्साहन देना है।’
फिर वह उस नये लेखक से बोले-‘भई, अब तो समय निकल गया है। अगली बार सम्मेलन में तुम्हारा लंबा भाषण रखेंगे। तब तक ऐसे दो चार सम्मेलनों में बोलने का अभ्यास कर लो। हां, एक किताब जरूर छपवा लेना।’
तब एक दूसरा बुद्धिजीवी बोला-‘पर महाशय, मैं तो तीस साल से लिख रहा हूं। कोई किताब नहीं छपी, पर अखबारों में कभी कभी जगह मिल जाती है।’
बुद्धिजीवी महाशय ने कहा-‘अरे भई, अच्छा लिखोगे तो छपोगे।’
इससे पहले कि वह मेहमान बुद्धिजीवी प्रतिवाद करता तब मंच पर बैठे उन महान बुद्धिजीवी के चेलों ने तालियां बजा दी जैसे कि कोई रहस्यमय बात उन्होंने कही हो।’

कार्यक्रम समाप्त हो गया। अब सवाल यह था कि उनका प्रचार कैसे हो? बुद्धिजीवी ने समझाया-‘फोटो केवल मंच के ही देना। मेरा भाषण देते हुए जरूर देना। अपने भी फोटो ऐसे देना जैसे कि सभी का आ जाये। इसलिये ही मैंने तुम्हें पांच पांच में बांटकर बारी बारी से बैठने के लिये कहा था ताकि अधिक फोटो छप सकें।’
एक चेले ने पूछा-‘महाराज, पर दर्शकों और श्रोताओं के फोटो भी तो छापने पड़ेंगे।’
बुद्धिजीवी ने कहा-‘खाली कुर्सियों के फोटो छपवाओगे, मूर्ख कहीं के! फिर यह भेड़ की तरह लोग आये थे इनके फोटो अगर अखबार में छप गये तो यह शेर हो जायेंगे। फिर नहीं आने वाले अपने जाल में। यहां आदमी को तब ऊंचा न उठाओ जब तक उससे कोई फायदा न हो।’
चेले ने कहा-‘ठीक है।’
बुद्धिजीवी ने कहा-‘और सुनो। नाश्ते, भोजन, और चाय के भी फोटो छाप देना। अपने पिछले सम्मेलन की वह फोटो जो नहीं भेज पाये, उपयोग में लेना। खाने की प्लेटों में बचे सामान, पन्नी में पड़े पानी के खाली ग्लास, और टेबलों पर बैठे तुम लोगों के जो फोटो बनवाये थे उनका उपयोग इस बार भी जरूर करना। लिखना कि शानदार भोजन हुआ।’
चेले ने पूछा-‘अगर किसी ने जांच करने का प्रयास किया तो?’
बुद्धिजीवी ने कहा-‘यह लोग तो बाहर के आये थे चले जायेंगे। तुम लोगों से कोई पूछे तो बता देना। हां, तुम लोगों ने चाय के ढाबे पर बैठकर जो फोटो खिंचवायी थी वह भी भेज देना।’
एक चेले ने कहा-‘पिछली बार वह छपवा चुके हैं। दो साल पहले।
बुद्धिजीवी ने कहा-‘अब कौन उसे याद रखता है? हां, एक बात याद रखना। मेरे कुछ बुद्धिजीवियों के बयान भी छाप देना। भले ही वह न आये। इससे यह महासम्मेलन लगेगा। कुछ छद्म नाम के विद्वान लोगों का आगमन भी दर्शा देना। इन आठों में लगे रहो। कम से कम दो जरूर बकरे बन जायेंगें।’
नये बुद्धिजीवी रेल्वे स्टेशन पर अपने ठिकाने लौटने के लिये आये तो उसमें दो गायब थे। एक ने दूसरे से पूछा-‘यह दो क्यों नहीं आये? यहां इसी स्टेशन पर मिलने का सभी ने वादा किया था।
दूसरे ने कहा-‘वह अपनी किताब छपवाने के बाद ही यहां से जायेंगे। बुद्धिजीवी के एक चेले ने उनको पटा लिया है। एक ने मुझे मोबाइल पर यह बात बतायी।’
इधर पता लगा कि उनकी ट्रेन आज नहीं जा रही है। दूसरे ट्रेन का इंतजार करने की बजाय उन्होंने वह शहर घूमने का निर्णय किया और पास में ही एक होटल में रुक गये।
अगले दिन सुबह उन्होंने होटल के बाहर एक चाय के ढाबे पर ही अखबार देखा। उसमें उस महासम्मेलन की खबर छपी थी। अपना नाम और फोटो न देखकर उनको गुस्सा आया। तब वह आपस में बात करने लगे। एक ने कहा-‘यार, हम काहे इतनी दूर आये थे। न खाना खाया न नाश्ता किया। यह खबर देखो। क्या बकवाद लगती है।’
उनकी बातें पास ही बैठा चाय पीता हुआ एक आदमी सुन रहा था। उसने उनसे पूछा-‘तो तुम भी सम्मेलन में आये हो? जरा सोच समझकर जाना। कहीं जेब कट गयी तो कहीं के नहीं रहोगे।’
उन्होंने उस आदमी की तरफ देखा। वह एकदम मैला कुचला पायजामा पहने हुए था। उसकी दाढ़ी और बाल इतने बढ़े हुए थे कि उसकी तरफ देखना भी बुरा लगता था।
एक बुद्धिजीवी ने उससे जवाब दिया-‘हां, एक बुद्धिजीवी सम्मेलन में आये हैं।’
उसने कहा-‘मैं भी ऐसे ही फंस गया। अपने आपको बड़ा बुद्धिजीवी समझता था। रहने वाला तो यहीं का हूं। अलबत्ता किताब छपवाने के चक्कर में इतना पैसा खर्च किया फिर उसका विमोचन कराया। मुझसे कहा गया कि तुम बहुत बड़ बुद्धिजीवी बन जाओगे। छद्म श्री और अहम भूषण पुरस्कार भी मिल सकता है। मगर उसके बाद कहीं का न रहा। फिर मुझसे कहा गया कि दूसरी किताब छपवाओ। उसके लिये बचे खुचे पैसे लेकर निकला तो जेब कट गयी। अरे, ऐसे सम्मेलनों के चक्कर में मत पड़ो। यहां भेड़ बनाकर लाते हैं और बकरे बनाकर भेज देते हैं।’
उसकी इस कहानी का उन नवबुद्धिजीवियो पर ऐसा असर हुआ कि वह चाय आधी छोड़ कर भाग निकले।
स्टेशन पर एक ने दूसरे से कहा-‘यार, गनीमत है कि भेड़ की तरह आये पर बकरे नहीं बने।’

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अन्न की तरह धन पचने का भी मंत्र हो तो अच्छा-हिंदी हास्य व्यंग्य (hasya vyangya in hindi)

उस दिन एक संत को हमने पेट में अन्न पचाने का मंत्र बताते हुए सुना। वह सुबह, दोपहर और रात को भोजन करने से पहले और बाद में जाप किये जाने मंत्र बता रहे थे। हम भी बैठे प्रवचन सुन रहे थे। उसी समय हमारे दिमाग में एक प्रश्न आया कि ‘क्या धन कमाने से पहले और बाद में पचाने के लिये भी कोई मंत्र होगा।’
कुछ देर बाद उन्होंने लक्ष्मी को अपने घर बुलाने का मंत्र भी सुनाया। तब हमने सोचा कि जब धन को लाने का मंत्र बताया है तो उसे पचाने का मंत्र भी बतायेंगे। पूरे प्रवचन समाप्त हो गये पर ऐसा कोई मंत्र सुनाई नहीं दिया। मन में उत्सुकता ओर जिज्ञासा का भाव बना रहा। जब कार्यक्रम समाप्त हुआ तो अपने एक सत्संगी से पूछा‘-भई, कोई धन पचाने का भी मंत्र होता है।’
उन सत्संगी ने पहले तो हमें घूर कर देखा और फिर पूछा-‘तुम्हारा स्वास्थ्य कैसा है? इधर क्या सुबह पीकर सत्संग सुनने आये हो? ऐसे उल्टे सीधे सवाल करने का मतलब तो यही है कि तुम्हें मजाक सूझता है। भला धन भी पचाने की चीज है। जिसके पास धन है वह हर तरह से समर्थ हो जाता है।’’
इधर हमने भी तमाम तरह की किताबें छान मारी पर कहीं धन पचाने का मंत्र नहीं मिला। ताज्जुब यह देखकर हुआ कि लोग धन को पचाने का कोई मंत्र चाहते भी नहीं है। इधर समाज की जो हालत देखते हैं तब लगता है कि इसका भी कोई मंत्र होना चाहिए।
हमारे ताऊ कहते थे कि धन और अन्न हरेक को हजम नहीं होता। अधिक अन्न से आदमी बीमार पड़ता है तो सभी देखते हैं पर अधिक धन जिसका दिमाग खराब कर दे उसको कोई कोई अनुभव करता है। एक समय था जब सड़क पर निकलते थे तो ऐसा नहीं लगता कि किसी से डर है पर आजकल हालत दूसरे हैं। साइकिल पर हों या स्कूटर पर यह भय रहता है कि किसी मोटर साइकिल या कार वाले से टक्कर हो तो चोट अपने को लगे या हमारी गाड़ी को तो ठीक है पर दूसरे का कुछ बिगड़ना नहीं चाहिए। ऐसा कोई दिन नहीं होता जब मोटर साइकिलों और कार वालों का आपसी झगड़ा न देखने को मिलता हो। आदमी के पास इतना अधिक धन पास आ रहा है पर जमीन तो उतनी है इसलिये आदमी सड़कों पर अतिक्रमण कर रहा है। चार पहिया वाली गाड़ियां बढ़ी पर सड़कें छोटी होती जा रही हैं। ऐसे में टक्करें तो हंांगी। ऊबड़ खाबड़ सड़कों पर कब तक आदमी गााड़ियां चलाते हुए अपना दिमागी संतुलन बनाये रख सकता है। ऐसे में किसी की नयी कार है तो समझ लीजिये उसे थोड़ी भी टक्कर अपनी अमीरी पर दाग की तरह लगती है और वह दूसरे पर हाथ मारकर उसे साफ करने पार उतारु हो जाता है। सड़कों और शहरों का सच सभी जानते हैं पर याद नहीं रखते। देश के हर शहर का अखबार उठाकर देख लीजिये। सड़क, पानी बिजली और कानून व्यवस्था की शिकायतों से भरा पड़ा मिलेगा। एक तरह से संक्रमण काल मान सकते हैं। कहते हैं कि संक्रमण काल में धीरज रखना चाहिये पर लोग हैं कि आक्रामक हो रहे हैं। इतना धन है कि उनको लगता है कि हम चाहे जो खरीद सकते हैं। इसलिये किसी की थोड़ी गलती पर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किये बिना उन्हें चैन नहीं पड़ता।
उस दिन का वाक्या भूले नहीं भूलता। गैस के चूल्हे की मरम्मत करने वाला एक लड़का अपनी साइकिल पर साजोसामान के साथ जा रहा था। रेल्वे क्रासिंग पर फाटक बंद था। वहां एक कार साइकिल पर चल रहे लड़के के एकदम आगे रुकी। लड़का कोशिश करते हुए भी उसको पीछे से टक्कर मारने से नहीं बच सका। टक्कर कोई जोरदार नहंी थी। लड़का साइकिल उठाकर कार से दूर खड़ा होकर फाटक का इंतजार करने लग गया। इधर कार वाला बाहर निकला। उसने इशारा कर लड़के को अपने पास बुलाया और आराम से उसके गाल पर एक थप्पड़ मारी। वह बिचारा मासूम देखता रह गया। अमीर की गरीब के प्रति यह बदतमीजी इसी बात का प्रमाण था कि धन सभी को हजम नहीं होता।
हम भी एक दिन साइकिल पर जा रहे थे। जिस शहर में हम पलकर बढ़े हुए हैं उसी शहर के मुख्य चैराहे से कुछ दूर हमारी साइकिल के आगे एक कार निकल कर थोड़ी दूर रुकी। यह इतना अप्रत्याशित था कि हमारा संतुलन गड़बड़ा गया पर हमने अपनी साइकिल को रोक लिया और टक्कर नहीं हो पायी। उसमें से कार वाला बाहर आया और अपनी कार को देखने लगा। वह ऐसे पेश आ रहा था कि जैसे उसके बाप ने सड़क उसे खरीद कर दी हो। फिर उसने हमें ऐसे जाने का इशारा किया जेसे कि किसी मामले में बाइज्जत बरी कर रहा हो।

कहने का तात्पर्य यह है कि धन को हजम करना भी एक वैसी कला है जैसे खाने को हजम करना। अगर धन पचने वाली चीज होती तो हार्टअटैक,, डाइबिटीज, ओर उच्च रक्तचाप जैसे राजरोग नहीं फैलते। किसी गरीब या मजदूर को हमने इन बीमारियों का शिकार होते नहीं देखा। आप कहेंगे कि यह तो भोजन के अपच होने के ही परिणाम है पर नहीं चिकित्सक तो यही कहते हैं कि यह राजरोग दिमागी तनाव से पैदा होते हैं। स्पष्टतः यह धन पचाने से जुड़े हुऐ हैं। जब धन आता है तो आदमी अहंकार वश शारीरिक श्रम से परे रहते हुए हमेशा इस प्रयास में रहता है कि वह अपना पभाव किसी पर जमाये। मतलब धन उसे हजम नहीं होता। इसका कोई मंत्र नहीं बताता। हम जानते हैं पर बतायेंगे नहंी क्योंकि इसके लिये फीस हमको चाहिये। इधर मुफ्त सेवा में कोई न नाम मिलता है न नामा। समस्या वही है कि आखिर धन पचाने का मंत्र चाहिये इस बात को मानते कितने लोग हैं?’
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गुलाम कर रहे राज़-त्रिपदम (gulam kar rahe raj-tripadam)

गुलाम राज
कर रहे हैं यहां
गुलाम पर।

कोई छोटा है
कोई उससे बड़ा
यूं नाम भर।

हुक्म चले
नहीं पहुंचता है
मुकाम पर।

कागजी नाव
तैरती दिखती है
यूं काम पर।

बड़ा इलाज
महंगा मिलता है
जुकाम पर।

खोई जिंदगी
ढूंढ रहे हैं
लोग दुकान पर।

दर्द पराया
सस्ता बतलाते
जुबान पर।

शिक्षा के नाम
पट्टा बंध रहा है
गुलाम पर।

जड़ शब्द
कैसे तीर बनेंगे
कमान पर।

आजादी नारा
मूर्ति जैसे टांगे हैं
गुलाम घर।

जो खुद बंधे
आशा कैसे टिकायें
गुलाम पर।
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कवि,लेखक और संपादक, दीपक भारतदीप,ग्वालियर

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असली नकली पुरस्कार-हिंदी हास्य व्यंग्य (hindi comedy satire on prize)

समाज सेवाध्यक्ष जी ने अपनी बाहें टेबल पर टिकाई अपना मूंह हथेलियों पर रखने को बाद अपने सात सभासदों की उपस्थिति देखकर गिनती की। आठवां सदस्य सचिव लेखपालक गायब था। उन्होंने कहा‘-यह सचिव लेखपालक हमेशा ही देर से आता है। सारा हिसाब किताब उसके पास है और उसके बिना यहां चर्चा नहीं हो सकती।’
सामने बैठे सभी सातों सदस्य एकटक उनकी तरफ देख रहे थे। समाज सेवाध्यक्ष जी उठे और बैठक कक्ष में ही टहलने लगे। फिर कुछ कहने लगे। मौजूद सदस्य यह नहीं समझ पा रहे थे कि वह अपने से बात कर रहे हैं या उनसे। अलबत्ता उनके शब्द सभी को साफ सुनाई दे रहे थे।
वह कह रहे थे कि ‘इस बार हमने सूखा राहत और बाढ़ बचाव में अपना काम कर यह सिद्ध कर दिया है कि हमारी इस संस्था की भूमिका समाज सेवा के मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण है……………’’
इससे पहले वह कुछ आगे बोलें एक सदस्य ने यह सिद्ध करने के लिये कि वह भी बोलना जानते हैं, उनकी बात पूरी होने से पहले ही अपनी बात कही-’पर साहब, यह तो पुरस्कार समिति की बैठक है!’
इससे पहले कि समाज सेवाध्यक्ष कुछ कहते एक दूसरे सदस्य ने भी यह सिद्ध करने के लिये कि वह बहस भी कर सकता है, उस सदस्य को फटकारा-‘अरे, कैसी बेवकूफी वाली बात करते हो। चाहे बाढ़ हो या अकाल, काम तो अपनी समिति ही करती है जिसके सदस्य तो हम आठ और नौवें साहब हैं। हमारा काम क्या है, केवल चंदा उगाहना और अपनी समाज सेवा के रूप में उसे बांटने में कलाकारी दिखाना। साहब को बोलने दो, बीच में बोलकर उनकी चिंतन प्रक्रिया को भंग मत करो।’
समाज सेवाध्यक्ष ने दूसरे को डांटा-‘यह बांटने में कलाकारी वाली बात इतनी जोर से मत कहो। दीवारों के भी कान होते हैं।
बैठक में सन्नाटा छा गया। थोड़ी देर बाद समाज सेवाध्यक्ष कुर्सी पर विराजे और बोले-‘‘इस बार हमनें खास ढंग के पुरस्कार बांटने की घोषणा की थी ताकि उसके लिये स्वप्रायोजक मिलें या फिर कोई प्रायोजक पकड़ कर इनाम लेने आयें। लगता है कि बाढ़ और अकाल में काम का प्रचार ढंग से नहीं हुआ। वैसे अखबारों में धन और अन्न लेने वाले पीड़ितों के हमने इधर उधर से फोटो जुगाड़ने में बहुत मेहनत की। उनके प्रचार पर कुछ पैसा भी खर्च हुआ लगता है उसका परिणाम नहीं निकला।’
तीसरा सदस्य बोला-‘आजकल लोगों में दया धर्म कम हो गया है। ढंग से चंदा भी नहीं देते। हिसाब मांगते हैं। हम तो कह देते हैं कि हम तो चंदा लेकर तुम्हें दान का पुण्य दे रहे हैं वरना खुद कर देख लो हमारे जैसी समाज सेवा।’
एक अन्य सदस्य ने उसे फटकारा-‘कमबख्त, तुम कहां चंदा मांगने जाते हो? बस, प्रचार सचिव के नाम पर इधर उधर पर्चे बांटते हो। तुम्हारा काम इतना खराब है जिसकी वजह से लोगों को हमारी कार्य प्र्रगति की जानकारी नहीं मिल पाती।’
एक अन्य सदस्य को उसकी बात समझ में नहीं आयी तो बोल पड़ा-‘हम काम कौनसा करते हैं जिसकी जानकारी लोगों को मिले। बस काम का प्रचार है, वह भी यह ढंग से नहीं करता।’
समाज सेवाध्यक्ष ने कहा-‘खामोश हो जाओ, अपनी असलियत यहां क्यों बखान कर रहे हो। कोई सुन लेगा तो! फिर आजकल स्टिंग आपरेशन भी हो जाते हैं। हमारी संस्था की कमाई देखकर बहुत से लोग हमारे पीछे पड़े हैं। इसलिये अब सोच समझकर बोला करो। यहां ही नहीं बाहर भी ऐसी आदत डाल दो।’
इतने में सचिव लेखपालक आ गया। उसे देखते ही समाज सेवाध्यक्ष बोले-‘यह आने का समय है? कहां चले गये थे?’
सचिव लेखपालक बोला-‘सारा काम तो मुझे ही करना पड़ता है, आप तो सभी केवल देखते हो। इस साल पुरस्कार देने के लिये जुगाड़ लगाना था। इसके लिये दो तीन लोगों से बात कर ली है। कार्यक्रम का खर्च, उनको दिये जाने वाला उपहार और अपने लिये कमीशन का जुगाड़ लगाना था। फिर पुरस्कार के नाम पर चंदा भी लेना है। इसके लिये कुछ लोगों को ‘समाज सेवा’ के लिये सम्मान देना था।’
एक सदस्य चिल्लाया-‘नहीं! समाज सेवा का पुरस्कार हम देंगे तो फिर हमारी समाज सेवा की क्या इज्जत रह जायेगी।’
समाज सेवाध्यक्ष ने कहा-‘हम यहां समाज सेवा की बात नहीं कर रहे पुरस्कार देकर प्रोत्साहन देने वाला काम रहे हैं। समाज सेवा के लिये एक पुरस्कार अपने सचिव और प्रचार सचिव को भी देंगे। कौन रोकड़ा देना है? देंगे तो आयेगा तो अपने पास ही। आगे बोलो।’
सचिव ने कहा-‘इस बार हथेली पर सरसों जमाने और बबूल बोकर आम उगाने के लिये अनोखे पुरस्कार दिये जायेंगे।’
एक सदस्य के मूंह से चीख निकल गयी-‘पर यह तो कभी हो ही नहीं सकता। बरसों पुरानी कहावत है।’
सचिव ने कहा-‘हमें क्या? वह लोग बड़ी संस्थाओं का प्रमाणपत्र ले आयेंगे जो यहां उपस्थित सभी दर्शकों को दिखाये जायेंगे।’
एक अन्य सदस्य ने कहा-‘पर वह संस्थायें कौनसी होंगी। पता करना असली है कि नकली।’
सचिव ने कहा-‘हमें क्या? अरे, जब हम किसी से हाथ में हजार का नोट लेते हैं तो क्या पहचान पाते हैं कि वह असली है या नकली! यहां किसको फुर्सत रखी है कि यह जानने का प्रयास करे कि ऐसा प्रमाण पत्र देने वाली संस्थायें असली हैं या नकली। बस, इतना पता है कि जिन लोगों ने इसके लिये पुरस्कार मांगे हैं उनमें एक स्व प्रयोजक है और दूसरे का प्रायोजन एक ऐसा आदमी कर रहा है जिसे पुरस्कार लेने वाले से भारी राशि कर्जे के रूप में लेनी है जिसे वह कभी चुकायेगा नहीं। समझे! बाकी पुरस्कार तो समाज सेवियों के हैं जो बिचारे अपने घर से बाहर कभी सोच भी नहीं पाते पर उनको अपने घर की महिलाओं पर रौब गालिब करना है।’
सभी सोच में पड़ गये तक समाज सेवाध्यक्ष ने कहा-‘तुम सभी को संाप क्यों सूंघ गया। सचिव लेखपालक ने जो प्रस्ताव रखा है वह भी कम अनोखा नहीं है। बजाओ तालियां।’
सभी लोगों ने सहमति में अपनी तालियां बजायीं।

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior

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तुम वह समंदर बनना-हिंदी कविता (tum samandar banna-hindi kavita)

सारे जहां की प्यास मिटा सको
तुम वह समंदर बनना.
भेजे जो आकाश में पानी भरकर मेघ
जहां लोग पानी को तरसे
वहीँ समन्दर से लाया अमृत बरसे
अपने किये का नाम कभी न करना.

गंगा पवित्र नदी कहलाती है,
पर अपने किनारे की ही प्यास बुझाती है,
देवी की तरह पुजती पर
लाशों से मैली भी की जाती है,
जब तक समन्दर तक पहुँचती
तब तक समेटती है दूसरों के पाप,
जहां है इज्जत का वरदान
वहां साथ लगा है बदनामी का शाप,
तुम बने रहना हमेशा खारे
किनारे आये प्यासों की प्यास बुझाने के लिए
दिखावे के पुण्य की लालच में
अपनी असलियत मत बदलना.

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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior

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सब दिया उसने फिर भी हाथ फैलाते-व्यंग्य कविता

सर्वशक्तिमान के दरबार में
क्यों जाकर भीड़ लगाते हो,
जिसने दिए काम करने को हाथ
उसी के सामने कुछ मांगने के लिए
क्यों फैलाते हो.
जिसने दिए चलने के लिए पाँव
क्यों लौटकर जाते हो फिर  उसके गाँव,
उसने दुनियाँ   देखने के लिए दी है आँखें
टकटकी लगाए उसी की तरह क्यों देखते हो
जैसे  कैद किये हों तुम्हें सलाखें,
विचार करने के लिए दिया है दिमाग
जिसका करते हो उपयोग  केवल पांच प्रतिशत भाग,
कितना ताकतवर तुम्हें उसने बनाया
तुम लाचार होकर उसके सामने क्यों पहुँच जाते हो.
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

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